साहित्य और मीडिया: अल्पसंख्यक सन्दर्भ

- खुशबू

शोधार्थी, हिन्दी-विभाग, मानविकी संकाय, हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद
ईमेल: khushboo18121989@gmail.com

 सत्तर का दशक जो बदलाव लेकर आया पूरी दुनिया में उसका दूरगामी असर हुआ। चिंतकों, विचारकों ने इसे ‘भूमंडलीकरण’ का नाम दिया। भूमंडलीकरण में आर्थिक उदारीकरण की वकालत की गयी। इस उदारीकरण की मंशा साफ थी कि पूरी दुनिया को बाज़ार में तब्दील किया जाये और जनता को उपभोक्ता बनाया जाये। 21वीं सदी के प्रारंभ से ही इस परिवर्तन के दूरगामी परिणाम पूरी दुनिया में दिखाई पड़ने लगे। हम जानते हैं कि पूरी दुनिया में बाज़ार की परम्परा बहुत पहले से रही है, लेकिन यह जो नये किस्म का बाज़ार भूमंडलीकरण की नीतियों पर चलकर आया, उसके केंद्र में वस्तु, क्रेता और विक्रेता ही रहे हैं। यह बाज़ार वस्तुओं के प्रचार की अवधारणा भी लेकर आया और इस प्रचार का माध्यम बना मीडिया। जो मीडिया कभी जनता की आवाज रही, इस बाज़ार ने उसे भी अपने अनुसार परिवर्तित किया। वर्तमान मीडिया का स्वरुप बिल्कुल व्यावसायिक हो चुका है। अपनी टी०आर०पी० बढ़ाने और आर्थिक लाभ के लिए मीडिया ने ख़बरों को माल की तरह बेचना आरम्भ किया। पेड न्यूज ने मीडिया की विश्वसनीयता को भी कम कर दिया है। औद्योगिक और राजनीतिक जगत के बढ़ते हस्तक्षेप के कारण मीडिया लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप में अपने दायित्त्व से इतर हो चुका है। मीडिया के वर्तमान स्वरूप पर ‘ओम प्रकाश कश्यप’ लिखते हैं, “अपनी पूंजी संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए मीडिया बार- बार सरकार और बाज़ार की शरण में जाने को बाध्य होता है। इसी से उसके दुरूपयोग होने तथा लक्ष्य से भटक जाने की संभावना बढ़ जाती है। पूंजीपति और सरकार मीडिया की मदद तो करते हैं, लेकिन वे यह भी चाहते हैं कि उनके उपकार का बदला चुकाते हुए मीडिया और साहित्यकार उनके हितों के अनुकूल कार्य करें। शक्तिशाली सत्ताएँ प्रायः मनुष्य के विवेकीकरण से घबराती हैं, उनकी कोशिश होती है कि मनुष्य के सोच, उसके विचारों पर हमला किया जाए। इसके लिए उसके दिल–दिमाग का अनुकूलन करते हुए वे उसको अपने अनुसार सोचने के लिए बाध्य कर देते हैं। इसके लिए मीडिया का उपयोग इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने तथा सांस्कृतिक प्रतीकों की बाजारानुकूल व्याख्या द्वारा किया जाता है।”1

 तात्पर्य यह है कि सत्ताधारी वर्ग और पूंजीपति जानते हैं कि मीडिया की पहुँच समाज में बहुत भीतर तक है, इसलिए समाज में अपनी लोकप्रियता और वर्चस्व स्थापित करने के लिए मीडिया को ही आधार बनाना सही है। मीडिया भी इन वर्गों के प्रति अपनी श्रद्धा दिखाते हुए ख़बरों को जनता के बीच लोकप्रिय बनाने का काम करता है। लोकप्रिय ख़बरों को अधिक उत्तेजना, आक्रामकता और सनसनीखेज बनाया जाता है। दंगे, बलात्कार, नेताओं के उग्र एवं आक्रामक बयान, जातीय तथा नस्लीय हमले, आतंकवाद, युद्ध तथा हिंसात्मक ख़बरों को मीडिया द्वारा लोकप्रिय बनाया जा रहा है, जिससे कि जनता का ध्यान मूल समस्याओं से हट जाए और सरकार तथा बाज़ार का काम आसान हो जाये। इस तरह की घटनाओं को सबसे पहले दिखाने की होड़ में मीडिया यह भी जरुरी नहीं समझता की दिखाई जाने वाली ‘खबर’ वास्तविक भी है या नहीं। यह अकारण नहीं है कि चैनलों पर रोज बगदादी के मारे जाने की पुष्टि की जाती है, तो कभी साल के भीतर ही दुनिया के ख़त्म हो जाने की भविष्यवाणी की जाती है। ख़बरों को तोड़-मरोड़ कर दिखाने का चलन भी इस बीच काफी बढ़ा है। मीडिया में आज विश्वसनीयता की जगह लोकप्रियता ने ले ली है।

