अपने होने का उत्सव

कल्पना मनोरमा
परक्राम्य पालन (या "नेगोशिएबल पेरेंटिंग") का अर्थ है माता-पिता और बच्चों के बीच शक्ति के प्रेमिल समीकरणों और खुरदुरे संघर्षों का उचित प्रबंधन! माने थोड़ा तुम हमारी ओर चलो, और थोड़ा हम तुम्हारी ओर चलें। और इस तरह करते हुए दोनों के अनुमोदन से ऐसा धरातल निर्धारित करें जहाँ ठहरकर दोनों खुलकर साँस ले सकें। दोनों ही अपने-अपने जीवन क्षेत्र में मुक्त कंठ से एक दूसरे की सराहना कर सकें और दोनों अपने ‘स्पेस’ में अपने होने का उत्सव मना सकें। ये नहीं एक तरफ से बस निर्देशित स्वर ही गूँजता रहे और दूसरी तरफ़ से नजरें झुकाए किसी के आँसू टपकते रहें।

"नेगोशिएबल पेरेंटिंग" में अभिभावक बच्चे से कहता है, "तुम आगे-आगे चलो, मैं तुम्हारे पीछे खड़ा हूँ।" और पारंपरिक अभिभावक कहता है, "मैं हमेशा तुमसे आगे रहूँगा क्योंकि मेरे हाथ-अनुभव की मंजूषा है, इसलिए तुम बस मेरे पाँव के निशान खोजते हुए चले आओ, तुम्हारा भला हो जाएगा।"

"नेगोशिएबल पेरेंटिंग" में अभिभावक एक व्यक्ति के रूप में होता है। नेगोशिएबल अभिभावक जानता है कि जैसे लकड़ी के भीतर आग सुप्त अवस्था में पड़ी रहती है। उसी प्रकार एक बच्चे के अंदर पूर्ण पुरुष बैठा है। जिसकी भावनाओं का सम्मान करना ज़रूरी भी है और लाजमी भी। वह बच्चे के दुःख-दर्द में उसके स्थान पर खुद को रखकर देखता है। उसकी छोटी-छोटी भावनाओं के बारे में सोचता है। लेकिन पारंपरिक परिवेश में अभिभावक "अहं ब्रह्मस्मि" की भूमिका में होता है। परंपरावादी पेरेंटिंग में माता-पिता व्यक्ति नहीं ‘देव’ बन जाते है। और इसी बनने-मानने में उपजती है गहरी संवाद हीनता। जो ताउम्र बच्चे का पीछा नहीं छोड़ती।उसकी भावनाओं का इतना हनन हो चुकता है कि वह शीशे में अपनी ही सूरत देखकर कभी-कभी खुद से ही पूछता है, “तू कौन है? क्या कर रहा है इस दुनिया में।” 

हमारे समाज में रुढ़िवाद अभिभावक ये भूल जाते हैं कि जो हम बाहर देखना चाहते हैं, उसकी शुरुआत भीतर से होती है। यानी कि बच्चा जैसा अपनों के बीच आँगन में बर्ताव करेगा लगभग-लगभग चौपाल में वैसा ही होगा। लेकिन नहीं, वे तो गर्व से कहते हैं कि हमारा देश पुराणों, कथाओं, लोक-कथाओं और ग्रन्थों वाला देश है। मैं अपने बच्चे को सुई की नोक से काढ़ा हुआ है। यहाँ हर बच्चे से राम वाले आदर्श अपनाने की कमाना की जाती है, "प्रात काल उठि कै रघुनाथा, मातु, पिता, गुरु नावहिं माथा।” ऐसी चाहना रखने वाले माता-पिता से कोई पूछे कि क्या वे दशरथ और कौशल्या हैं?

माता-पिता जिस संस्कृति की दुहाई देते थकते नहीं हैं, उसके बारे में क्या ठीक-ठीक ज्ञान है भी उनके पास? या हवा में दीवार उठाना भर उनकी नियति है? वैसे हमारे यहाँ पग-पग पर उक्तियाँ, सूक्तियाँ, मुहावरे और शोधपरक उदाहरण दे-देकर बात करने का चलन है, जो उत्तम से भी उत्तम माना जाता है। हम क्यों किसी ऐरेगैरे-नत्थूखैरे की बात सुनें, वाली जिद के साथ जीवन जिया जाता है। 

