आदिवासी जीवन और हिंदी उपन्यास ‘मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ’

- राकेश डबरिया

शोधार्थी (पीएचडी), हिंदी विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर
ईमेल: rakeshdabariya@gmail.com

            भारतवर्ष की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना विविधवर्णी है। एकाधिक धर्म, संप्रदाय, पंथ, संस्कृतियाँ, जातियाँ-जनजातियाँ तथा विभिन्न मान्यताएँ यहाँ की विविधता में प्राण फूँकती हैं। आदिवासी समुदाय भी इसी वैविध्यता का एक अंग है जो विशेष पर्यावरण में अपने सामाजिक तथा सांस्कृतिक मूल्यों को जान की कीमत पर सँजोए हुए है। आदिवासी समाज प्रकृतिनिष्ठ, प्रकृति निर्भर तथा सामूहिक वैशिष्टयता के वैभव से परिपूर्ण है परन्तु वर्तमान में लाचार, अन्यायग्रस्त तथा पशुवत जीवन यापन करने के लिए अभिशप्त है। प्रकृति के सान्निध्य की महत्ता को हमारे ऋषियों ने बहुत पहले जाना था और आदिवासियों ने उससे भी पहले। डा० विनायक तुमराम आदिवासियों के संबंध में लिखते हैं कि एक विशेष पर्यावरण में रहने वाला, एक से देवी-देवताओं को मानने वाला, समान सांस्कृतिक जीवनयापन करने वाला परंतु अक्षरज्ञान रहित मानवसमूह... यानि आदिवासी।[1] आदिवासी आर्यों से भी पूर्व के मानव समूह माने जाते हैं। वे इस भूमि के मूल-मालिक हैं। सही अर्थों में क्षेत्राधिपति हैं। इसलिए कुछ अध्येताओं ने उन्हें अबॉरिजिनल कहकर संबोधित किया है।[2] आदिवासियों का जीवन आज भी पूरी तरह प्रकृति के रंग में रचा-बसा है। प्रकृति सच्चे अर्थ में उनके लिए देवी, माँ, सहचरी और प्राण है। प्रकृति से उनका नेह लगाव किताबी ज्ञान पर आधारित नहीं है, वरन वे स्वयं प्रकृति प्रेम के सजीव महाकाव्य हैं।
            ‘मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ उपन्यास में आदिवासियों और प्रकृति की अंतरंगता का एक विस्तृत और रोचक वर्णन है। यह कि, जिनके संस्कार यहीं से उत्पन्न हुए हैं, जिनकी आत्मा सारंडा के जंगलों में बसती है, पल-पल उसी प्रकृति की अनुभूति जिनकी उत्सवधर्मिता है। तभी तो जाम्बीरा को इस सात सौ पहाड़ियों वाले जंगल के एक-एक वृक्ष से प्यार था। अनायास वे वृक्ष उसे जातीय लगाव का एहसास कराते थे, ऊंचे-ऊंचे, मोटे-मोटे साल! तमाम जंगलों के साल वृक्षों की लंबाई को मात देते साल! करीब एक सौ चालीस, एक सौ पचास फुट ऊंचे साल! उसके पुरखों की वास भूमि के साल! उनका पवित्र सरजोम![3] इतना ही नहीं, इस जंगल में कुछ विशेषताएँ थीं जो जाम्बीरा को वन देवता के प्रति आस्था की राह दिखाती थीं। वह अपने पोते किशोर सगेन को समझाता कि वन देवता की कृपा है इस जंगल पर। आसपास के सभी जंगलों से पहले बारिश हो जाती है यहाँ। बरसात से पहले ही। साल के बीज गिरने के चार पहर के अंदर-अंदर। मध्य बैशाख में ही...।[4]

