केदारनाथ सिंह की कविताओं से गुजरते हुए

नमिता सचान सुंदर

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“मैं जा रही हूँ - उसने कहा
जाओ- मैंने उत्तर दिया
यह जानते हुए भी कि जाना
हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है।”

यह कविता है केदारनाथ सिंह जी की। साधारण, रोजमर्रा के शब्दों को ऐसी जगह और इस प्रकार फिट कर देना कि कुछ पल को पाठक विस्मय से वहीं ठिठका रह जाये और वे पंक्तियाँ हमेशा के लिए उसके मन में ठहर जायें, यह खासियत है केदारनाथ जी की कलम की। जाना, चाहे वह किसी का दुनिया से जाना हो, दहलीज छोड़ कर जाना हो, मन से जाना हो हमेशा पीड़ादायक होता है और इसका दंश कमोबेश हम सब अपनी अपनी जिंदगी में कभी न कभी झेलते ही हैं पर जाने के दर्द को और उसके पश्चात के परिणामों को उनकी समूची वेदना के साथ मात्र एक वाक्य में यूँ भी कहा जा सकता है, ऐसा तो बस केदारनाथ जी ही सोच सकते थे। जाना एक खौफनाक क्रिया... यह पंक्ति एक गहरी लकीर सी सदा के लिए खिच जाती है मन में। छोटी-छोटी, बेइंतहा सादगी से कही गई चार पंक्तियों में संयोग से वियोग तक का सफर और पीड़ा की मूक कराह सब कह डाला है। बहुत कम शब्दों में जीवन का यथार्थ यूँ कह देना कि मन उद्वेलित हो उठे, शिल्प के एकदम अलग मापदंड स्थापित करते हुए बात यूँ कह देना कि वह हमारे कहीं बहुत भीतर जा कर स्थापित हो जाये, केदारनाथ सिंह जी का कविताई करिश्मा है।

अपने अस्सी बरस के जीवन में उन्होंने लगभग साठ दशकों की काव्य यात्रा की है। उनके  लगभग आठ कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं। अपने समय का य़थार्थ, सामाजिक-राजनीतिक सरोकार, मानवीय संवेदनाओं को समेटे हुए भरा-पूरा रचना संसार है आपका।

सामाजिक संदर्भों में जो भी अन्यायपूर्ण है, गलत है, कष्टकारी है उसके प्रति आपकी कविता में विद्रोह का स्वर है और कवि कर्तव्य के चलते होना ही चाहिए, किंतु केदार जी का विद्रोह आक्रामक एवं आक्रोशपूर्ण नहीं है, वरन् उनका विद्रोही स्वर सधा हुआ है, शांत है, संयत है। ऐसा लगता है कि यह स्वर कहता है कि जीवन और समाज में विसंगतियाँ और पीड़ा तो होंगी ही, हमें उन्हें पहचानना है, ध्यान भी देना है उन पर, किंतु व्य़र्थ की चीख-पुकार में ऊर्जा का ह्रास क्यों करना। संयत हो कर स्थितियों को समझो और बेहतरी के लिए जो कर सकते हो करो।

कविता केदारनाथ सिंह के लिए क्या है, यह समझा जा सकता है उनके कविता संग्रह ‘अकाल में सारस’ की इन पंक्तियों से---
“पर मौसम
चाहे जितना ख़राब हो
उम्मीद नहीं छोड़तीं कवितायेँ
वे किसी अदृश्य खिड़की से
चुपचाप देखती रहती हैं
हर आते जाते को
और बुदबुदाती हैं
धन्यवाद! धन्यवाद!”

आपकी कविताओं में विषयवस्तु की बात करें तो हमारे मन में दो विषय प्रमुखता से उभर कर आते हैं— पशु और नदी।

नदी पर लिखी केदारनाथ जी की पंक्तियाँ बाढ़ में उफनती, हरहराती जलराशि सी नहीं वरन् शांत, स्निग्ध, निर्मल जलधार सी लय में बहती हैं और हर लहर में नदी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की एक अमिट छाप छोड़ती चलती हैं हमारे भीतर। ‘नदी’, ‘बिना नाम की नदी’, ‘मैंने गंगा को देखा’, ‘मांझी का पुल’ — कुछ शीर्षक है आपकी नदी विषयक कविताओं के।
“सचाई यह है
कि तुम कहीं भी रहो
तुम्हें वर्ष के सबसे कठिन दिनों में भी
प्यार करती है एक नदी।”

