माॅरीशस की सशक्त हिन्दी बाल कहानियाँः "रिमझिम की फुहारें"

विजय कुमार तिवारी

समीक्षित कृति: रिमझिम की फुहारें (मॉरिशस की पच्चीस बाल कहानियाँ)
कहानीकार: डा० बीरसेन जागासिंह
प्रकाशक: स्टार पब्लिकेशस प्रा. लि. नई दिल्ली

बाल कहानी लेखन सहज भी है और जटिल भी। प्रायः सभी रचनाकार उस दौर से गुजरे होते हैं, बच्चों के मन की उड़ान को समझते हैं, उनकी आहत भावनाएँ और खुशियाँ स्मृतियों मे बनी रहती हैं तथा सार्थक कल्पनाएँ कुलबुलाती रहती हैं कि कैसे बाल-मन को स्वस्थ, जागरूक, चेतन और सृजनशील बनाया जा सके। यह कार्य बाल कहानियाँ लिखकर किया जा सकता है और दुनिया भर में किया जाता है। कहानी लेखन विकास यात्रा की तरह बाल कहानी लेखन की भी विकास यात्रा है और हर देश में इस दिशा में शोध, संरक्षण, प्रोत्साहन के कार्य हो रहे हैं।

बीरसेन जागासिंह
दुनिया के हर देश में बाल कहानियाँ लिखी जा रही हैं, पुस्तकें छप रही हैं और बाल कहानी लेखन में सुधार, परिष्कार और विकास हो रहा है। हमारे यहाँ पंचतंत्र की कहानियाँ प्राचीन काल में लिखी गयीं, जंगल की कहानियाँ लिखी गयीं और बाल मन के विकास, नैतिक-व्यावहारिक शिक्षा की कहानियाँ खूब लिखी जाती रहीं हैं।

अभी हाल में ही मुझे मॉरिशस के सुप्रसिद्ध, वरिष्ठ लेखक डा० बीरसेन जागासिंह द्वारा लिखित बाल कहानी संग्रह "रिमझिम की फुहारें" मिला है जिसमें मॉरिशस की पच्चीस हिन्दी बाल कहानियाँ संग्रहित हैं। मेरे लिए सुखद संयोग रहा है, दिल्ली के गुजरात भवन में उनकी पुस्तक 'मेरी प्रेरणाओं के स्रोत' के लोकार्पण में मैं भी उपस्थित था और उन्होंने अपनी पुस्तक मुझे अपने हाथों दिया था। उस पुस्तक पर लिखी मेरी समीक्षा कनाडा की पत्रिका साहित्यकुञ्ज में छपी और महात्मा गांधी संस्थान, मॉरिशस की पत्रिका 'बसंत' के नवीनतम अंक में भी प्रकाशित हुई है।

विजय कुमार तिवारी
डा० बीरसेन जागासिंह अपने 'दो शब्द' में लिखते हैं, "कुछ कहानियाँ निम्न प्राथमिक स्तर के छात्रों के लिए हैं और कुछ उच्च प्राथमिक स्तर के जबकि कुछ निम्न माध्यमिक स्तर के। कुछ कहानियाँ लम्बी हैं। छात्रों की आयु, रुचि, योग्यता और चारित्रिक विकास के लिए आवश्यक जीवन-मूल्यों का समावेश किया गया है।" डा० जागासिंह को अनेकों साहित्यिक पुरस्कार, सम्मान मिले हैं और भारत में भी उन्हें खूब पढ़ा जाता है। 

