असमीया लोक साहित्य में स्त्री

- कामाख्या नारायण सिंह

सह आचार्य (हिन्दी), रंगापारा महाविद्यालय, रंगापारा – 784505 , शोणितपुर, असम
चलभाष +91 943 526 4639
ईमेल: knsghy@gmail.com


साहित्य और समाज एक-दूसरे के पूरक हैं। लोकसाहित्य साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। आदिम घुमंतु या यायावरी लोगों का जीवन जंगलो या प्रकृति के बीच जन्म और  मृत्यु के खेल के साथ बीतता रहा। कबीलाई जीवन के राग-द्वेश से उपजे इस साहित्य परंपरा का मूल बीज वहीँ छुपा है। पूर्वोत्तर भारत का मुख्यद्वार असम है। नेफा, नागालैंड, मणिपुर के कुछ हिस्से, त्रिपुरा और मिजोरम कभी इसी बृहत्तर असम का हिस्सा हुआ करते थे। यहाँ का मूल निवासी कछाडी कहे जाते हैं। कालांतर में यही कछाडी कई नामों से जाने गए। असम का बरो जनजाति इन्ही का एक रूप है। असम पूर्वोत्तर का बड़ा प्रदेश है जिसकी प्रमुख भाषा असमीया है ।  यहाँ की अन्‍य भाषाएँ हैं – ताई, दिमाषा, बोड़ो, कार्बी, मिसिंग, राभा, मीरी आदि। लोकसाहित्य की दृष्टि से असम बहुत समृद्ध है। असमीया लोकसाहित्य में नारी और प्रेम का अतिविशिष्टपूर्ण स्थान है। लोकसाहित्य में स्त्री अनंतारुपा है – माँ, बहन, भगनी, बेटी, प्रिय, पत्नी आदि तो है हीं, समय-समय पर नारी को कदर्यपूर्णा राक्षसी के रूप में भी चित्रित किया गया है। लोकसाहित्य की सृष्टि का कोई यथानिर्दिष्ट समय नहीं है। अतः कहा नहीं जा सकता कि नारी कब किस समय से किस रूप में समाज ने देखना आरम्भ किया। इन लोककथाओं, लोकगीतों, लोकगाथाओं आदि से यह स्पष्ट होता है कि वृहद् असमीया समाज में स्त्री एक समय समाज में उच्च आसन पर विराजमान थी। यह अब भी दिखता है जब हम इनकी तुलना भारत के अन्य क्षेत्रों से करते हैं।

लोकसाहित्य जनसाधारण के युग प्रचलित ज्ञान और अभिज्ञता का वाह्य प्रकाश है। इस श्रेणी केसहिटी के आदिम स्रष्टाओं के अक्षर ज्ञान से प्रायः अनभिज्ञ होने के कारण इसका आरंभिक रूप अलिखित और मौखिक हीं रहा है, जो पीढ़ी-डर-पीढ़ी निरंतर आगे बढ़ता रहा है। स्थान, समाज और समय भेद होते हुए भी इस साहित्य की अपनी एक तारतम्यता है। अर्थात लोकसाहित्य के मूल भाव का सदृश्य बहुत हद तक एक हीं है।

वस्तुतः व्यक्ति अपने आरंभिक जीवन के रहस्य को प्रकृति के साथ जोडकर देखता रहा, पर उसके भेद को कभी भेद नहीं पाया। अतः उसने प्रकृति में ही अलौकिक सत्ता को खोजना आरम्भ कर दिया और उसे हीं महिमामंडित किया। वे यह मानकर चलने को बाध्य थे कि प्रकृति जगत में विविध और अलौकिक शक्ति है। वस्तुतः ऐसा कहे की दुनिया का पहला व्यक्ति जब इस धरती पर आया होगा तो वह – पानी की आवाज, घनघोर वर्षा, बिजली के कड़कने आदि से वह डरा होगा और किसी अदृश्य सत्ता के प्रति आस्थावान हुआ होगा और यहीं से लोकसाहित्य, लोकधर्म, लोकविश्वास इत्यादि की धरना विकसित हुई हो। ऐसे ही ध्यान-धारणाओं से आदिम व्यक्ति के मन में अलौकिक सत्ता के प्रति विश्वास उत्त्पन्न हुआ होगा। और, इसी से विकसित हुआ स्तूति मूलक गीत, कथा, गाथा आदि तथा यही है परवर्ती लोकसाहित्य की आधार-भूमि। यदि हम समाज विज्ञान या नृतत्त्व विज्ञान की माने तो वह मानव को बन्दर, चिम्पांजी या गोडिल्ला से विकसित मानता है। और जानवरों में भी हम सुख, दुःख, डर, राग, द्वेष, अवसाद, उत्साह, प्रेम, गुस्सा आदि देखते है। अर्थात, वह जानवर वाली प्रवृति अब भी हममें सुरक्षित है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का निबंध “नाख़ून क्यों बढ़ते हैं” इसी ओर संकेत करता है। मनोवैज्ञानिक युंग मानता है कि आदिम व्यक्ति के अज्ञानता के कारण हीं विविध दैविक शक्तियों का जन्म हुआ और वह दैवी शक्तियों के इच्छा या अनुकम्पा पर हीं वैयक्तिक जीवन का सुख-दुःख, भय-उत्साह, जन्म-मृत्यु आदि को निर्भर मानता है।

