गांधी और अहिंसा

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं एवं सेतु संपादन मंडल के सम्मानित सदस्य हैं। आप अहिंसा आयोग के समर्थक एवं अहिंसक सभ्यता के पैरोकार भी हैं।

अहिंसा कोई स्थूल वास्तु नहीं है, जो आज हमारी दृष्टि के सामने है। किसी को न मारना इतना तो है ही नहीं, कुविचार मात्र हिंसा है। उतावली हिंसा है। द्वेष हिंसा है। किसी का बुरा चाहना हिंसा है। जगत के लिए जो आवश्यक वस्तु है, उस पर कब्जा रखना भी हिंसा है।-मोहनदास करमचंद गाँधी के शब्द।

गाँधी जी ने बहुत सहज भाव से अहिंसा के बारे में अपनी बात रख दी। अहिंसा की इससे सहज, सरल और विनम्र अभिव्यक्ति नहीं हो सकती। उन्होंने उन बारीक से बारीक चीजों में घुली हुई हिंसा और अहिंसा को रेशा-रेशा करके सामने रख दिया है। हमारे धर्म ग्रंथ और महाभारत या हमारी ऋचाएं, श्रुतियां और उपनिषद अहिंसा और हिंसा को जिस रूप में परिभाषित और व्याख्यायित करते हों लेकिन गाँधी तो अहिंसा को इसी रूप में परिभाषित करते हैं।

हिंसा के साम्राज्य तले दबे इस समय के मनुष्य को अहिंसा के पथ पर लाना बहुत ही चुनौतीपूर्ण कार्य है, ऐसा कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। गाँधी जी ने इसके लिए अपने जीवन को मिशन के रूप में झोंक दिया। उन्होंने अहिंसा को सत्य के साथ जोड़कर देखा। वह अहिंसा को प्रेम के साथ क्या तादात्म्य बनाकर लोगों के समक्ष पेश किया जा सकता है इस पर विचार किया। और वह ईश्वर और सत्य, सत्य और अहिंसा तथा अहिंसा और प्रेम को इस प्रकार अंतर्संबंध बनाकर प्रकट करते हैं कि जो लोग मनुष्यता में और अपने निजी जीवन में मूल्यबोध के साथ जीना चाहते हैं, उनकी वह ज़रूरत लगने लगती है।

गाँधी जी ने यह कहा कि सत्य और अहिंसा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। और अहिंसा प्रेम के बगैर नहीं हो सकती। गाँधी जी के लिए प्रेम का अर्थ कुछ और है। वह इस प्रेम को परिभाषित करते हैं कि अधिकतम त्याग ही प्रेम है वह भी बिना किसी अपेक्षा के। ऐसे प्रेम से उपजे भाव को वह अहिंसा अहिंसा कहते हैं क्योंकि ऐसा प्रेम विकार रहित होगा और अधिकतम समर्पण के लिए आग्रही होगा। और अब बात करते हैं सत्य की तो वह सत्य क्या है गाँधी जी के लिए, इसे भी जानना आवश्यक है। गाँधी जी हम जानते हैं कि सनातनी थे और वह ईश्वरवादी थे। ईश्वर में आस्था रखते थे। पहले उनकी मान्यता थी कि ईश्वर ही सत्य है। वही सत्य है और सब मिथ्या है लेकिन जीवन के तमाम अनुभव व चिंतन के उपरांत गाँधी जी ने अपनी धारणा बदली और कहा कि अभी तक मैं कहता था कि कि ईश्वर ही सत्य है लेकिन अब मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ की सत्य ही ईश्वर है। अब सत्य को पुनः अहिंसा से जोड़कर देखें तो आप पाएंगे कि जब गाँधी जी यह कहते हैं कि सत्य ही ईश्वर है तो वह तो यह भी कहते हैं कि सत्य और अहिंसा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। तो अहिंसा ही ईश्वर है इसका मायने तो यही हुआ। तो गाँधी जी अहिंसा के मध्यम से भी उसी साध्य की संकल्पना को अपना अभीष्ट मानते हैं। वह साधन और साध्य को भली प्रकार समझते हैं और गाँधी ने साधन और साध्य के चुनाव को भी बहुत सोच-समझकर अपनाने पर बल देते हैं।