'प्यारी सरला' छोटी सी बच्ची स्कूल जाने वाली है, दादा-दादी और माँ सभी चिन्तित व उदास हैं। सरला खुश है, यूनीफार्म पहनती है, अपना बस्ता उठाती है और बाई-बाई करती है। उसमें जिम्मेदारियों का बोध है, माँ को हिदायतें देती है और माँ उसे चूम लेती है। उसका स्कूल जाना शुरू है, वह डरती नहीं, खुलकर बातें करती है, गायत्री मंत्र, त्वमेव माता का पाठ हाथ जोड़कर करती है। उससे घर और स्कूल के सभी लोग प्रसन्न हैं। कहानी का संदेश यही है-अच्छे बच्चों को सभी चाहते हैं। 'ई-मेल' छोटे-छोटे बच्चों को आधुनिक तकनीक से जोड़ती, रिश्ता निभाने वाली कहानी है। बिना कागज पर पत्र लिखे, बिना डाक-घर गए, बिना डाक-टिकट के, बिना पन्द्रह दिन इंतजार किए पत्राचार का सुगम साधन ई-मेल है। बाल कथाकार ने 'विद्यार्थी-जीवन" कहानी में जीवन निर्माण का सम्यक सार्थक चित्र खींचा है। अजेय आदर्श चरित्र प्रस्तुत करता है, सबका प्रिय और सभी विद्यार्थियों के लिए अनुकरणीय है। यह पंक्ति ध्यान देने योग्य है, "जो विद्यार्थी पढ़ाई के दिनों में खेल-कूद में मिल-जुल कर खेलता है, वही बड़े होने पर समाज में सहयोग और भाईचारा बढ़ाता है।" अजेय की सक्रियता और समय-विभाजन चमत्कृत करते हैं। 'छोटी राधा का बड़ा ज्ञान' सहयोग-सहकार का संदेश देती सुंदर कहानी है। परिस्थितियों के बीच सर्वहित में मार्ग निकालना और नेतृत्व करना इसका संदेश है। 'माँ का दिल' मार्मिक संवेदनाओं से भरी कहानी है। जिन बाल-बच्चों ने, अपनो ने उसका सब कुछ हथिया लिया, उसे घर से निकाल दिया, बड़े पदों पर आसीन उन बच्चों की इज्जत-प्रतिष्ठा की चिन्ता ऐसी माँ ही कर सकती है। हमारे निष्ठुर समाज की सच्चाई है इस कहानी में। जागासिंह अपने आसपास की गहरी पड़ताल करते हैं और बेहतरीन कहानी बुनते हैं। ऐसी कहानियाँ बालकों के चरित्र-निर्माण में सहायक होती हैं और समाज का भला करती हैं।

'दादा की शादी' अगली पीढ़ी को अपनी परम्परा, रीति-रिवाज और शादी जैसे उत्सवों से परिचित करवाती है, पीढ़ियों को जोड़ती है। शादी आदि के अपने तौर-तरीके होते हैं, अपनी शब्दावली होती है, एक गाँव का लड़का, दूसरे गाँव की लड़की, तत्कालीन आवागमन के साधन, विधि-व्यवहार और जुड़ते सम्बन्ध बच्चों को जोड़ते हैं और बच्चे अपनी परम्परा के ज्ञान से समृद्ध होते हैं। डा० जागासिंह के पास चमत्कृत करने वाली शैली और भाषा है जिससे संदेश का सम्प्रेषण रोचकता पूर्वक हुआ है इन कहानियों में। संवाद प्रभावित करते हैं। वे शब्दों के द्वारा दृश्य की रचना करते हैं और बच्चों का शिक्षण करते हैं। 'आज्ञाकारी टींकी' में अनुशासित रहने और आज्ञाकारी होने का लाभ दिखाया गया है तथा जीवन के खतरे भी। 'निरोग पपो बीमार' में पवन नाम के अपभ्रंश होकर पपो बन जाने की कहानी है। ऐसे ही दुनिया में चीजें कालक्रम में अपभ्रंश होकर बदलती रहती हैं और मूल का लोप हो जाता है। यह कहानी संदेश देती है कि अधिक लाड़-प्यार से बच्चे का विकास बाधित होता है और वह स्वतः संघर्ष करना भूल जाता है। नाम में क्या रखा है? का बाल मनोविज्ञान 'कागज का नाम' कहानी बखूबी समझाती है। 'रमन का पक्षी प्रेम' जीव-जन्तुओं, पक्षियों से प्रेम की सुन्दर कहानी है। कहानी का संदेश भी है कि मनुष्य द्वारा उनके खोतों, अंडों या बच्चों को छू लेने से गौरैया छोड़ देते हैं। जागासिंह जी लिखते हैं-"सच है कि प्रेम बाँटने से प्रेम मिलता है।"