अच्छी बात है। अपनों के द्वारा बनाई गयी परम्पराओं का सम्मान हम नहीं करेंगे तो कौन करेंगा! हमारे दिलों में मिली हुई विरासत के प्रति सदैव आदर होना चाहिए। फिर चाहे भौतिक हो या वैचारिक। क्योंकि ‘दाता’ बेहद उदारमन से किसी को कुछ सौंपता है। उस पर एक विचारशील-चिंतनशील व्यक्ति तो नितांत एकांत को पी-पीकर कुछ वैचारिक हीरे हमारे समक्ष परोसता है। हमें उन महान आत्माओं की बातों का मनन-चिन्तन करना ही चाहिए। और अपनों को बताना भी चाहिए लेकिन सही अनुपात और सही अर्थ में। ताकि अनुसरण करने वाला भटके और मुरझाये नहीं। हमें हमेशा याद रखना होगा कि असंगतियों के बीच सुसंगति लाने से कहीं ज्यादा जरूरी है सुसंगत प्रतीत होने वाले दैनिक जीवन में छिपी हुई असंगतियों का उद्घाटन करना।

खैर, हमारे यहाँ होता क्या है - सूत्रों का नाट्य रूपान्तरण। समाज से सीखी हुई उक्तियों को व्यक्ति विशेष अपनी पैनी बुद्धि से चुनाव नहीं करता बल्कि वह केवल उनकी बातों की परछाइयों की समालोचना करता है। कथनों को तोड़-मरोड़ कर जितनी समझ वह रखता है, बोल-खोलकर अपना काम चलाते हुए जीवन जीता है। बच्चा क्या सोच रहा होगा, उससे उसको कतई कोई लेना देना नहीं। जबकि अतिवाद और लापरवाही दो ऐसे तत्व हैं जो सर्वनाश का कारण बन सकते हैं। 

पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी का कथन याद आता है- "असंगति में संगति लगा-लगाकर आनन्द पाने का मनोभाव इस देश में बहुत पुराना है।" यही वह मनोभाव है जो परम्परावाद को जन्म देता।" (जस का तस या बस) निबन्ध से।

उसी प्रकार एक और उदाहरण देखिए- 
“रोको मत, जाने दो। 
रोको, मत जाने दो।” 
साधारण से दिखने वाले इन दो वाक्यों में एक विराम चिन्ह की गलती से ही कोई किसी को महत्वपूर्ण और किसी को निस्सार महसूस करवा सकता है। तो बच्चों के आगे दिन-रात अपना राग आलापने वाले अभिभावक अपनी संतानों की विचारशीलता की कितनी हानि करते होंगे! उनके मन तो कितने कोमल होते हैं। जो परम्पराएँ हमें मूढ़ बनाकर हमारा दोहन करने लगें उनके आगे नतमस्तक होना कहाँ की अक्लमंदी है? लेकिन ये बात बच्चा बोल नहीं सकता। यहाँ तो घुटकर मरने के नियमों को घुट्टी में पिलाये जाने का चलन है।

रामचरित मानस की एक चौपाई को ही देखें- 
“ढोल गँवार सूद्र पसु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी।“

इस चौपाई को जब तक मैंने खुद नहीं पढ़ा-समझा तब तक मुझे यही लगता रहा, चौपाई का जो अर्थ समाज ले रहा है, वही सही है। किसी भी शब्द का मनमाना अर्थ गढ़ना वैसे तो अपराध की श्रेणी में आना चाहिए लेकिन हमारे समाज में ये अद्भुत कला के रूप में स्वीकार्य है। जिसमें हमारा समाज निष्णात भी है।

मैं कहती हूँ कि अगर चौपाई को अपनी ही तरह से देखना था तो ठीक भी था। लेकिन उसका अर्थ का अनर्थ तो न करते। माना कि हमें जितने की जरूरत होती है, उतना ही हम ग्रहण करते हैं। तो सही अर्थ तो ले लेते, उसमें ढिलाई क्यों? जैसा कि सर्व विदित है कि तुलसी दास जी ने रामचरित मानस की रचना अवधी बोली में की है। तो उस ग्रन्थ का उदाहरण देने के लिए या तो आपको उस बोली का पूरा ज्ञान होना चाहिए था और यदि कमतर था तो किसी ज्ञानी की शरण में जाना चाहिए। कम से कम ‘ताड़ना’ शब्द का अर्थ तो सही लिया जाता। ना कि 'ताड़ना' का मतलब ‘लतियाना’ मान लेना। न ऐसा होता न कोई बच्चा बागी होकर घर छोड़ता। 

यहाँ मैं साफ कर दूँ कि अवधी बोली में ‘ताड़ना’ शब्द का अर्थ होता है- अतिरिक्त देख भाल करना, एकाग्र होकर किसी को निहारना या अपनी निगरानी में रखकर उन तत्वों को जीवन जीने के लिए प्रेरित करना जिनमें अपनी देखभाल स्वयं करने की क्षमता नहीं होती है क्योंकि उस समय प्रचलित जातिवाद और स्त्री की दुर्दशा के बारे में कौन नहीं जानता है।