 जब हमारे देश का संविधान निर्मित हो रहा था तब उसमें देश के कुछ वर्गों को ‘अल्पसंख्यक’ बताते हुए उनके लिए विशेष प्रावधान किया गया। इसमें मुस्लिम, सिख, बौद्ध, पारसी, जैन और ईसाई को शामिल किया गया लेकिन मीडिया के प्रचार के कारण अल्पसंख्यकों के अधिकतर मसलों को मुस्लिम केन्द्रित करके देखने की रवायत चल पड़ी है। आज की मीडिया में अल्पसंख्यक तभी आता है जब चुनाव का समय होता है या फिर किसी तरह की गैर सामाजिक गतिविधियाँ घटती है। वरना उसकी समस्याओं, जरूरतों वगैरह से मीडिया का कोई सरोकार नहीं रहता। यूँ तो मीडिया का उदय जनमाध्यम के रूप में हुआ था। वह जनता और सरकार के बीच संवाद का जरिया बन कर आया था। यानी कि मीडिया पर जनता की समस्याओं को सरकार तक और सरकार की कल्याणकारी योजनाओं को समाज तक पहुँचाने की जिम्मेदारी भी है, इसीलिए इसे लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा गया है।

 आज जब सब कुछ बाज़ार तय कर रहा है, ऐसे में मीडिया का स्वरूप भी बाज़ार आधारित ही बन चुका है। मीडिया के भीतर पूंजीपतियों की पैठ ने इसे अपने प्रचार-प्रसार का जरिया बना रखा है। यह बाजारू मीडिया न तो अपने दायित्व एवं कर्तव्य का निर्वहन ठीक से कर रहा है और न तो आम जनता से ही उसका कोई सरोकार है। हालाँकि साहित्य में अभी भी ढेर सारी संभावनाएँ बची हुई है। व्यक्तिगत लेखन होने के कारण साहित्य पर बाजारवाद का उतना असर नही हुआ है जितना कि मीडिया पर। कमलेश्वर के शब्दों में कहें तो – “साहित्य में आज भी पैसा नही है पर नैतिक, सांस्कृतिक और वैचारिक पतन के इस दौर में यदि कोई अभी तक बचा है तो वह लेखक ही है! लेखक की उपस्थिति और गरिमा अभी तक फ़क़ीर की तरह बची हुई है।”2

 आज पूरी दुनिया अर्थकेन्द्रित है। अर्थतंत्र के बढ़ते दबाव में मनुष्य ने अनेक सांस्कृतिक और मानवीय मूल्यों को खोया है। पूंजीवाद ने पूरी दुनिया पर अपना वर्चस्व जमाने के लिए भूमंडलीकरण की नीति को प्रस्तावित किया जिसका मूल उद्देश्य अधिकाधिक धनोपार्जन है। अपने कार्यक्षेत्र में विस्तार के लिए पूंजीवाद ने सरकारी तंत्रों से गठजोड़ किया। परिणाम यह हुआ कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में पूंजीपतियों द्वारा समर्थित सरकारें बनने लगी और यही से लोकतंत्र के बिखरने के प्रमाण सामने आने लगे। इस प्रक्रिया से जनता के अधिकार सीमित हुए हैं। जो लोकतंत्र स्वतंत्रता, समानता, धर्मनिरपेक्षता के आदर्शों पर स्वतंत्र परिवेश का निर्माण करता है वह परिवेश भी इससे दूषित हुआ। निर्वाचन-प्रणाली जो लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है उसमें अब जाति, धर्म, नस्ल को आधार बनाकर जनता को अपने पक्ष में किया जा रहा है। जनता को संगठित करने का यह सबसे सस्ता और आसान तरीका है। राजनीतिक पार्टियों द्वारा बहुसंख्यकों में यह प्रचारित किया जाने लगा है कि अल्पसंख्यक उनके लिए किस प्रकार घातक साबित हो रहे हैं, यदि बहुसंख्यकों को अपनी भाषा, संस्कृति, धर्म एवं परम्पराओं को बचाना है तो उन्हें अल्पसंख्यकों के विरोध में एकजुट होना होगा। अपने राजनीतिक समीकरण को मजबूत बनाने के लिए सरकारें न सिर्फ जातीय एवं नस्लीय हमलों को बढ़ावा देती हैं बल्कि कई देशों ने कानून बनाकर भी अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सीमित किया है। बांग्लादेश, पाकिस्तान, चीन, म्यान्मार सहित कई देशों में इसके ज्वलंत उदाहरण देखे जा सकते हैं। वर्तमान में सबसे ख़राब स्थिति म्यान्मार के ‘रोहिंग्या मुसलमानों’ की है। म्यान्मार में सदियों से शांतिपूर्वक जीवन बिता रहे रोहिंग्या मुसलमानों को पिछले कई सालो से बुद्धिस्ट अतिवादियों तथा वहाँ की सरकार और सेना के समर्थन से हिंसा का सामना करना पड़ रहा है। सन् 1982 में प्रशासनिक रूप से रोहिंग्या मुसलमानों की नागरिकता भी समाप्त कर दी गयी है। आज स्थिति यह है कि ये लोग टूटी नाव पर भी समुद्र पार करने को बेबस हैं। ये लोग भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश आदि देशों में अपनी जान बचाकर शरण लेने को विवश हैं।