गाँधी जी ने हिन्द स्वराज में कहा है कि अहिंसा कायरों का हथियार नहीं ही। इस पर बहुत ही प्रश्न उठे। तो गाँधी जी ने कहा कि जो व्यक्ति अपने अधिकारों की रक्षा नहीं कर पाता, वह अहिंसा भी क्या अहिंसा है। गाँधी जी ने इसलिए यह कहा कि आत्मबल जिनमें है वही अहिंसा का सच्ची तरीके से पालन कर सकते हैं। भारत में जिस समय हम गुलामी के जंजीरों में फंसे हुए थे उस समय हम अहिंसा की बात कैसे कर सकते हैं। जब कांग्रेस दो धडों में बंट गई-गरम दल और नरम दल में तो गाँधी ने बार बार आग्रह किया कि हिंसा किसी चीज का विकल्प नहीं है। वह अहिंसा पर अड़े रहे। गाँधी जी ने सबसे अहिंसक आन्दोलन में भाग लेने की अपील की। असहयोग आन्दोलन हो से लेकर भारत छोडो आन्दोलन तक गाँधी जी ने जिस अहिंसक तरीके से दुनिया को अहिंसक लड़ाई की मिसाल दी वह पूरी दुनिया ने लगभग स्वीकार किया। वह नमक तोड़ो आंदोलन में भाग लेते हैं तो तमाम आलोचना होती है किन्तु वह अपनी बात पर अडिग रहे कि उनका मार्ग अच्छा है और उन्होंने वही किया जो उन्होंने सोचा। उस सांकेतिक आन्दोलन से भी अंग्रेजों की चूलें हिल गयीं और जो आलोचक थे उनके मुह बंद हो गए। गाँधी इस प्रकार अहिंसा के एक जीते-जागते स्कूल थे।

आज़ादी के बाद की स्थिति पर नज़र डालें तो गाँधी के उस रौद्र किन्तु अन्तस् में स्नेहपूर्ण व्यक्तित्व को भी पूरी दुनिया नहीं भूल सकती जब अफरा-तफरी के बीच भारत के नोआखाली में व्यापक हिंसा हो रही थी। वह क्रोधित इसलिए थे कि उन्होंने इसकी कल्पना भी नहीं की थी कि भयानक हिंसा होगी। वह अंतस में स्नेहपूर्ण व्यक्तित्व इसलिए थे क्योंकि उन्होंने यह समझा कि यदि हम नहीं इस स्थिति को सुधरने का प्रयास करेंगे तो देश की दशा हिंसा का रौद्र रूप ले लेगी जैसा पंजाब और नोआखाली में हो रहा था। गाँधी जी ने सबसे अपील की कि हिंसा न करें। आपसी भाईचारा और प्रेम से रहने के लिए अपने मन को बदलें। गाँधी के लिए यह एक चिंतापूर्ण स्थिति थी कि देश के ही लोग सम्प्रदायिक हिंसा कर रहे हैं और आपस में यह दूरियाँ बढ़ाने के औजार हैं। विनोबा भावे ने कहा, ‘जब युग की मांग और संतों के उपदेश का संयोग होता है, तब क्रांति होती है। गाँधीजी के बारे में हमें यह देखने को मिला। गाँधीजी ने  कहा, ‘हिंसा का प्रतिकार अहिंसा से करो, असत्य का प्रतिकार सत्य से करो।’ उन्होंने निःशस्त्र प्रतिकार करना सिखाया। यों तो यह पुरानी बात है, कोई नयी नहीं। यह तो हिंदुस्तान की संस्कृति का ही फूला-फला स्वरूप है। भगवन बुद्ध, महावीर और अनेक संतों ने हमें यही सिखाया। लेकिन जब गाँधीजी की जबान पर यह बात आई, तो उसका क्रन्तिकारी अर्थ प्रकट हुआ, क्योंकि उसके लिए ऐतिहासिक भूमिका थी।’ (द्रष्टव्य: गाँधी जैसा देखा-समझा विनोबा ने, संपादक: कान्तिशाह, सर्व सेवा संघ प्रकाशन, वाराणसी, पृष्ठ-82)।