रही बात ढोल या ढोलक की तो ये अपने आप में बेहद नाजुक वाद्य यंत्र है। जब तक बच्चा का आत्मबोध परिपक्व नहीं होता इन्हीं पाँच के तरह से ही हमारा शिशु होता है। ढोल के रख-रखाव में अगर ज़रा सी भी कोताही बरती गयी तो उसके पुरों को नुकसान पहुँच सकता है। चूँकि ढोलक के पुरे जानवरों की खाल से बनाये जाते हैं इसलिए चमड़े की गंध से तरह-तरह के कीड़े-मकौड़े और सीलन के कीड़े उसकी ओर शीघ्र आकर्षित होते हैं और नतीज़ा ढोलक के पुरों को चुन जाना। या किसी भी नुकीली चीज़ से उनका फट जाना। और यदि बार-बार ऐसा होता रहा तो उसके मढ़ने-मढ़ाने में बेजुबान निरीह जानवरों की हत्या करनी पड़ेगी। इसलिए तुलसी दास को कहना पड़ा कि अन्य चार के साथ ढोल को भी ताड़ना में रखना उचित कहलाएगा। मैं कहती हूँ कि शिशु को भी अतिरिक्त देखभाल के साथ ही बड़ा करना होगा। 

लेकिन भारतीय समाज ने ढोल के विषय में ताड़ना को ऊपर पड़ने वाली 'थाप' या शिकंजा कसने के रूप में देखा। मतलब जितनी जबर थाप उतनी सुंदर ध्वनि। शिकंजा कसने का रूप कितने स्थान पर कितना वीभत्स हुआ है। उस बच्चे के बारे में सोचकर देखो जिसके ऊपर ‘ताड़ना’ की गयी होगी।लेकिन क्या उसका प्रतिफल उचित मिला होगा? सही नतीजे पर पहुँचाना असम्भव है।
 
आत्माभिव्यंजना वाले अभिभावकों के विचार इतने स्वयंभू होते हैं कि उनके यहाँ दैनिकी की अभिव्यंजना पहले आती है, जीवन बाद में। असलियत पीछे दिखावा आगे रहता है। जबकि समझदार अभिभावकों ने बताना भी चाहा कि परवरिश को अलग ढंग से देखो। लेकिन नहीं भाई! हम तो अपने ही हिसाब से अपने आत्ममोह का प्रचार-प्रसार करेंगे। अंततोगत्वा हमारे समाने ‘ताड़ना’ शब्द का पर्याय बना बेजुबानों-निरीहों को मारना, कूटना-चिल्लाना, दण्डित करना। मतलब यदि सीधे शब्दों में कहा जाए तो तुलसी दास का दिया शब्द ‘ताड़ना’ भारतीय परिवेश में अत्याचार का पर्याय बन गया। लेकिन क्या तुलसी का समन्वयवाद किसी ने नहीं देखा? जहाँ अभिभावक को अपने बच्चे को नीर-क्षीर विवेक की समझ बढ़ाने में मदद करनी चाहिए थी। उनकी कोमल भावनाओं को हौंस के साथ बढ़ाना चाहिए था वहीँ वे उसे ढोल की तरह बजाने लगे। उसके उठने, बैठने और बोलने पर प्रतिबन्ध लगाने लगे। 

हमारे यहाँ नकल करने की बुरी आदत है। हम लोग उगते सूरज की दिशा में कम, ढलने वाली दिशा में टकटकी लगाये ज्यादा बैठे रहते हैं। यानी कि सभी अपने जीवन में पाश्चात्य सभ्यता का असर देखना चाहते हैं। फिर चाहे शिक्षा हो, साहित्य हो या फैशन की बात हो। ठीक भी है, हम माँ के उदर से सब कुछ सीख कर नहीं आते हैं। इसलिए कुछ नया सीखने के निहितार्थ उद्यम करना भी ज़रूरी है। इसीलिए कहा भी जाता है कि सिक्के के दोनों पहलुओं को देखकर चलना ही बुद्धिमानी है। बस इसी तथ्य पर नकल करने की बुरी आदत भी क्षम्य हो जाती है। इस बात को हम सभ्यता की दृष्टि से भी देखने लगते हैं। लेकिन अभिभावकीय तानाशाही में ये युक्ति भी बे-असर होती-सी जान पड़ती है। यहाँ के पुरुष सत्तात्मक विचारधारा वाले अभिभावक अपनी ही पेरेंटिंग को सही मानते हैं। 

