मैंने लिखने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित किया है! - प्रकाश मनु

प्रकाश मनु

सुप्रसिद्ध साहित्यकार प्रकाश मनु से साक्षात्कार, कमलजीत कौर द्वारा

प्रकाश मनु बाल साहित्य के सुप्रसिद्ध लेखक हैं, जिन्होंने बच्चों के लिए कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, जीवनियाँ और ज्ञान-विज्ञान साहित्य समेत सभी विधाओं में लिखा है। उऩ्हें काफी लंबे अरसे से पढ़ती आ रही हूँ। खासकर उनके बाल कथा साहित्य ने मुझे बहुत प्रभावित किया है। बच्चों के लिए लिखी गई प्रकाश मनु जी की कहानियों में किस्सागोई का आनंद है, तो साथ ही वे आज के बच्चे के मन और सपनों से भी सीधे-सीधे जुड़ती हैं।

मनु जी बच्चों के दोस्त लेखक हैं, इसलिए उनकी लिखी कहानियों और उपन्यासों से भी बच्चों की झटपट दोस्ती हो जाती है। और बच्चे ही क्यों, बड़े ही उन्हें बड़ी रुचि से पढ़ते हैं। प्रकाश मनु जी की कहानियाँ हम सभी को अपने बचपन में ले जाती हैं और आनंदविभोर कर देती हैं। मनु जी की लिखी ‘मातुंगा जंगल की अचरज भरी कहानियाँ’ वह पहली पुस्तक है, जिसने मुझे खासा प्रभावित किया था। लिहाजा मेरी शोध निर्देशिका प्रोफेसर नीरज जैन जी ने मुझे पी-एच.डी. की उपाधि के निमित्त अपने शोधकार्य के लिए कोई अपनी पसंद का विषय तय करने के लिए कहा, तो तत्काल प्रकाश मनु जी के साहित्य पर ही मेरा ध्यान गया। फिर तो उनसे मिलने के भी बहुत अवसर आए और मैंने पाया कि बच्चों के लिए बड़ी तन्मयता से लिखने वाले प्रकाश मनु जी खुद भी बच्चों की तरह बड़े सरल और भावुक व्यक्ति हैं।

मनु जी बड़े ही मृदुभाषी है। उनसे बात करके ज्ञात होता है कि वो बाल साहित्य लिखते समय बालकों के बीच के पात्र बन जाते हैं। साहित्यकार के रूप में बाल और बालेतर दोनों पर प्रकाश मनु जी की विशेष पकड़ रही है। उनका साहित्य कल्पना के साथ यथार्थ की भी बात करता है। बच्चों से जुड़े तमाम विषय उनके साहित्य में नजर आते हैं। प्रकाश मनु जी के साहित्य को पढ़ते हुए बार-बार मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न होती थी कि बच्चों और बड़ों के लिए इतनी सुंदर कृतियाँ सिरजने वाले मनु जी का अपना जीवन कैसा है तथा वे कौन सी प्रेरणाएँ हैं, जो उन्हें साहित्य सृजन की राह पर ले आईँ और एक से एक अनूठी कृतियों का सृजन करवाती रही हैं। मनु जी ने बड़े खुलेपन और गहराई से मेरे प्रश्नों के उत्तर दिए। इसके साथ ही उनके जीवन के कुछ ऐसे अचरज भरे पहलू भी जानने को मिले कि मुझे लगा, मैं उन्हें एक नए रूप में जान रही हूँ।

प्रस्तुत है हिंदी बाल साहित्य के प्रमुख स्तंभ प्रकाश मनु जी से लिया गया यह साक्षात्कार, जो मनु जी के व्यक्तित्व के कुछ अनजाने पहलुओं के उद्घाटन के साथ-साथ बाल साहित्य की कई गंभीर समस्याओं की भी पड़ताल करता है।



कमलजीत कौर: आपने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि आपके माता-पिता देश विभाजन से पहले पाकिस्तान में रहते थे। आजादी के बाद वे उत्तर प्रदेश के शिकोहाबाद शहर में आ गए। यहाँ रहते हुए उनकी भाषा, संस्कृति में जो बदलाव आया, उसका आप पर क्या प्रभाव पड़ा?