गांधी जी ने अहिंसा की व्याख्या अपनी 1909 में सृजित पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ में की थी और फिर गाँधी जी ने अहिंसा पर गंभीर बातें अपने जीवन के प्रयोगों से प्रकट की। अमेरिका के मार्टिन लूथर किंग द्वितीय हों या फिलिस्तीनी नेता यासर अराफात, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा हों या संयुक्त राष्ट्र के पूर्व और वर्तमान महासचिव सबने गाँधी को वैश्विक स्तर पर स्वीकार किया कि हमें गाँधी के अहिंसक मार्ग पर चलना होगा। दुनिया भर में गाँधी को उस विकल्प के रूप में देखा जाता है जो शांति और सतत विकास के विकल्प के रूप में उपस्थित हो सकता है। निशस्त्रीकरण के लिए देखा जा सकता है और पर्यावरणीय समस्या से निपटने के लिए देखा जा सकता है। हमारी मौलिकता और सोच में गाँधी के अहिंसक आग्रह क्या इतने अहम् थे और उनके रहते हमने उसे महत्व नहीं दिया, यह हमारे समक्ष बड़ा सवाल है।

प्रेम के नियम पर आधारित सभ्यता विकसित करना कोई आसान बात नहीं है। जब दुनिया में हिंसा और युद्ध की विभीषिका हमारे समक्ष मौजूद हो तो ऐसे में गाँधी के अहिंसक पथ को अपनाना चतुराई है नहीं तो हम परमाणु हमले के जिस मोहाने पर बैठे हैं उससे तो हम खुद को और मनुष्यता को नहीं बचा सकेंगे, पूरी मनुष्यता खतरे में पड़ जाएगी। दूसरी तरफ बाज़ार भी कम उपद्रवी नहीं है वह और ज्यादा हिंसक है। हमारे स्वदेशी उत्पादों की मांग में कमी से देश की जो स्थिति है उससे सबको चिंतित होना आज आवश्यक है। बाज़ार से हमारी आर्थिक स्थिति कितनी मुश्किल में पड़ गयी है, उसकी कल्पना नहीं की जा सकती। आज भूख और गरीबी के कारण जीवन जीना दूभर है जिन्हें, वे किस हिंसा और तनाव से गुजर रहे हैं, यह बात सबको पता है। बाज़ार में मल्टीनेशनल और कॉर्पोरेट नहीं समझते कि वे किसके हक मार रहे हैं। आने वाले समय में इसके दुष्परिणाम क्या होंगे बल्कि वे तो अपनी रफ़्तार में बहे जा रहे हैं। कॉर्पोरेट की आँखें अह्मारी जनजातीय संस्कृति को नष्ट कर रही हैं और इससे हमारे पर्यावरण को हानि होगी। औषधियां विनष्ट हो जाएंगी और हमारा जीवन कहीं न कहीं आकर थम सा जायेगा। पर्यावरणीय रक्षा के लिए गाँधी ने बहुत ही उच्च बात की थी कि हमें प्रकृति के संसाधन का सिमित उपयोग करना चाहिए। उन्होंने देसज वस्तुओं से जिंदगी को जी लेने की सलाह दी थी लेकिन हम तो उपभोक्तावादी संस्कृति के वाहक बन गए और बाज़ार ने इसे खूब भुनाया तो इससे तो हिंसा बढ़ने वाली है।

जलवायु परिवर्तन के खतरे से जूझती दुनिया को आज क्यों अपनी धरती, पृथ्वी बचने के लिए फर्जी संकल्प-सभा के आयोजन करने पढ़ रहे हैं इससे अच्छा गाँधी की अहिंसा दृष्टि पर विश्वास कर लेते। उन्हें मान लेते। हिंदुस्तान का सबसे बड़ा संकट यही है कि वह गाँधी को पूर्णतया स्वीकार ही नहीं किया और अपने धुन में आगे बढ़ता रहा।

गाँधी जी ने एक बार कहा था कि मैं कहना चाहता हूँ कि हम सब एक तरह से चोर हैं। अगर मैं ऐसी कोई चीज लेता हूँ, जिसकी मुझे किसी तात्कालिक उपयोग के लिए जरूरत नहीं है तो मैं उसकी किसी दूसरे से छोटी ही करता हूँ। यह प्रकृति का एक निरपवाद बुनियादी नियम है कि रोज केवल उतना ही पैदा करती है, जितना हमें चहिये, और हर एक आदमी जितना उसे चाहिए, उतना ही ले, ज्यादा न ले, तो दुनिया में गरीबी न रहे और कोई आदमी भूखा न मरे।’ (द्रष्टव्य: स्पीचेज एंड राइटिंग्स ऑफ़ महात्मा गाँधी, पृष्ठ 384)।