अगली कहानी 'विद्या सच्चा धन है' बाल मनोविज्ञान की कहानी है। अक्सर हम दिखावे में भटक जाते हैं और दबा हुआ महसूस करते हैं। मनोज को समय के साथ ज्ञान होता गया है और वह सच्चे धन विद्या को प्राप्त करने के लिए संकल्पित होता है। ज्ञान और अनुशासन भीतर से जागे, वही श्रेष्ठ होता है। हर बच्चे को स्वतः अनुभूति होनी चाहिए। जागासिंह जी अपनी कहानियों में मुहावरों का प्रयोग करते हैं, बिंबों द्वारा सहजता से ज्ञान देने की कोशिश करते हैं और बच्चों में संस्कार डालना चाहते हैं। किसी भी लेखक द्वारा राष्ट्र निर्माण की यह बड़ी जिम्मेदारी होती है। 'प्यार की अपार शक्ति' विनोद के जीवन में स्नेह और प्यार के कारण बदलाव की अद्भुत कहानी है। विनोद को पहले तिरस्कार मिलता था, वह शरारती होता गया। सांप को पकड़कर गन्ने के खेत में छोड़ देने की घटना के बाद उसे आदर, स्नेह, प्यार और सम्मान मिलने लगा। वह बदलने लगा और आदर्श छात्र बन गया। 'कात कोको' ऐतिहासिक सन्दर्भ लिए, देश प्रेम, शिक्षा, मानवीय भावनाओं को समझना और सहयोग-सहकार के साथ जीना जैसे मानवीय मूल्यों की कहानी है। 'लालच बुरी बला होता है' शिक्षाप्रद कहानी है। दो मित्रों की दोस्ती एक के लालच के चलते प्रभावित होती है परन्तु दूसरा अपना धर्म निभाता है, मदद करता है और कहानी संदेश देती है कि कभी लालच नहीं करना चाहिए। 'अष्टभुज हार गया' कहानी में स्वार्थी, अहंकारी की हार होती है, का संदेश है। समाज पहले खूब स्वागत, सम्मान करता है परन्तु व्यवहार, विचार सही नहीं हो तो वही समाज उसका विनाश कर देता है। ऐसी कहानियाँ बच्चों के चरित्र निर्माण में बड़ी भूमिका निभाती हैं।

डा० बीरसेन जागासिंह अपनी कहानियों मे मॉरिशस का धरातलीय, भौगोलिक स्वरूप चित्रित करते हैं, समुद्री जीवन, खेती-बारी व जलवायु की जानकारियाँ देते हैं और देश के बच्चों के मन-मस्तिष्क को ज्ञान से भर देना चाहते हैं। शब्द ज्ञान, भाषा ज्ञान और व्यावहारिक जीवन का ज्ञान उनके विकास में सहायक होने वाले हैं। 'दे फ्रेर' विस्थापन, संघर्ष और निःस्वार्थ सेवा की कहानी है। किसी की गरीबी पर, उसके संघर्ष पर हँसना नहीं चाहिए। अच्छे दिन आते हैं तो बहुत कुछ बदलने लगता है और उन्हीं के पास जाना पड़ता है व रिश्ते बनाने पड़ते हैं। कहानी यह भी संदेश देती है कि ईश्वर हर किसी को कुछ न कुछ विशेष हुनर दिए रहता है जिससे उसकी कीर्ति फैलते देर नहीं लगती।