पूर्वोत्तर भारत का मुख्यद्वार असम है। नेफा, नागालैंड, मणिपुर के कुछ हिस्से, त्रिपुरा और मिजोरम कभी इसी बृहत्तर असम का हिस्सा हुआ करते थे। यहाँ का मूल निवासी कछाडी कहे जाते हैं। कालांतर में यही कछाडी कई नामों से जाने गए। असम का बरो जनजाति इन्ही का एक रूप है। “भारत का पूर्वोत्‍तर क्षेत्र बांग्‍लादेश, भूटान, चीन, म्‍यांमार और तिब्‍बत- पांच देशों की अंतर्राष्‍ट्रीय सीमा पर अवस्‍थित है । असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्‍किम- इन आठ राज्‍यों का समूह पूर्वोत्‍तर भौगोलिक, पौराणिक, ऐतिहासिक एवं सामरिक दृष्‍टि से अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण है । सैकड़ों आदिवासी समूह और उनकी उपजातियाँ, असंख्‍य भाषाएँ व बोलियाँ, भिन्‍न–भिन्‍न प्रकार के रहन-सहन, खान-पान और परिधान, अपने-अपने ईश्‍वरीय प्रतीक, आध्‍यात्‍मिकता की अलग-अलग संकल्‍पनाएँ इत्‍यादि के कारण यह क्षेत्र अपनी विशिष्‍ट पहचान रखता है । पर्वतमालाएँ,हरित घाटियाँ और सदाबहार वन इस क्षेत्र के नैसर्गिक सौंदर्य में अभिवृद्धि करते हैं। जैव-विविधता, सांस्‍कृतिक कौमार्य, सामूहिकता-बोध, प्रकृति प्रेम, अपनी परंपरा के प्रति सम्‍मान भाव पूर्वोत्‍तर भारत की अद्वितीय विशेषताएँ हैं । अनेक उच्‍छृंखल नदियों, जल- प्रपातों, झरनों और अन्‍य जल स्रोतों से अभिसिंचित पूर्वोत्‍तर की भूमि लोक साहित्‍य की दृष्‍टि से भी अत्‍यंत उर्वर है ।

महाभारत में असम का उल्लेख प्रागज्योतिषपुर के रूप में मिलता है। कालिका पुराण में भी कामरूप – प्रागज्योतिषपुर का वर्णन है। यजुर्वेद में सर्वप्रथम ‘किरात’ का उल्लेख किया गया है। इसके उपरांत अथर्ववेद, रामायण एवं महाभारत में भी उन मंगोल मूल की भारतीय जनजातियों की चर्चा मिलती है जो देश के उत्तर – पूर्वी क्षेत्र की पर्वतघाटियों एवं कन्दराओं में निवास करती हैं। ब्रह्मपुत्र घाटियों का संबंध किरात से है। संस्कृतभाषी आर्यों ने एक जाति के लोगों का उल्लेख किया है जिनका रंग पीला और आकृति चीनी लोगों के समान थी। इस वर्ग के लोगों को आर्य ‘किरात’ कहते थे। महाभारत के विख्यात योद्धा राजा भगदत्त पूर्वोत्तर भारत के थे। डॉ रामधारी सिंह दिनकर के अनुसार “किरातों का मूल अभीजन पूर्वी चीन में था । वहीं से लोग तिब्बत, नेपाल, बर्मा, असम, उत्तरी बंगाल और उत्तरी बिहार में आए। भारत में किरातों का आगमन कब हुआ, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। यजुर्वेद और अथर्ववेद में किरातों का उल्लेख है। उस समय के अन्य प्रमाणों से भी यह अनुमान निकलता है कि किरात ईसा से एक हज़ार वर्ष पूर्व भारत पहुँच गए थे और वे हिमालय की तराई तथा पूर्वी भारत में आबाद थे। नेपाल के नेवार और किरंती लोग, कश्मीर के लद्दाखी, दार्जिलिंग के लेपचा, त्रिपुरा और मणिपुर के क्षत्रिय, उत्तर असम के अक्का, मीरी, अबोर और मिश्मि लोग किरात वंश के हैं।१”