केदारनाथ जी की ये पंक्तियाँ जब मैंने उनकी ‘नदी’ कविता को बरसों पहले पहली बार पढ़ा था तबसे आज तक हमेशा मेरे साथ रहती हैं, मन को आश्वस्ति से भरती हुई कि जीवन का एक भी पल ऐसा नहीं है जब कोई न कोई, कहीं न कहीं हमारे लिए प्रेम न अनुभव कर रहा हो। नदी प्रतीक है उस मन का, उस आत्मा का ‘जो इस समय नहीं है घर में, पर होगी जरूर कहीं न कहीं. किसी चटाई, या फूलदान के नीचे, चुपचाप बहती हुई।‘ उनकी नदी कभी चुपके से रच देती है एक ‘समूची दुनिया छोटे से घोंघे में’ और कभी उसका दर्द सुनाई पड़ता है ‘मादा घड़ियाल की कराह’ में।
उनके गाँव को चीरती सदियों से चुपचाप बहती बिना नाम की पतली सी नदी में तो हमें प्रतिबिम्बित दिखती हैं वो अनाम जिंदगियाँ जो हमें पोसती हैं, हमारे भीतर के कलुष को सोखती हैं, बरदाश्त करती हैं किंतु स्वयं अपनी अस्मिता और पहचान से वंचित रहती हैं।
“कीचड़ सिवार और जलकुम्भियों से भरी
वह इसी तरह बह रही है पिछले कई सौ सालों से
एक नाम की तलाश में 
मेरे गाँव की नदी।”

नदी को इस तरह से महसूस करने, पहचानने और जीने में संभवतः उनके बनारस प्रवास और गंगा के सान्निध्य का भी बहुत बड़ा योगदान है। बड़ी बारीकी और सहजता से एक पतली लकीर खींचते हैं अपने गाँव की नदी और गंगा के बीच।
“मैं हैरान रह गया यह देख कर
कि गंगा के जल में कितनी लम्बी
और शानदार लगती है
एक बूढ़े आदमी के खुश रहने की परछाईं।”

और जब संझा बेला जाल समेट कांधे पर डाल घर की ओर जाने को उद्यत बूढ़ा मछुआरा कृतज्ञता से गंगा को देखता है तो उसकी आँखों में जो गहन भाव होता है और उसकी आँखें कहती हैं--- “अब हो गई शाम, अच्छा भाई पानी राम-राम”, तो गंगा का पाट मन में माँ के आंचल सा ही लहरा उठता है।[ संदर्भ कविता मैंने गंगा को देखा है] सहज शब्दों का यह अनुपम प्रयोग केदारनाथ सिंह की कलम की वह खासियत है जो उनके भावों को मन की माटी में भीतर तक बो आती है।

बात यदि पशुओं की करें तो उनकी कविता ‘बाघ’ तो बहुचर्चित है ही किंतु उसके अतिरिक्त बैल, बंदर आदि को केंद्र में रख कर लिखी हुई कवितायें भी अपनी भीतरी तहों में बहुत कुछ समेटे हुए हैं, करूणा जीवन का यथार्थ।
बैल कविता की कतिपय पंक्तियाँ हैं –
“वह एक ऐसा जानवर है जो दिन भर
भूसे के बारे में सोचता है
रातभर ईश्वर के बारे में।”

ये पंक्तियाँ पढ़ते हुए बैल और रोटी-पानी के जुगाड़ में लगातार जुटे एक मेहनतकश आम आदमी के बीच की भेद की रेखा धूमिल हो जाती है। ऐसा लगता है न कि बात मात्र बैल की नहीं है वरन् बैल तो निमित्त है। इस कविता की समाप्ति की ओर जब बैल बस्ती के इक्कीस चक्कर लगा अपने हल के सामने खड़ा होता है तो -
“उसे बेहद खुशी होती है
वह पहली बार अपने माथे पर
अपने शानदार सींगों का होना
महसूस करता है

और दूनी ताकत के साथ
जुए के नीचे
अपनी गर्दन रख देता है

सिर्फ
उसके उठे हुए सींग
सिवानों में चमकते रहते हैं
सूर्यास्त तक।”