कहने का तात्पर्य यह है कि पूरी दुनिया में ऐसी हजारों घटनाएँ घट रही है, वर्चस्व की इस लड़ाई में हजारों घर बेघर होते जा रहे हैं। इस वर्चस्व के खेल में कभी कश्मीरी पंडित प्रताड़ित होते हैं तो कभी दिल्ली के सिक्ख तो कभी गुजरात के मुसलमान। सभी जगहों पर अधिकतर बहुसंख्यक का ही वर्चस्व है और मीडिया से ये खबरें नदारद है। विश्व मानवाधिकार आयोग समय-समय पर ऐसे मामलों का संज्ञान लेते हुए वहाँ की सरकारों से उचित कदम उठाने की अपील भी करती रही हैं, लेकिन वह बेअसर ही रहा है। कमलेश्वर नियंत्रण की इस राजनीति पर क्षुब्ध होकर इसके पीछे निहित पूंजीवादी स्वार्थ को बताते हुए लिखते हैं– “नियंत्रण द्वारा आत्माओं को तोड़ा जाता है... फिर उन्हें विभाजित किया जाता है... उनमें सांस्कृतिक प्रतिरोध की शक्ति विखंडित की जाती है और तब बाजारवादी जोंके उस विभाजित कौम का सारा रक्त चूस लेती हैं। खंडित संस्कृति के श्मशानों में तब उत्सव के बाज़ार स्थापित होते हैं .... धर्म और इतिहास शोषकों के हाथों खिलौना बन कर नाचते-गाते, जश्न मनाते अपने ही विभाजित अंग के शत्रु और अपने विनाश का कारण बन जाते हैं।”3

 ऐसा हमेशा से ही होता रहा है कि सत्ता पर काबिज होने के ख्याल से राजनीतिक पार्टियाँ बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के बीच रेखा खींचती रही है और इस काम में उनको मीडिया का भरपूर साथ मिलता है। कई बार मीडिया अल्पसंख्यकों में हीनता का भाव पैदा करने की कोशिश करता है तो दूसरी तरफ बहुसंख्यक को श्रेष्ठता का बोध दिलाता है। मीडिया द्वारा संस्कृति, भाषा, धर्म, नस्ल आदि अनेक स्तरों पर यह मतभेद पैदा करने की कोशिश की जाती है ताकि सत्ता के प्रति अपनी वफादारी साबित हो सके और समाज में राजनीतिक पक्ष की दावेदारी को बरकरार रखा जा सके। ‘मीडिया बाज़ार और लोकतंत्र’ पुस्तक में इस बात की समीक्षा करते हुए लिखा गया है, “जातिवादी आग्रह मीडिया को किस तरह प्रभावित करते हैं इसे देखना हो तो हम पिछड़ी जातियों को आरक्षण देने की वी०पी०सिंह के जमाने में हुई कवायद पर गौर कर सकते हैं। इसकी प्रतिक्रिया में उठे आन्दोलन को हवा देने में, छात्रों नवजवानों को आत्मदाह देने के लिए उकसाने में, तमाम स्थापित पत्रकारों से लेकर अखबारों ने जो विवादस्पद रोल निभाया था वह आश्चर्यजनक था।”4