असम पूर्वोत्तर का बड़ा प्रदेश है जिसकी प्रमुख भाषा असमीया है ।  यहाँ की अन्‍य भाषाएँ हैं – ताई, दिमाषा, बोड़ो, कार्बी, मिसिंग, राभा, मीरी आदि। लोकसाहित्य की दृष्टि से असम बहुत समृद्ध है। असमीया लोकसाहित्य में नारी और प्रेम का अतिविशिष्टपूर्ण स्थान है। लोकसाहित्य में स्त्री अनंतारुपा है – माँ, बहन, भगनी, बेटी, प्रिय, पत्नी आदि तो है हीं, समय-समय पर नारी को कदर्यपूर्णा राक्षसी के रूप में भी चित्रित किया गया है। लोकसाहित्य की सृष्टि का कोई यथानिर्दिष्ट समय नहीं है। अतः कहा नहीं जा सकता कि नारी कब किस समय से किस रूप में समाज ने देखना आरम्भ किया। सामाजिक विवर्तन को यदि सूक्ष्मता से देखा जाए या उसका सही पर्यवेक्षण किया जाए तो स्पष्ट होगा कि आदिम समाज में स्त्री को देवी-रूपा स्थान प्राप्त था। आदिम समाज अपने वंश वृद्धि के आकांक्षा से आकुल था। उनका मानना था और उनकी आवश्यकता भी थी कि खाद्य सामग्री और संतान। यही विश्वास और आकुलता आज भी सुदूर ग्रामीण भारत तथा हाशिये पर पड़े समाज में देखा जा सकता है। खाद्य सामग्री के उत्पादन करने के मूल में व्यक्ति का श्रम निहित होता है। और, उत्पादन से जुरे श्रम में अधिकाधिक हाथ की ज़रूरत पड़ती है लिहाजा लोगों ने मिलकर संतानोत्पत्ति पर अधिक बल दिया। वस्तुतः व्यक्ति की संख्या में वृद्धि से श्रम का विभाजन  या प्रति व्यक्ति कम श्रम अधिकाधिक अन्न का उत्पादन का नियम वहाँ लागू होता था। उनका मानना था कि मुँह है तो खाद्य पदार्थ अनिवार्य है, अर्थात उनके लिए जनसंख्या वृद्धि अनिवार्य है और जनसंख्या वृद्धि के लिए प्रजनन अनिवार्य था। चूँकि, स्त्री बच्चे जानती थी, इसलिए स्त्री जननी-देवी रूपा है। उनके लिए अन्न, पृथ्वी और मातृ-गर्भ या योनि सब समधर्मी था। तात्कालीन वास्तविक अभिज्ञता से शायद उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ हो कि संतान वृद्धि मतलब अन्न में वृद्धि। असमीया फकरा-जोजना (लोकोक्ति) में इसी मनोभाव को व्यक्त करते हुए कहा गया है कि “सोत पो, तेरह नाती ; तेहे करीबा कूँहिंयार खेती।” यथेष्ट संख्या में जब बच्चे होंगे तभी आदिम समाज में खेती या कृषिकार्य सफल होगी। आदिम युग के गो-पलक, चरवाहा अपने छोटों को आशीर्वाद देते हुए कहता है – “बेटा पुत्र बाढक।” यहाँ स्पष्ट है कि वह समाज जनसंख्या वृद्धि पर अत्यधिक जोर देता था। सृष्टि, उत्पाद था सभी प्रकार के वृद्धि के मूल में मातृ और पृथ्वी हीं प्रधान थी। इस तत्त्व को “आदिम लोकसमाज ने प्रतिपल प्रिती भाव से नारी को अनुपम एवं उच्च भाव से अपने समाज में अधिष्ठित किया था। इतना हीं नहीं स्त्री को देवी का सम्मान देते हुए श्रद्धा के साथ-साथ पूजा आरम्भ कर दिया था।”२