            आज पूरे विश्व के पर्यावरणविद पर्यावरण सुरक्षा और संरक्षा को लेकर बेहद चिंतित हैं। चिंता स्वाभाविक है। निरंतर असंतुलित होते जा रहे पर्यावरण के परिणाम प्रत्यक्ष रूप से घटित होने लगे हैं। ऐसे में तरह-तरह के उपाय विश्व की बौद्धिक बिरादरी के द्वारा किए जा रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग को कम करने के लिए तमाम प्रकार के सम्मेलन, वार्ताएं आयोजित की जा रही हैं तथा उन पर करोड़ो डॉलर व्यय किए जा रहे हैं। परंतु इतने प्रयत्न के बाद भी तथाकथित सभ्य और आधुनिक भी जिस समस्या का हल नहीं ढूंढ पाते, उसका ज्ञान तो यहाँ के सामान्य लोगों तक में होता है। फॉरेस्ट गार्ड सगेन को बताता है, साल के पेड़ों में अपनी लंबाई के छः गुना अधिक ऊंचाई तक के इलाके को ठंडा रखने की क्षमता होती है। यानी एक सौ चालीस फीट, एक सौ पचास फीट से छः गुना ऊपर तक के आसमान को ठंड से ठिठुरने पर विवश कर देते हैं, सारंडा के साल।[5] और यही सारंडा का जंगल है जिसने उन्हें रहने के लिए शरण दी वह भी एक दो नहीं, पूरा जंगल उनका है। जहाँ चाहे वहाँ रह सकते हैं, तभी तो जाम्बीरा और रिमिल को भटकते हुए भी यह विश्वास था कि जल्द ही उन्हें कोई गुफा मिल जाएगी। सारंडा के इस जंगल में गुफाओं की क्या कमी? कितनी ही बार शिकार करते समय जानवरों का पीछा करते हुए या जानवरों द्वारा खदेड़े जाने पर गुफाओं में आकर छुपना पड़ा है उन्हें। जंगल में अंधेरा हो जाने पर रात बितानी पड़ी है गुफाओं में।[6] और खाने के लिए पेताडु, केंदु के फल और शिकार के रूप में जीव-जन्तु। सगेन बचपन से सुनता आया है अपने पूर्वजों की शिकारी प्रवृत्ति के बारे में जब पेड़ के ऊपर बैठे-बैठे उसके पुरखे तीर चलाया करते । जब तक पेड़ से कूदकर दूसरे में, दूसरे से तीसरे में, तीसरे से चौथे में और इसी तरह जंगल की खाक छानते शिकार की खोज में।[7] आदिवासी आज भी स्वस्थ वन्य परंपरा के वाहक हैं। उनकी संस्कृति पेड़ों की जड़ों से विकसित होती है। उनके रीति-रिवाज फूलों-पत्तों से शुरू होकर नदियों, पहाड़ों पर आ कर पहुँचते हैं। गुफाओं की दीवारें आज भी उनके बड़े कैनवास हैं और उनका संगीत मोर और पपीहों के संग उतार-चढ़ाव भरता है।

      आदिवासियों के सामाजिक व सांस्कृतिक संरचना की निर्मिति ही ऐसी हुई है कि जिसमें उनके कोई व्रत-अनुष्ठान, पर्व-त्यौहार, शादी-ब्याह आदि प्रकृति के सान्निध्य के बिना सम्पन्न नहीं होते। उनकी प्राचीनतम और प्रकृतिनिष्ठ संस्कृति ही आज उनके अस्तित्व का आधार है। नारायण सिंह जी उइके इस संदर्भ में लिखते हैं, “आदिवासियों की संस्कृति और उनके विकास का संबंध निकट का है। आदिवासियों को संगठित करने की शक्ति उनके सांस्कृतिक अधिष्ठान में ही है।”[8] यह कथन दर्शाता है कि आदिवासियों की संस्कृति उनकी विशिष्टता का आधार है। उनकी संस्कृति प्रकृति के साहचर्य से निर्मित होकर प्रकृति के संरक्षण तक पंहुचती है। लेखिका सांस्कृतिक अनुष्ठानों में प्रकृति के प्रति मोह का वर्णन पारिवारिक परिप्रेक्ष्य में करती है। "ओर एरा के सदस्यों के साथ मायके से विदा होकर ससुराल जाते समय गाँव की सीमा लांघने से पहले आम के एक पेड़ पर साकी सुतम को सात बार लपेटकर बांधा मेंञ्जारी ने और अपनी जन्मभूमि, अपनी देसाउलि, अपनी माँ बुरू को हमेशा याद रखने का वादा किया।”[9] यह वादा करना एक परंपरा का निर्वाह मात्र ही होता है अन्यथा कोई आदिवासी अपनी जन्मभूमि, अपनी देसाउलि तथा माँ बुरू को कैसे भुला सकता है? इस प्रकार प्रकृति आदिवासियों के जीवन में, धर्म-संस्कृति, जातकर्म, शादी-विवाह से लेकर मृतक संस्कार तक में उपस्थित है।