प्रकाश मनु: ऐसा है कमलजीत जी, मेरे माता-पिता सरगोधा के कुरड़-कट्ठा गाँव के हैं, जो तब खुशाब तहसील में पड़ता था। वही खुशाब जहाँ के सुप्रसिद्ध लेखक खुशवंत सिंह हैं। आज तो खुशाब जिला बन चुका है। पर पहले सरगोधा हमारा जिला हुआ करता था। अब वह शायद एक जोन या विभाग है, जिसमें कई जिले आते हैं। सरगोधा उस समय भी बड़ा सुंदर और सुव्यवस्थित शहर था, जैसे आज चंडीगढ़ है। इसे सर गोधाराम ने बसाया था, इसीलिए इसका नाम सरगोधा पड़ा।

मेरे पिता का नाम है श्री चाननदास विग और माँ का नाम श्रीमती भागसुधी। चाननदास का अर्थ है, जो प्रकाश फैलाए और भागसुधी का अर्थ है, अच्छे भाग्य वाली, या सौभाग्यशालिनी। उनकी ठीक-ठीक जन्मतिथि तो नहीं पता, पर जो बातें और जो महत्त्वपूर्ण घटनाएँ वे अपने जीवन की बताते थे, उससे गणना करने पर पता चलता है कि उनका जन्म सन् 1908 में हुआ था। यह थोड़े अचरज की बात लग सकती है कि मेरी माँ पिता से कुछ महीने बड़ी थीं, और वे अलग-अलग गाँवों के नहीं, एक ही गाँव कुरड़-कट्ठा के थे। यानी बचपन में दोनों एक ही गाँव में पले-बढ़े, एक-दूसरे को खूब अच्छी तरह से जानते भी रहे होंगे, और आगे चलकर उनका विवाह हुआ, वे दांपत्य-सूत्र में बँध गए। पिता जी ने कभी बताया था कि विवाह से पहले जब वे जल के सोते पर पानी लेने जाते थे, तो माँ की सखियाँ उन्हें छेड़ती थीं। यह शायद तब की बात होगी, जब उनका विवाह तय हो गया था। तो माँ की सखियों को यह एक कौतुक भरा खेल मिल गया, कि एक ही सोते से लड़का और लड़की पानी भर रहे हैं, जिनका जल्दी ही विवाह होने वाला है। 

शायद उत्तर प्रदेश के लोगों के लिए यह चीज बड़ी अटपटी होगी, पर पंजाब में संभवतः कुछ अधिक खुलापन था, इसीलिए यह संभव था। हालाँकि यह कहना मेरे लिए मुश्किल है कि पंजाब में यह बात सामान्य थी, या यह मात्र अपवाद था। कमलजीत जी, आप पंजाब में रहती हैं, तो बेहतर ढंग से इस बात को जानती होंगी। 

अलबत्ता हमारा बड़ा सुंदर सा गाँव था, जो एक पहाड़ की तलहटी में था। वहाँ पानी का एक सोता फूटता था, जिसकी जलधारा से पूरे गाँव को पानी मिलता था। शायद आसपास के गाँवों का भी उसी से काम चलता हो। आगे चलकर यही जलधारा खुशाब नदी में मिलती थी। सन् सैंतालीस के नवंबर महीने में माँ-पिता जी अपनी जन्मभूमि छोड़कर, पहले अंबाला आकर रुके, और फिर कुछ महीनों के बाद हमेशा के लिए शिकोहाबाद में आकर बस गए। हालाँकि अपना गाँव छोड़ते हुए उन्होंने यही सोचा था कि बस, कुछ दिनों के लिए वे यह सब छोड़कर जा रहे हैं, और यह उपद्रव थमने पर वे फिर से वापस अपने घर, अपने गाँव आ जाएँगे। लेकिन दुर्भाग्य से, जन्मभूमि एक बार छूटी तो हमेशा के लिए ही छूट गई और जिंदगी भर उनकी यादों में कसकती रही।...

आपने ठीक अनुमान लगाया कमलजीत जी, पंजाब से उत्तर प्रदेश आने पर काफी बदलाव उन्हें देखने को मिला। और ऐसा ही बदलाव देर-सबेर खुद उनके जीवन में भी आया। शुरू में तो शायद वे उसी रूप में बरतते रहे होंगे, जैसा जीवन और ढब उनका पंजाब में था। फिर इस नए शहर की जरूरत और बदली हुई परिस्थितियों के अनुरूप उन्होंने धीरे-धीरे एक नए रूप में खुद को ढाला होगा। यों एक साथ नहीं, धीरे-धीरे बहुत सारे बदलाव उनमें आते गए और यह सिलसिला जीवन के अंत तक चला।...उनकी भाषा, रहन-सहन, खाना-पीना, पहनना-ओढ़ना और सामाजिक व्यवहार सबमें कुछ न कुछ तो फर्क आया ही। कुछ उनके अंदर पंजाब रहा तो साथ ही कुछ यू.पी. भी चला आया, और यों पंजाब और उत्तर प्रदेश दोनों की साझा संस्कृति उनके भीतर आकार लेने लगी। बचपन से वही हमें देखने को मिली...और खुद हमारे जीवन का अंग बन गई। फिर और चीजें भी बदलीं। लोक व्यवहार और मित्रों, परिचितों आदि से बरतने का तौर-तरीका भी। और अंततः सोच-विचार भी। इसका हम पर भी गहरा असर पड़ना ही था और वह पड़ा। इस लिहाज से हम लोग ठेठ पंजाबी नहीं, आधे पंजाबी आधे उत्तर प्रदेश के हैं। यानी कि एक साझी संस्कृति के वाहक।