आज के भारत की बात की जाए तो जहाँ तक शिक्षा का उजास पहुँच चुका है, वहाँ तक कुछ-कुछ अच्छा दिखने लगा है। बाकी ढाक के तीन पात वाली बात ही है। अभी भी समझदार अभिभावकों की गिनती उँगलियों पर की जा सकती है। कहा ये जाता है कि चाहे घर हो या देश, जब तक छोटी इकाई से लेकर बड़ी इकाई तक सब एक मत होकर मानने योग्य बातों का अनुसरण नहीं करते हैं, तब तक कुछ अच्छा हासिल नहीं होता।

अब बात करती हूँ उन माता-पिताओं की जो स्वयं को बच्चों के जीवन की धुरी होने की बात कहते हैं। ठीक भी है। उनकी परवरिश ही बच्चों को आकार-प्रकार प्रदान करती है। कहा भी जाता है कि माता-पिता ही हमारे पहले गुरु होते हैं। देने वाले ने सूत्र भी अभिभावकों को दिया है-
"गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़ै खोट। अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट” 

लेकिन इस बात से उन्होंने बस दो शब्दों का ही चुनाव किया, ‘एक गुरु और दूसरा गढ़ि-गढ़ि’ और बैठ गए शिशु रूपी कुम्भ को गढ़ने। ऐसा नहीं है कि कोई मोल-भाव करना नहीं जानता, सब जानते हैं लेकिन इस केस में नहीं।

जिन अभिभावकों को "नेगोशिएबल पेरेंटिंग" की कला न आती है, और न ही उनको सीखने की तमन्ना है, वे कहते हैं, "हम अपने बच्चे को अपने से अलग समझते ही नहीं हैं। तो उनके व्यक्तित्व को भला अलग रूप में कैसे स्वीकारें।" उनसे इन बातों का कारण पूछने पर वे बताते हैं कि उन्होंने अपने प्राणों को अपने बच्चे के भीतर रख रखा होता है। इसलिए वे उनको सहेजने में कुछ भी उपाय कर सकते हैं। बच्चों के जीवन के प्रति उन्हें सफ़ेद को काला और काले को सफ़ेद कहने का पूरा प्रमाणित अधिकार है। 

ऐसे अभिभावकों के लिए उनका बच्चा एक ऐसा खिलौना है, जिस पर जब चाहें वे गरज-बरस सकते हैं। जब नजरंदाज करना चाहे कर सकते हैं। दूसरों का गुस्सा, अपनी गलतियों की निराशा उन पर निकाल कर अपने को हल्का महसूस करवा सकते हैं। और जब वे अकरणीय कार्य कर रहे हों तो वे चाहते हैं कि उस दौरान उनका बच्चा श्रवण कुमार की तरह बर्ताव करे। उनकी बेवकूफियों पर वह निरीह जीव मुस्कुराता रहे जो अपनी भावनाओं में टूट कर बिखर चुका है।

वे भूल जाते हैं, वही बच्चा जिसको उन्होंने तोता बना डाला है, आगे चलकर जब अपना संसार रचाएगा तब वह अपने भीतर आत्मविश्वास कहाँ से ला पायेगा? लेकिन नहीं, माता-पिता के दिमाग में अपने बच्चों का धैर्यवान, समझदार और क्षमाशील बनाने का कीड़ा तब ज्यादा घुसता है जब वे भयंकर डांट रहे होते हैं। कोई उनसे पूछे! क्या वे ऐसा कर सकते हैं? क्या वे अपमान पीकर खुश रह सकते हैं? जबकि कितनी बार बच्चा ये तक नहीं समझ पाता है कि जिसके लिए उसे डांटा जा रहा है आख़िर उसमें उसकी गलती क्या है?