इतनी सूक्ष्मता से गाँधी ने बड़ी बात कही है। पूरी दुनिया को आइना दिखने के लिए और सच्चा और सदा जीवन जीने के लिए उनकी यह बातें बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। हिंसा की सबसे बड़ी जड़ है संचय की प्रवृत्ति। गाँधी ने बहुत ही उम्मीद से सर्वोदय की कल्पना की थी और उसके लिए वह ट्रष्टीशिप अपनाने पर बल देते हैं और सबके मूल में अहिंसक धरना को विकसित करने की कोशिश थी गाँधी कि, यह स्वीकार करना पड़ेगा। दुनिया में संचय की प्रवृत्ति बढ़ने से हमारे जीवनचर्या पर जो प्रभाव पड़ा है वह तो है ही पर्यावरण को जो हानि हुई है उसकी भरपाई कैसे हॉग, यह चिंता की बात है।

सर्वधर्म-समभाव, अस्पृश्यता उन्मूलन, आपसी भाईचारा, सहिष्णुता और करुणा को अपनाने पर बल देने वाले गाँधी ने सभ्यता विमर्श में अहिंसा को जिस तरह से रोपा उसे सींचकर आगे ले जाने वाला समाज यदि बना होता तो हमें अहिंसा के लिए आग्रह न करना पड़ता, आज का सच यही है। गाँधी जी ने अहिंसा को ईश्वरीय सेवा के रूप में भी देखा और उन्होंने परचुरे कुटी में कुष्ठ रोग से पीड़ित व्यक्ति की सेवा करके यह सिद्ध किया कि अहिंसा तो सेवा-संस्कृति का वाहक है। जब तक कोई किसी के प्रति प्रेम नहीं रखेगा, वह सेवा कर ही नहीं सकता। सिलिये गाँधी जी की संवेदना को पहचानना आवश्यक है कि उनकी अहिंसा कि ध्वनि कहाँ से निकल रही है। वैष्णव जन ते तेने जे कहिये पीड़ पराई जाणे रे। यह सुंदर भजन गाँधी जी प्रतिदिन अपने आश्रमों में प्रार्थना में गाते थे। इसके पीछे उद्देश्य यह था गाँधी जी का कि लोग पीड़ को समझ सकें, उसे पहचान सकें, उससे जुड़ सकें। उनका उद्देश्य केवल प्रार्थना करना या उसमें शामिल होना नहीं था। ऐसी ही एक महत्वपूर्ण दिनचर्या का हिस्सा था कि शौचालय में स्वच्छता के लिए स्वतः संलग्न होना। वह यदि लोगों से प्रेम करने की अपेक्षा नहीं करते टी कदाचित यह भी नहीं कहते कि शौचालय की सफाई खुद करनी चाहिए। सेवा से संस्कार की ओर बढ़ने के ऐसे गुण गाँधी से कोई सीख सकता है और यह तो निर्वैक्तिक प्रेम है और इसी के मूल में तो अहिंसा है और ईश्वर का दर्शन है। गाँधी चेताते हैं कि अगर प्रेम या अहिंसा हमारे जीवन का धर्म नहीं है, तो समय-समय पर होने वाली उन लड़ाइयों से हम बच नहीं सकते। जो भयंकरता में एक से बढ़कर एक होती हैं। (द्रष्टव्य: 26 सितम्बर, 1936)

गाँधी के अहिंसा की अनेकों कहानियां पुस्तकों और भाषणों का हिस्सा न बने और हमारे समाज का संस्कार बने तो आप सोचें कैसा भारत और विश्व? कैसी हमारी सभ्यता और संस्कृति होगी? अहिंसक होगी न? गाँधी को स्मरण करना नहीं गांधी को जीना एक अनुशासन है यदि हम इस अनुशासन को अपना लें तो प्रेम की रसधारा मधुमय हो जाएगी।


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