स्त्री को देवी रूप में प्रतिष्ठित कर उसकी पूजा कब आरम्भ हुई कहा नहीं जा सकता, पर उसके प्रति प्रशस्ति सूचक गीत, कथाएँ, गाथाएँ आदि आदिम सभ्यता की हीं दें है ऐसा कहा जा सकता है। समाज वैज्ञानिकों की अवधारणा है कि “ऑस्ट्रिया से प्राप्त ‘भिलनडर्फर’ की चूने पत्थर से निर्मित मूर्ति ‘वीनस’ ही अबतक की प्राप्त सबसे प्राचीन मूर्ति है जिसका निर्माण कल लगभग बीस हजार वर्ष से भी पूर्व की है।”३ लोकसमाज  हमेशा से वस्तुवादी रहा है। उनके अनुसार “आगे चाऊल कथा, पिसे हे हरि कथा” (जैसे हिन्दी प्रदेशों में कहावत है – भूखे भजन नहीं हो हीं गोपाला)। ईश्वर भी एक मिथकीय कल्पना है जिसके समक्ष वे लोग ‘चाऊल कथा’ तथा पार्थिव सम्पदा के प्राचुर्यता के लिए हीं नतमस्तक होते दिखाते हैं। लोकसमाज के वृद्धि की आकांक्षा से अपनी कामनाओं को फलवती होने के लिए हीं देवी पूजा, मन्त्र, कथाओं और गाथाओं से संपृक्त हो देवी के समक्ष प्रार्थित हो कहते दिखते हैं – “धनं देही, रूपं देही, यशं देही, द्विषो देही।” असमीया मंसाकाव्य में भी दुर्गावर ने भी एक हीं सुर में कहा है – “ब्रह्मानिक पूजे जीतो एक चित्र मने / पुत्र द्वारा सूखे हितो थाके सर्वक्षने / परिपूर्ण होबए ताहार गृहवास / भने कवि दुर्गावर पदुमाईर दास।” यहाँ कहा जा सकता है, कि प्रथमद्रष्टाया स्त्री पूजा जननी और पृथिवी के लिए है जो संतान अन्न तथा अन्यान्य सम्पादाओं की सर्वदात्री है। इन दोनों में एक ही समानता है, वह है ‘प्रसूता’ की। ये दोनों हीं सर्व प्रसूता है। पुरुषों शयद इसलिए ही इनकी पूजा आरम्भ की हो।

लोकसमाज के विविध विचार-प्रसंगों से हमें ज्ञात होता है कि अन्यान्य देशों की भांति भारतवर्ष भी एक मातृ-सत्तात्मक देश हीं था। लिहाज़ा असम भी मातृ-सत्तात्मक हीं रहा होगा। वैसे भी आज भी पूर्वोत्तर भारत के कई प्रदेशों में यह व्यवस्था अब भी कायम है। वैदिक युग के बाद के समाज वैज्ञानिकों की स्पष्ट धारणा रही है कि “शिकार युग से हीं समाज में स्त्री के स्थान पर पुरुष की प्रधानता बढ़ी। पुरुष को वरिये स्थान स्थान दिया जाने लगा। बहुल समाज पितृ-सत्ता मे परिवर्तित होना आरम्भ किय।”४ यह परिवर्तन सामान्य नहीं। आदिम समाज में स्त्री-पुरुष के बीच अबाध यौन संपर्क से उत्पन्न नव-प्रजन्म अपने पिता को वह वरीयता या सम्मान नहीं देता था जो माँ को देता था। उसका परिचय अपनी माता से था। छान्दोग्य उपनिषद्५ में वर्णित सत्यकाम और जवाल की कथा इसका उत्कृष्ट प्रमाण है। किन्तु कालान्तर में इस व्यवस्था में परिवर्तन हुआ। रामायण और महाभारत युग में यह स्पष्ट झलकता है। दशरथ का बहु-पत्नित्त्व और कुंती और द्रौपदी इसके सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। कालान्तर में कौटिल्य अपने ‘अर्थशास्त्र’६ में लिखते हैं – “बच्चा स्त्री का हीं होता है न कि पुरुष (पति) का। पुरुष (पति) अनेकों हो सकते हैं पर बच्चा माँ (स्त्री जो जननी है) का हीं कहलायगा” यह इस सब इस बात का द्योतक है कि उस समाज में बहु-पतित्त्व प्रथा प्रचलित रही होगी। आज भी दुनिया के बहुसंख्यक आदिवासी समाज में यह प्रथा प्रचलित है। वस्तु सत्य यह कि संतान के ऊपर से अधिकार खोते जाने की क्रमबध्यता में स्त्री कालांतर में पुरुष के लिए भोग सामग्री मात्र रह गई। वृहदारण्यक उपनिषद्७ में याज्ञवल्क कहते हैं – “यदि वह नारी (जिसे कोई उपभोग करना चाह हो) जो पुरुष के उपभोग की कामना पूर्ण नहीं कर सकती तो पुरुष उसे उपहार द्वारा प्रलोभित कर अपने बस में कर सकता है। यदि फिर भी वह सम्भोग में सहयोग नहीं करती तो उसे बल से, छल से आयत्त किया जा सकता है।”७