 श्रम, कर्तव्य निर्वहन की गरिमा एवं उससे उपजी प्रसन्नता, संतुष्टि को इतने अनूठे ढंग से प्रस्तुत किया है कि हमारे दृष्टिकोण को एक नया आयाम मिलता है और सूर्यास्त तक चमकते बैल के उठे हुए सींग मन में संतुष्टि और आत्मसम्मान का रोपण कर देते हैं। यह जीवन की जद्दोजहद से जूझते आम आदमी के संघर्ष के बीच एक मुट्ठी ठंडी हवा का सुख बोध है।

“धूप में घोड़ों पर बहस”, कविता में आँकड़ों का घोड़ों को रौंदना हो या “पक्षी की वापसी” कविता में पक्षी का नाम न याद आना, पक्षी का वापस आना किसी विस्फोट सा अनुभव किया जाना, ये कविताएँ यथार्थबयानी है हमारे सामाजिक परिवर्तन की। साहित्य का सामयिक होना तो उसका दायित्व है ही पर यथार्थ जब कविता में यूँ अभिव्यक्त किया जाता है तो कला की सरसता मन में और विचारों की छाप मस्तिष्क में बाँह गह कर चलती हैं।

आम तौर पर इस डाल से उस डाल तक उछल-कूद करते बंदर नटखट शिशुओं से ही चित्रित किए जाते हैं किंतु केदारनाथ सिंह की करूणा आप्लावित दृष्टि सीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आँखों में नमी पढ़ लेती है। आपके रचना संसार में पशु मिथक, बिम्ब, और प्रतीक तो हैं पर वे अपनी प्राकृतिक सत्ता, आचार-व्यवहार को क्षण भर के लिए भी नहीं खोते हैं। उनके अस्तित्व की, उनके होने की गरिमा को बचाए रखने का ईमानदार प्रयास केदारनाथ जी की संवेदना से हमें सीधे जोड़ता हैं।
केदारनाथ सिंह के काव्य-जगत में पशु संसार की चर्चा तब तक पूरी नहीं मानी जा सकती जब तक बाघ पर बात न हो। बाघ केदारनाथ सिंह जी की एक लम्बी कविता शृंखला है, जिसमें छोटे-बड़े इक्कीस खंड हैं। प्रत्येक खंड में बाघ हमारे सम्मुख एक नए रूप में प्रस्तुत होता है और हर रूप में बाघ हमारे लिए नई अर्थ सम्भावनाओं के द्वार खोलता है। बाघ जैसा जीव जिसे हम अधिकांशतया हिंसक रूप में ही देखते हैं, जिससे आतंकित रहते हैं उसे केदारनाथ जी ने मानवीय संवेदना से युक्त चित्रित किया है। उसमें जिज्ञासा है, उत्सुकता है, वह सोचता है, गुनता है और प्रश्न भी करता है। यदि गंभीरता से सोचा जाय तो संभवतः ऐसा है भी, बस हम अपनी अंतःदृष्टि का विस्तार नहीं कर पाते और वहाँ नहीं पहुँच पाते जहाँ केदारनाथ सिंह जी की संवेदनाएँ आसानी से राह बनाती चलती हैं।
और तो और प्रेम जिसे कविता में बाँधने के लिए हम प्रकृति के सबसे कोमल, रेशमी प्रतीकों की खोज में रहते हैं उसे भी केदारनाथ सिंह बाघ के रूप में अभिव्यक्त करते हैं—
“कि यह जो प्यार है
यह जो हम करते हैं एक- दूसरे से
या फिर नहीं करते 
वह भी एक बाघ है।”

पढ़ते ही वैचारिक तंतु झनझना कर सक्रिय हो उठते हैं. प्यार बाघ कैसे। हमारे भी हुए और फिर हमने कल्पना कि क्या है बाघ। जंगल में चल रहा है बाघ आहिस्ता आहिस्ता और आस-पास सब जैसे बाघमय हो उठता है- ऊँचे-ऊँचे खड़े वृक्ष, अदृश्य पशु-पक्षी सबके होने या न होने में बाघ का होना धड़कता है और क्या ऐसा ही नहीं होता प्रेम में। प्रेम को बचाए रखने के लिए हम कातर भी होते हैं और हिंसक भी, क्या यह बाघ होना नहीं है। पर यह भी सौ फीसदी सही है कि हम उस स्तर पर कभी नहीं पहुँच सकते थे यदि केदारनाथ जी के बाघ संग नहीं चले होते।