डा० बीरसेन जागासिंह की चर्चित कहानी 'सिंह पर्वत-एक आत्मकथा" में मॉरिशस का प्राचीनतम नाम 'श्वेत-द्वीप' बताया गया है। यह मेरी अर्थात सिंह की आत्मकथा है। महाभारत युद्ध के बाद मेरे स्वामी आर्यवीर ने अपना देश भारत छोड़ दिया और मुझे साथ लिए श्वेत-द्वीप में आ बसे। आर्यवीर के सामने खेती योग्य भूमि के तलाश की समस्या थी। स्वामिनी ने कहा-'स्थान बदल दें, शिविर अन्य जगह स्थापित करें, जहाँ खेती सम्भव हो।' दक्षिण दिशा में विस्तृत भूमि मिली जहाँ न कोई जंगली पशु थे, न जहरीले सर्प और पूर्व में मानव-निवास का कोई संकेत भी नहीं था। प्रचंड आंधी और मूसलाधार बरसात ने सब तहस-नहस कर दिया। लोग बिछड़ गये थे। आर्यवीर स्वामिनी और पुत्र यश की तलाश में थे। जलयान जिससे हम भारत से आए थे, वह अपने स्थान पर नहीं था। समुद्र में डूब चुका था। चारों तरफ लाशें ही लाशें थी। आर्यवीर ने कहा-जो हो गया, उस पर रोना व्यर्थ है। इन शवों का दाह-संस्कार किया जाए। आत्मा अमर है। हमें पहाड़ी के उस पार धर्मपत्नी और पुत्र की खोज करनी है। आगे का दृश्य देखकर स्वामी रो पड़े। वहीं स्वामिनी और पुत्र यश का दाह-संस्कार किया गया। कुल 105 लोगों में से मात्र 30 लोग जीवित बचे थे।  पुनः नया जलयान बनाया गया और भारत लौटने की तैयारी की जाने लगी। स्वामी के सामने धर्मसंकट था-तुम दोनों को किसके सहारे छोड़कर भारत जाऊँ? मैं उनकी मनःस्थिति समझ रहा था। मैंने अटूट निर्णय लिया जिसके फलस्वरूप आज मैं "सिंह-पर्वत" हूँ। मैं पहाड़ की ओर दौड़ पड़ा, स्वामिनी और यश के समाधि-स्थल की बगल में बैठ गया और आज भी यथावत उसी आसन में बैठा हुआ हूँ। स्वामी पुनः आने का वादा करके चले गए। मेरा मन आशंकित था, क्षितिज पर काली घटाएँ, तेज हवाएँ तूफान का संकेत दे रही थीं। आज भी मैं प्रतीक्षारत बैठा हूँ। शताब्दियाँ बीत गईं पर मेरे मालिक आर्यवीर नहीं आए। शायद वे तूफान की चपेट में आ गए हों और सकुशल भारत न पहुँचे हों। मेरे शरीर को पत्थर बनने में सदियाँ लगी हैं। मेरा भूरा रंग बदल गया है, मैं आज काला पत्थर हूँ-"सिंह-पर्वत"। यह भावुक करने वाली मार्मिक कथा है जो बच्चों को प्रेरित करेगी।

मॉरीशस की साहित्यिक-सांस्कृतिक चेतना को भारत से जोड़कर देखना, नई-नई कहानियाँ ढू़ँढ लाना जागासिंह जी के रचना कर्म का हिस्सा रहा है। भारत में भी मॉरिशस के लेखकों के प्रति खूब आदर-सम्मान है और आप सभी खूब पढ़े जाते हैं। 'त्रु दो दूस' दोनों देशों से जुड़ी स्वतन्त्रता, संघर्ष और बलिदान की ऐतिहासिक कहानी है। सन्धि कर लेने की बात पर राजकुमार आदित्य का उत्तर हर किसी की रगों में आत्म-गौरव, पुरुषार्थ और देश-प्रेम की भावना भरने वाला है। वे लिखते है-"सैन्य-बल कम था परन्तु मातृभूमि की रक्षा का उत्साह कम नहीं था।" अंग्रेजों ने युद्ध-बंदियों को मॉरिशस के इन टापुओं पर लाकर सड़क, पुल, भवन सहित अनेको निर्माण में लगा दिया। बंगाल के राजकुमार आदित्य का कहीं उल्लेख नहीं है अंग्रेजों द्वारा लिखित इतिहास में, उन्हें वापस कभी भारत भेजा नहीं गया। जागासिंह अपनी कहानियों में मॉरिशस और दुनिया भर के बच्चों को भूले-बिसरे महान चरित्रों से नये सिरे से परिचित करवाते हैं। आदित्य किसी 'ग्रीक देवता' की तरह गिरमिटिया लोगों के बीच 'दादा' के रूप में जाने जाते थे। वे समुद्र तट पर जा बसे जिसे आज 'त्रु दो दूस' अर्थात मीठे पानी का कुआँ कहा जाता है। वहाँ पीने के पानी की समस्या थी। राजकुमार आदित्य ने चट्टान तोड़ने की सलाह दी। लोग थक चुके थे। दादा पद्मासन में बैठे प्रार्थना कर रहे थे। एक बार अंतिम प्रयास करने की सलाह दे रहे थे। उन्होंने कहा, 'जब तक माँ दुर्गा की कृपा से मीठा पानी नहीं निकलता, मैं राजकुमार आदित्य यहाँ से टस से मस नहीं होने वाला।' थककर, हारकर, निराश होकर सभी चले गए थे। किसी ने उन्हें साथ ले जाने की बात नहीं की। किंचित निराशा उन्हें भी हुई। सूर्यास्त हो चुका था। उन्होंने एक पत्थर उठाकर कुएँ में फेंका और 'डूबुक' की आवाज सुनाई पड़ी। कुएँ में पानी था। अगली सुबह लोग आये, उन्हें पद्मासन में बैठे पाया, क्षमा-याचना की और उनका शरीर लुढ़क गया। लोग रो पड़े। सबने देखा-कुएँ में पानी निकल आया है, पानी मीठा है। उसी पानी से उन्हें नहलाया गया, थोड़ी दूरी पर उनका दाह-संस्कार किया गया। उनका समाधि-स्थल बनाया गया। कहानीकार की पीड़ा है, आज वहाँ सब कुछ है परन्तु राजकुमार आदित्य को कोई नहीं जानता।