समाज वैज्ञानिक वोडेल के अनुसार – “असम तथा उत्तर-पूर्व भारत में रेल गाड़ी के परिचालन तथा अंग्रेजों के आगमन के पश्चात हीं यहाँ के समाज में द्रूत गति से परिवर्तन प्रारंभ हुआ”८ वोडेल यह भी मानता है कि अंग्रेजों के आगमन से पूर्व असम की सामाजिक व्यवस्था विषयक बहुल तथा विस्तृत रूप में चर्चा कहीं विशेष रूप में नहीं मिलता। समाज विवर्तन के साथ-साथ लोकसाहित्य में भी कुछ विवर्तन घटा हो, वह भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। भारतीय लोकसाहित्यकारों का मानना है कि असम तंत्र-मंत्र प्रधान देश के रूप में आदिम युग से ख्यात रहा है। “सिद्ध तांत्रिकों की साधना, कामाख्या देवी के पवित्र स्थल पर हीं सिद्धि प्राप्त करती थी इसके गाथा में भी इस ऐतिहासिक तथ्य की ओर संकेत किया गया है। हिन्दी-भाषी प्रान्तों के लोकगीतों और लोककथाओं में असम का प्रसंग ऐसे देश के रूप में आता है जहाँ की स्त्रियाँ मर्दों को भेडा बनाकर रख लिया करती थी”९ यह मान्यता आज भी उसी रूप में ख्यात है। असम में प्रचलित लोककथाएँ यहाँ के सभी समुदायों में समृद्ध विरासत है। यहाँ की लोककथाएँ अलौकिक घटनाओं से परिपूर्ण होती हैं। असम तंत्र–मंत्र, जादू–टोना एवं आध्यात्मिकता का केंद्र है। अतः लोककथाओं में तंत्र–मंत्र का समावेश होता है।

इस क्षेत्र में “असम की महिलाओं द्वारा प्रस्तुत किये जानेवाले लोकनाट्य भी प्रचलित हैं। इन लोकनाट्यों के द्वारा महिलाएँ अपनी भावनाओं का इजहार करती हैं। लोकनाट्य की यह शैली असमिया महिलाओं की स्वतंत्र अस्मिता को रेखांकित करती है। असम में लोकगीतों की उन्नत परम्परा है। बिहू गीत इस क्षेत्र के प्रतिनिधि लोकगीत हैं, जिनके माध्यम से जनसामान्य के राग-अनुराग, आशा- आकांक्षा, हर्ष-विषाद आकार ग्रहण करते हैं, बिहू गीतों के अनेक प्रकार हैं और गाने की अनेक शैली प्रचलित है”।१० असमीया बिहू गीतों का विकास कब और कैसे हुआ, इस पर अनेकानेक मतभेद है। लेकिन इतना तय है कि इन गीतों के प्रारम्भिक दौर में स्त्री देह तथा उसके रूप की चर्चा के बावजूद भी वह स्त्री वंदना तक हीं जाता था, किन्तु कालांतर में वह रूप चर्चा, इन्द्रियग्राह्य और भोग्य वस्तु के रूप में शनै-शनै परिवर्तित होता चला गया। वस्तुतः इन गीतों में भी स्त्री द्वारा अपने साथी के चुनाव पर हीं अधिक बल दिया जाता रहा है। यह ‘पौडंग मातृ’ के सामान गीत है। देवी पूजा में देवी रूप-सौन्दर्य का जो वर्णन पहले था वह कालक्रम में बदलता चला गया। 