 इस प्रकार की तमाम खबरें मीडिया द्वारा परिणाम की परवाह किए बगैर दिखाई, चलाई जाती हैं। सरकारी चैनलों को छोड़ दिया जाये तो बहुत कम ही मीडिया माध्यम बचते हैं जो अपने दायित्व का निर्वहन ईमानदारीपूर्वक निभाते दिखते हैं। इसके विपरीत साहित्य इन मुद्दों को संजीदगी से लेता रहा है और आज भी अपनी प्रतिबद्धता के साथ कायम है। प्रेमचंद के ज़माने से लेकर आज तक के लेखन में समाज के शोषित, प्रताड़ित, वंचित आदि सभी पहलुओं पर खुल कर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की गयी है। यूँ तो साहित्य का जनवादी स्वरूप और मीडिया में विशेष कर प्रिन्ट मीडिया का उदय लगभग साथ-साथ हुआ। कुछ साहित्यकार तो महत्वपूर्ण पत्रकार भी रहे लेकिन समय के साथ मीडिया का स्वरूप तेजी से बदला और पूंजीपतियों द्वारा मीडिया में पूंजी निवेश ने न सिर्फ मीडिया को उसके लक्ष्य से भटकाया बल्कि उसकी विश्वसनीयता को संदेह के दायरे में खड़ा किया।

 भारतीय समाज में सांप्रदायिकता एक गंभीर समस्या है। यूँ तो यह समस्या साम्राज्यवाद की देन रही। लेकिन इसे प्रसारित करके और फलने-फूलने की अनुकूल स्थिति देश के राजनेताओं ने समाज में बनाये रखी। 1947 में सांप्रदायिकता का जो पौधा लगाया गया उसका फल समय-समय पर समाज को चखना पड़ा है। हिंदी साहित्य में इस गम्भीर समस्या पर लगातार लिखा-पढ़ा जाता रहा है। झूठा-सच, तमस, आधा गाँव, काले कोस, छाको की वापसी, लौटे हुए मुसाफिर आदि कृतियों में इस पर गंभीरता से विचार किया गया है। ‘शहर में कर्फ्यू’ तथा ‘हमारा शहर उस बरस’ जैसे उपन्यास में स्वतंत्रता के बाद के साम्प्रदायिक तनाव व दंगो को प्रस्तुत किया गया है। जगदीशचन्द्र ने अपने उपन्यास ‘मुट्ठी भर कांकर’ में विभाजन में बेघर हुए शरणार्थियों के विस्थापन की समस्या को उठाया है। स्वतंत्रता पश्चात भारतीय मुसलमानों की स्थिति को शानी के ‘काला जल’ तथा मंजूर एहतेशाम के ‘सूखा बरगद’ में बड़ी संवेदनशीलता के साथ चित्रित किया गया है। कश्मीरी पण्डितों के विस्थापन पर मनीषा कुलश्रेष्ठ का उपन्यास शिगाफ़, बाबरी मस्जिद विध्वंस पर ‘दूधनाथ सिंह’ का उपन्यास आखिरी कलाम, सन् 1984 के दंगे पर लिखी गयी कहानियाँ – भगवान की तलाश, सरबजीत, अफवाहें, क्या तुमने कोई सरदार भिखारी देखा आदि में सामाजिक असहिष्णुता तथा धर्मान्धता के उस रूप को देखा जा सकता है जो किसी भी प्रगतिशील समाज के लिए घातक होता है।

 मंजूर एहतेशाम ऐसे ही माहौल का चित्रण 'सूखा बरगद'5 में विस्तार से करते हैं। सांस्कृतिक एवं नैतिक पतन के इस दौर में धर्म निरपेक्षता को अख़बार के एक कोने में स्थान मिलना वर्तमान मीडिया और फासीवादी ताकतों के वास्तविक स्वरूप बयाँ करता है।

सन्दर्भ सूची
1- ओम प्रकाश कश्यप, आखरमाला, हिंदी मीडिया: नाम-दाम का चोखा धंधा
2- कमलेश्वर, हिंदुत्ववादी नाजीवाद, मेधा बुक्स दिल्ली पृ० 215
3- कमलेश्वर, कितने पाकिस्तान, राजपाल एण्ड सन्स दिल्ली पृ० 45
4- सं० पंकज विष्ट, मीडिया बाज़ार और लोकतंत्र, अक्षर शिल्पी प्रकाशन, दिल्ली (पृ०175)
5- मंजूर एहतेशाम, सूखा बरगद, राजकमल प्र० दिल्ली (पृ०228) 

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