      वन्य जीवन में जंगली जानवरों का निवास भी स्वाभाविक है। जंगल तो जंगल है। वह सबके लिए है। इसीलिए आदिवासियों को प्रकृत्या कुछ जानवरों से इतना लगाव हो जाता है कि वे एक-दूसरे का कभी अहित नहीं करते परंतु कुछ जानवरों से हमेशा सतर्क रहने की  आवश्यकता होती है। जंगल में शेर, भालू, चीते आदि ऐसे हिंसक पशु होते हैं जो कभी भी इन पर हमला कर सकते हैं। अतः आदिवासियों को उनकी प्रकृति तथा स्वभाव के बारे में भी जानना आवश्यक होता है। उपन्यास में कई जगहों पर लेखिका ने वन्य पशुओं तथा आदिवासियों के मध्य अंत:संबंध का अत्यंत सूक्ष्मता से वर्णन किया है। उदाहरण के लिए, मचान पर बैठा-बैठा जाम्बीरा सोच रहा है, “दो तीन दिन से बारिश नहीं हुई है। पर टर्राते चोके (मेंढक) और सामने पेड़ों के झुरमुट में यहाँ-वहाँ झुंड में टिमटिमाते इपिपियुंग (जुगनू) बारिश का संकेत तो दे रहे हैं।”[10] अर्थात प्राकृतिक दैनंदिन कार्यों और आपदाओं-विपदाओं का पूर्वाभास कराने में जीव कितना सशक्त माध्यम बनते हैं। आज विज्ञान भी यह मानता है कि पशु-पक्षियों में भूकंप आदि प्राकृतिक आपदाओं को भांपने का सामर्थ्य हमसे कई गुना अधिक होता है। चींटियों का असमय बिलों से बाहर निकल आना या पक्षियों का बेवजह चहचहाना इन घटनाओं का संकेत देता है। जाम्बीरा को इन जानवरों से प्राकृतिक ही नहीं बल्कि अप्राकृतिक दुर्घटनाओं की भी जानकारी मिलती है। हाथियों के झुंड द्वारा उसके फसल तथा परिवार में होने वाली त्रासदी का संकेत उसे पहले ही होने लगता है। “ये आज इतने सारे सियार एक साथ फें-फें-फें की विचित्र सी आवाज करते हुए इसी टोले के आसपास क्यों उछल-कूद करते फिर रहे हैं? कहीं कोई अपशगुन तो नहीं होने वाला ?[11] क्योंकि वही सियार रोज़ पेट भर जाने के बाद चुपचाप खिसक लेते हैं और दूर जाकर हुआं- हुआं करते हैं, परंतु आज उनकी बोली विचित्र है, यानी कोई अनहोनी होने वाली है। उनके लिए ये संकेत कोई वहम नहीं होते। ये घटनाएँ उनके और जीवजंतुओं के मध्य पारस्परिक संबंध को दर्शाती है।

      उत्सवप्रिय आम आदिवासी प्रकृति की तरह सहज, सरल, उदार, संकोची, धीर-वीर और अपने सीमित संसार में सिमटी-सिकुड़ी पर परम संतुष्ट जन-जाति है। जंगल और जमीन उसके लिए शानो-शौकत की बात नहीं बल्कि उनमें उनके प्राण बसते हैं। इसके सिवा उन्हें किसी और स्वर्ग की चाह नहीं है। उपन्यास में महुआ माजी ने एक लंबे विवरण के साथ आदिवासियों और प्रकृति के रिश्ते को दिखाया है। जंगल और जंगल के सम्पूर्ण परिवेश के साथ इनके संबंध को बहुत गहराई से चित्रित किया है। वेश-भूषा, खान-पान, पर्व-त्यौहार, नृत्य-गीत, पूजा-पाठ, अर्थात इनके जीवन का कोई भी पक्ष हो, लेखिका की नजरों से बचा नहीं है। कुछ आलोचकों ने इस वर्णन को बहुत लंबा होना जरूर बताया है, परंतु उन्होने भी स्वीकार किया है कि, “रीति-रिवाजों और विश्वासों के वर्णन की अतिरंजना उपन्यास के आकार को तो बढ़ा देती है, पर विस्तार से ही सही, आदिवासी जीवन को लगभग हर कोण से कह गई है।”[12] इसी तरह अमरेन्द्र किशोर अपने लेख मानवीय सरोकारों का शोकपत्र में लिखते हैं कि “कुदरत के तमाम अवयव चारों ओर पसरे हैं। पाठक डूब जाता है महुए की गंध और बहकती-बरगती हवाओं में। बासी भात और छतरी की तरह फैले हुए महुआ के पेड़, मांदर और नगाड़े की थाप, गीतों के मधुर बोल और युवा जोड़ों का प्यारइस जादुई माहौल में लेखिका पाठकों को भी वहीं होने का अहसास दिलाती है।”[13] यह सही है की विभिन्न जन-जातियों पर केन्द्रित अब तक दर्जनों उपन्यास प्रकाश में आ चुके हैं पर कहीं भी इतनी सूक्ष्मता के साथ आदिवासियों के रहन-सहन, रीति-रिवाज तथा प्रकृति से उनके संबंध का विवेचन नहीं किया गया है। इस विषय में यह चित्रण भी इसकी अप्रतिमता में योगदान देता है।

संदर्भ 
[1] आदिवासी कौन, स० रमणिका गुप्ता, लेख डा० विनायक तुमराम, पृष्ठ 27
[2] वही
[3]  ‘मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ’, महुआ माजी, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ 12
[4]  वही, पृष्ठ 13
[5] ‘मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ’, महुआ माजी, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ 13
[6] ‘मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ’, महुआ माजी, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ 56
[7] वही पृष्ठ 12
[8] ‘आदिवासियों की अब तक की साहित्य यात्रा’, सं० रमणिका गुप्ता,2008, पृष्ठ 30 से उद्धृत
[9] ‘मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ’, महुआ माजी, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ 36
[10] ‘मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ’, महुआ माजी, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ 44
[11] ‘मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ’, महुआ माजी, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ 44
[12]  उपन्यास में शोध, क्षितिज शर्मा, समयांतर,जून-2012, पृष्ठ 65
[13]  मानवीय सरोकारों का शोकपत्र, अमरेन्द्र किशोर, हंस, नव० 2012, पृष्ठ 75

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