“सोनोवाल कछारी जनजाति का लोकगीत हैदंग केवल पुरुषों द्वारा गाए जाते हैं। गीत के साथ-साथ अंग संचालन व नृत्य हैदंग की विशेषता है। ये गीत आध्यात्मिकता के रंग से सराबोर होते हैं।”११ इस क्षेत्र में करबी मलिता (लोकगाथा) के काव्य ‘हा-ई’ को दिखाया जा सकता है। इसमे एक स्थान पर कहा गया है कि पृथिवीकी एनाडिमा अवस्था से हीं ‘हा-ई’ विकसित हुआ है। किन्तु इस गीत के कई भाग विशेषकर ‘सामंत-प्रभु लंग डिली’ के द्वारा ‘हा-ई’ के ऊपर चलाया गया निर्यातन सामंत युगीन हीं है न कि आदिम समाज व्यवस्था की। वस्तुतः आदिम समाज व्यवस्था की अच्छी-अच्छी व्यवहृत वस्तु कालांतर में सामंती व्यवस्था के सामंतों के लिए व्यवहृत होना आरम्भ हुआ। और, बेकार-बेकार व्यवस्थाएँ आम-जन पर  थोप दिया गया। किन्तु, “एस्किमो, पिज्मी आदि जन-समाज में नारी का स्थान मिटटी में मिला नहीं, वरन वह संभ्रांत स्थान की अधिकारनी रही है।”१२  सम्प्रति आज के असम तथा विविध जनजातिय समाज व्यवस्था में कहीं मातृ तांत्रिक समाज नहीं। प्रायः सभी जनजातिय समाज अब स्त्री-पुरुष द्वारा नियंत्रित हो रही है।

विविध जनजातिय लोगों से भरे-पुरे असम के अन्यान्य लोकासहित्यों में वर्णित आदिम समाज के स्त्रियों की सामाजिक मर्यादा के विषय में समाज वैज्ञानिकों के द्वारा निर्देशित समाज व्यवस्था को आसानी से देखा जा सकता है। यहाँ के मिसिंग जनजाति के पुरोहित जब ‘आंग-बांग’ गीत गाते हुए कहते हैं – “जन्मर सकलो भर कानधात आरू गर्भत लोई जी सकलो परियालर जन्मर मातृस्वरूप तोमाक वंदे”१३ इससे स्वाभाविक रूप से तात्कालीन मातृ प्रधान जनजातिय समाज पर नज़र जाती है। एक-एक ‘आंग-बांग’ गीत में स्त्री को ‘पौडंग मातृ’ नाम से हीं अभीहित किया जाता है, तथा ‘पौडंग माँ’ की हीं वंदना, उपासना आदि की जाती है, वह देवी स्वरुप है। यहाँ पिता का उल्लेख मात्र भी नहीं मिलता। “मिरि अथवा मिसिंग जनजाति के लोकगीतों को ओई-नितोम कहा जाता है। इस समुदाय के जीवन और संस्कृति का विकास ब्रह्मपुत्र एवं सुबनसिरी नदियों की उर्वर घाटी में हुआ है, इसलिए मिरि लोकगीतों में नदियों की चर्चा प्रमुखता से होती है। इनके प्रणय गीत में प्रेमी अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करते हुए कहता है कि मैं नदी के इस पार खड़ा हूँ और तुम उस पार, हम दोनों सियाँग नदी के दो तटों पर खड़े तड़प रहे हैं, मेरे ह्रदय में तुमको देखने की प्रबल प्यास निरंतर बनी रहती है।”१४

मुक्त यौन-समागम व्यवस्था बहु-पतित्त्व व्यवस्था तथा बहु-पत्नित्त्व व्यवस्था बड़ो जनजातिय समाज लोककथाओं,लोकगीतों और लोकगाथाओं में वृहद् रूप में पाया जाता है। ‘आलिरी दाम्ब्रा’, ‘गम्बिरा वीर’, ‘चार भाईयों की कथा’ आदि बड़ो कथाओं से बड़ो समाज का स्वरुप स्पष्ट होता है। इन कथाओं में अबाध यौन समागम के प्रचलन और स्त्री के रूचि के अनुसार पति के चुनाव जैसी व्यवस्था दिखती है। ‘चार भाईयों की कथा’ से ऐसा प्रतीत होता है कि इस समाज में बहु-पतित्त्व प्रथा आदिम समाज की देन है। ठीक वैसे हीं ‘गम्बिरा वीर’ की लोककथा से प्रतीत होता है कि इस समाज में बहुपत्नी प्रथा भी आदिम समाज की ही देन है।