बात यहीं खत्म नहीं होती है। जब तिरस्कार के जनकों को शिशु पालन में अपनी अक्षमता का भान होने लगता है तब वे उस व्यक्ति की खोज करते हैं जो उनसे भी ज्यादा आत्मकेंद्रित और मूडी होता है। जो क्रूरताओं की हदें पार करना जनता है। एक तो पहले खुद इतने महान होते हैं कि बच्चे के आत्मसम्मान के साथ उसका आत्मविश्वास चाट जाते हैं। ऊपर से उन महान रिश्तेदार या व्यक्ति के आगे अपनी संतति को खड़ा कर देते हैं जिसको जिन्दगी को कैसे जीना चाहिए तक नहीं पता होता है और ये बड़े विनम्र होकर कहते हैं, “लीजिये भई! मैंने तो देख लिया उपाय करके, अब आप ही इसे सुधार दीजिये।” और पदवी पाए वे लोग आँखें मींच जी-जान से जुट जाते हैं। उस समय बच्चा यदि कह सकता तो ये कहता-
साधो आज मेरे सत की परीक्षा है 
आज मेरे सत की परीक्षा है 
बीच में आग जल रही है 
उस पर बहुत बड़ा कड़ाह रखा है 
कड़ाह में तेल उबल रहा है 
उस तेल में सबके सामने हाथ डालना है 
साधो आज मेरे सत की परीक्षा है।
(विजय देव नारायण साही, साखी में संकलित कविता "सत की परीक्षा" से साभार)

माना कि जीवन देने वाला सदैव बड़ा होता है इसलिए उसका नियन्त्रण भी पूरा होना चाहिए पर क्या बच्चे के आत्मसम्मान को रौंदकर? उसको बात-बात पर गलत ठहराकर, तरह-तरह की फब्तियाँ- कुबोलों के कशीदे कसकर? हाँ जी, ये सारे नुस्ख़े हमारे समाज के मान्य नुस्ख़े हैं। इन सबके बाद भी यदि अभिभावक का मन नहीं भरता है तो वे बच्चे के जीवन को सँवारने के लिए किसी ख़ास उत्सव का इन्तजाम करते हैं।
 
जब समय का चुनाव सही-सटीक बैठता है, और घर या सामाजिक सरोकारों वाले स्थल जहाँ लोगों से खचाखच भरा माहोल होता है। वे बच्चों के लिए ऐसे गुरु टाइप लोगों से टिप्पणियाँ लेना शुरू कर देते हैं जो खुद अक्ल के अंधे होते हैं और जिन्हें नमक और बर्फ में अंतर तक पता नहीं होता!

उक्त बातों को मद्देनजर रखते हुए भारत की पारंपरिक पेरेंटिंग सफल मानी जाती है। और ‘नेगोशिएबल पेरेंटिंग’ हमारे भारतीय वातावरण में परिहास का विषय बन जाती है। यहाँ किसी सभ्य माँ-बाप को अपने बच्चे की बात को अहमियत देते, उनके साथ हँसते-बोलते यदि देख लिया जाता है तो कहा जाता है, ”फलाने ने अपनी औलाद को सर पर बैठा रखा है, जब कान खिचेंगे तब पता चलेगा।”

सताए हुए बच्चे के लिए कबीर अपनी साखी में कहते हैं-
कबीर जदि का माइ जनमिया, कहूँ न पाया सुख 
डाली-डाली मैं फिरया, पातौं-पातौं दुःख।

जबकि आत्मसम्मान से आत्मरक्षा करना हर मनुष्य का जातीय मामला है। आज नहीं तो कल वह बच्चा बड़ा होगा और अपने साथ हुए बुरे व्यवहार का बदला वह जरूर लेगा। ऐसे ही नहीं भारत में बृद्धा आश्रमों की बढ़त होती जा रही है। हमें विचार करना ही होगा। वीणा के तारों को उतना ही कसिये जितने से संगीत की मधुरिम ध्वनि हमारे कानों के साथ आत्मा को आलोड़ित कर सके ...अस्तु!
***

लेखिका के बारे में
कल्पना मनोरमा, कानपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में परास्नातक एवं बी.एड. इग्नू से एम.ए (हिंदी भाषा), सम्प्रति-अध्यापन व स्वतंत्र लेखन, प्रकाशित कृतियाँ - प्रथम नवगीत संग्रह - "कब तक सूरजमुखी बनें हम", "बाँस भर टोकरी", काव्य संग्रह “ध्वनियों के दाग़”।

सम्मान- दोहा शिरोमणि 2014 सम्मान, वनिका पब्लिकेशन द्वारा (लघुकथा लहरी सम्मान 2016), वैसबरा शोध संस्थान द्वारा (नवगीत गौरव सम्मान 2018), प्रथम कृति पर- सर्व भाषा ट्रस्ट द्वारा (सूर्यकान्त निराला 2019 सम्मान ) आचार्य सम्मान (जैमिनी अकादमी पानीपत हरियाणा, 2021) kalpanamanorama@gmail.com मोबाईल-8953654364 संपर्कसूत्र- बी.24 ऐश्वर्यम अपार्टमेंट/प्लाट संख्या 17/ सैक्टर 4 द्वारका / नई दिल्ली - 110075

1 comment :

  1. बहुत अच्छा लिखा। अभिभावक को इससे शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए।

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