कविता के एक खंड में बाघ गाँव से नगर, शहर की ओर जाती बैलगाड़ियों को देखता है, हमेशा कुछ न कुछ ढो कर ले जाती बैलगाड़ियाँ, टुकड़ा-टुकड़ा गाँवों को लीलते शहर, खुली जमीन, खेत खलिहानों को निगलते शहर और उसका मन शहर के प्रति एक गहरे तिरस्कार से भर उठता है। फिर जब वह पहली बार शहर आता है तो इसी तिरस्कार भाव से भर बाहर से वापस लौट जाता है। ऐसा लगता है कवि आह्वान कर रहा है कि आधुनिकता की इस अधाधुंध दौड़ के लिए कुछ अस्वीकार तो हमें भी पालना चाहिए। अपनी लोक-संस्कृति, जन-जीवन की आत्मा को बचाए रखने का उनके आग्रह का सम्मान कर नहीं पाये हम। बैलगाड़ियों को शहर की ओर जाते देखते बाघ के मन में विचार आता है – ‘मुझे कुछ करना चाहिए, कुछ करना चाहिए।‘ यह पुकार तो कवि के ही मन की है न।

और भी बहुत कुछ है कविता में, मसलन बाध और बुद्ध का आमने- सामने होना, सदा ही गुर्राने और डराने को अभिशप्त बाध का खरगोश को पास बुला उसके नरम, मुलायम रोओं पर हाथ फिराते हुए एक नई बात के होने को महसूस करना। कितनी सूक्ष्म पकड़ है मनोविज्ञान की, एक जैसी निरंतरता से ऊबे बाघ का मन करता होगा न इस नई तरह की अनुभूति को जीने का। हम भी ऐसा ही अनुभव करते हैं न, इकरस जीवन के जोड़-घटाने में फँसे हुए।

कुल जमा यह कि केदार नाथ सिंह की कविताओं से गुजरते हुए हम मन एवं विचारों के बहुत से धरातलों और आयामों को जीते हैं। शेष होते अनुभव, छूटती हुई चीजें, विलग हो गए लोग आत्मीयता से बांह पकड़ ले चलते हैं भूली–बिसरी डगर, हाट, सिवानों की ओर। उनके स्मृति बिंबो में हम जीते हैं अपने अनुभव। सर्वथा नवीन अर्थ लिए हुए बिम्ब एवं मिथकों का सहज प्रस्तुतिकरण अवाक करता है, विस्मित करता है और भीतर कहीं गहरे में हमेशा के लिए बैठ जाता है। सामजिक विडम्बनाएँ, परिवर्तित होते परिदृश्य, विस्थापित होते जीवन मूल्यों की बेलौस सच्चाई जैसे कही गई है उनके काव्य संसार में कि उनकी कवितायें समय के द्रुतगति से भागते चक्र में भी टिके रहने का दम-खम रखती हैं।

कथाओं से भरे इस देश में 
मैं भी एक कथा हूँ
एक कथा है
बाघ भी
बाघ को कई बार जब छिपने की जगह नहीं मिलती तो वह जा बैठता है कथाओं की ओट में।

देशज यथार्थ, सामाजिक दंव्द, कविताएँ अंतर्वस्तु में गहन और बुनावट में अनूठी
बिंब विधान पर जोर

संवेदना और विचार बोध साथ -साथ चलते हैं
केदार नाथ सिंह का कविता संग्रह --- तालस्तॉय और साइकिल और इस संग्रह की कुछ कविताओं के शीर्षक – पानी की प्रर्थना, घोंसलों का इतिहास, ईश्वर और प्याज

केदार जी कविता में परम्परा और आधुनिकता के मध्य विरोध की बजाय संवाद का रिश्ता देखते हैं। अतीत वर्तमान पर अपने विचार थोपता नहीं है। एक किसान बाप अपने बेटे को जीवन के सूत्र देता है लेकिन उसकी अनिवार्यता को ख़ारिज करता है, जिससे जीवन में विकल्प बने रहें जहाँ से विकास का रास्ता फूटता है। कवि जमीन से जुड़ने का ‘एक छोटा सा अनुरोध’ भी करता है पर उसकी भाषा आसमान के इंकार की नहीं है।
“जैसे चींटियाँ लौटती हैं
बिलों में
कठफोड़वा लौटता है
काठ के पास
वायुयान लौटते हैं एक के बाद एक
लाल आसमान में डैने पसारे हुए
हवाई अड्डे की ओर”

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