डिमासा लोककथाओं में यह दिखाया गया है कि डीश्रु का पिता राजा हरिराम ने उससे (अपनी पुत्री से) विवाह का प्रस्ताव रखा। “डीश्रु अपने पिता का प्रस्ताव ठुकराते हुए अंतत: घर-द्वार त्याग वनवासिनी हो गई। ऋग वेद में यम-यमी के संवाद में इसी प्रकार के उदाहरण मिलते हैं।”१५ ध्यातव्य है कि इन लोककथाओं में ऐसे संबंधों पर विरोध जताते ही देखा गया है। किन्तु, उन दिनों अबाध यौन सम्बन्ध बनने की प्रथा थी, ऐसा ब्रह्मदेव और सरस्वती की कथा से भी स्पष्ट होता है, और यही कारण है कि ब्रह्मदेव की अबतक पूजा नहीं की जाती। संभवतः इस प्रकार की नजदीकी रिश्तों में पहले यौन सम्बन्ध रहे हों और कालांतर में यह धीरे-धीरे समाप्त हो गया।

असम का राभा समुदाय लोकगीतों की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है, इनके लोकगीतों में प्रकृति अपने यथार्थ रूप में अभिव्यक्त होती है। राभा समाज के ‘हयमारू’ लोकगीत देव स्तुति है जिसमें प्राचीन वीरांगनाओं की याद में गयी जाती है। इनमें स्त्री सम्पूर्णता और वरीयता ही दिखाई देती है।

इन लोककथाओं, लोकगीतों, लोकगाथाओं आदि से यह स्पष्ट होता है कि वृहद् असमीया समाज में स्त्री एक समय समाज में उच्च आसन पर विराजमान थी। यह अब भी दिखता है जब हम इनकी तुलना भारत के अन्य क्षेत्रों से करते हैं। 
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शोध-सन्दर्भ:

1. रामधारी सिंह “दिनकर” - संस्कृति के चार अध्याय, उदयाचल, पटना
2. डी. पी. चट्टोपाध्याय - लोकायात्त, पृ- 241-242, सं- 1981, 1.. लोकायत, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली- 110 055, 
3. जी. थम्पसन – स्टडीज इन एन्सिएँट ग्रीक सोसाइटी
4. उपर्युक्त – (डी. पी. चट्टोपाध्याय - लोकायात्त, पृ- 241-242, सं- 1981,
5. लोकायत, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली- 110 055, में उद्धृत)
6. छान्दोग्य उपनिषद् – 4 / 4 / 2
7. कौटिल्य – अर्थशास्त्र – 7 / 60 / 3 / 1
8. याज्ञवल्क - वृहदारण्यक उपनिषद् – 6 / 4 / 7
9. एल. ए. वोडेल – द ट्राइब्स आफ द ब्रह्मपुत्र वैली – पृ. - 02, प्र.– 1975, दिल्ली 
10. डॉ हरेराम पाठक – असमीया लोकसाहित्य : एक विश्लेषण, पृ. – 52, प्र. सं. – 2008, गोपिका प्रकाशन, 10 प्रीति नगर, दुदौली मार्ग, सीतापुर रोड, लखनऊ– 21 
11. डॉ वीरेंद्र परमार – असम का लोकसाहित्य, जनकृति, ई-पत्रिका  
12. उपर्युक्त
13. ब्रिफौल्ट – द मदरस – पृ. – 494, प्र. 1952
14. नरेन्द्र पादुन – मिसिंग लोकगीत, पृ. – 145, (मिसिंग संस्कृति आलेख से उद्धृत)
15. डॉ वीरेंद्र परमार – असम का लोकसाहित्य, जनकृति, ई-पत्रिका  
16. डॉ हरेराम पाठक – असमीया लोकसाहित्य : एक विश्लेषण, पृ. – 45, प्र. सं. – 2008, गोपिका प्रकाशन, 10 प्रीति नगर, दुदौली मार्ग, सीतापुर रोड, लखनऊ– 21 

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