'श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता' की कहानी हम सभी जानते हैं, मित्र-धर्म निभाने की ऐसी मिसाल अन्यत्र नहीं मिलती। डा० बीरसेन जी बच्चों को मित्रता की कहानी सुनाते हुए लिखते हैं-'मित्रता गरीब-अमीर का भेद नहीं मानती। जहाँ सच्चा प्रेम होता है, वहाँ ऊँच-नीच, गरीब-धनी की दीवारें अपने-आप गिर जाती हैं।' 'हीरे चमके धूल में' एक सहज, सरल, स्वाभाविक कहानी है परन्तु इसका अंत सुखद है। मोहना ने अपनी लगन, निष्ठा से सफलता अर्जित की है और सबका प्रिय बना है।

'जोत से जोत जलती है' सेवा-सहयोग की प्रेरणादायी कहानी है। जिस ज्योति को रूपचंद जी ने जलाया, वह सतत जारी है। ऐसी कहानी समाज में गहरा प्रभाव छोड़ती है और सिलसिला चलता रहता है। 'चैन की नींद' कहानी का संदेश यही है, आज के तकनीकी विकास का लाभ उठाकर हम सुख-शान्ति से चैन की नींद सो सकते हैं। हर घटना हमें सावधान करती है और हम सुरक्षात्मक उपाय करते हैं। 'सवेरे उठने से लाभ' जीवन में अच्छी आदतें डालने का संदेश देती कहानी है जिसमें सुबह-सवेरे उठने-जागने के लाभों की चर्चा है। 'छोटे-छोटे प्रश्नों के बड़े-बड़े उत्तर' सहज संवाद की कहानी है जिसमें दादाजी अपनी नन्हीं पोती झंकृता के स्वाभाविक प्रश्नों का सहजता से उत्तर देते हैं और अपनी भारत यात्रा का सारांश समझा देते हैं। यह शैली और भाषा अद्भुत है जागासिंह जी की। 'दीक्षा और प्रतिमा की विदेश यात्राएँ' देशाटन के अनुभवों की कहानी है। दीक्षा भारत जाती है और प्रतिमा इंग्लैंड। जागासिंह जी सम्बन्धों को जोड़ते हैं, बच्चे नई-नई जानकारियाँ प्राप्त करते हैं, उनमें सभ्यता-संस्कृति को समझने की भावनाएँ हैं। इस तरह देखा जाए तो ये सारी कहानियाँ बच्चों के सर्वांगीण विकास में सहायक हैं। इनकी भाषा-शैली, बुनावट, कथ्य-कथानक सब अद्वितीय है।

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