हालाँकि कमलजीत जी, माता-पिता और घर-परिवार के अलावा परिवेश का भी असर पड़ना ही था, और वह बहुत पड़ा। हमारे ज्यादातर मित्र तो ठेठ उत्तर प्रदेश वाले ही थे। उनसे बतियाते हुए, और कभी-कभी उनके घर जाने पर भी हमें बहुत कुछ अपने घर से अलग नजर आया। उनमें जो कुछ अच्छा लगा, वह हमारे साथ हमारे घर भी चला आया। हमारे जरिए वह घर-परिवार के और लोगों तक भी पहुँचा। यों एक साझी संस्कृति के पलने में मैं पला। उसमें एक डोर पंजाब की थी, दूसरी उत्तर प्रदेश की। हालाँकि ये सारी चीजें बहुत धीरे-धीरे और अनजाने में ही होती हैं। तब यह सब समझ सकें, यह हमारे लिए संभव न था। हम तो समय की तेज धारा के साथ बह रहे थे। पर आज ये सारी बातें सोचता हूँ तो मैं यह देखकर कुछ-कुछ चकित और हैरान होता है कि समय और इतिहास कितने अनोखे ढंग से हमें रच रहा था। आज अगर मैं लेखक हूँ, तो इसका श्रेय बहुत कुछ मेरे समय और हालात को भी है, जिसने सीप में पड़ी पानी की बूँद को मोती बना दिया। यानी मैं खुद से लेखक नहीं हुआ, बल्कि मेरे समय ने बड़े अचरज भरे ढंग से मुझे लेखक बनाया है। और यह बात सचमुच बड़ी महत्त्वपूर्ण और गौर करने लायक है।

कमलजीत कौर: आप शुरू से ही अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे। इस राह पर चलते हुए कौन सी चीजें आप से पीछे छूट गई? 

प्रकाश मनु: हाँ, कमलजीत जी, आपने ठीक कहा। यह चीज मुझमें शुरू से थी, विद्यार्थी काल से ही, और आज तक चली आती है। मैंने कभी किसी का बुरा नहीं किया, और करना चाहा तो बिल्कुल ही नहीं। किसी के प्रति मेरे मन में वैर-विरोध या वैमनस्य का भाव नहीं है। जैसा जीवन, मन और स्वभाव मेरा है, उसमें यह हो ही नहीं सकता। और कोई मेरा शत्रु है, ऐसा तो मैं मान ही नहीं सकता। पर फिर भी, जीवन के हर मोड़ पर चाहे-अनचाहे बहुतों का विरोध और असह्य पीड़ा मुझे झेलनी पड़ी। सिर्फ इसलिए कि जिसे मैं ठीक समझता था, उसे पूरी हिम्मत से कहना मुझे पसंद था और यहाँ तिल भर भी मुझे झुकाया नहीं जा सकता। यह मेरे लिए एक सिद्धांत की बात थी, और अपने सिद्धांतों से बड़ा मैं किसी को नहीं मानता।

इसलिए जीवन के हर मोड़, हर रास्ते पर बेशुमार मुश्किलें मेरे सामने आईं। अब भी आती हैं। घोर दुख, अभाव और यहाँ तक कि अपमान भी झेलने पड़े। आप कह सकती हैं कि मेरी लगभग पूरी की पूरी कहानी ऐसी ही है। अथाह संघर्षों और गहरे उतार-चढ़ाव से भरी। उसमें राह रोकने वाले बड़े-बड़े पहाड़ हैं, तो अंतहीन खाइयाँ भी। इस सबके बीच मैं टूटने से कैसे बचा रहा, यही मेरे लिए आश्चर्य है।...आपको बताऊँ, जब मैं आगरा कॉलेज, आगरा में एम.एस-सी. कर रहा था, तो मेरा एक बड़ा प्यारा मित्र था, प्रदीप सुड़ेले। उसे हाथ देखना आता था। हॉस्टल में बहुत से छात्रों का हाथ देखकर उनके जीवन के बारे में बड़ी उल्लेखनीय बातें वह बताया करता था।...

एक दिन उत्सुकता हुई तो मैंने कहा, “प्रदीप, जरा मेरा हाथ देखकर भी कुछ बताओ।” उसने मुसकराते हुए कहा, “लाओ, चंदू भाई!” मेरा मूल नाम चंद्रप्रकाश विग है, तो वह प्यार से मुझे चंदू भाई कहकर बुलाता था। हालाँकि अगले ही पल प्रदीप ने मेरे हाथ की रेखाओं पर एक नजर डाली तो वह बुरी तरह चौंक गया। बोला, “अरे, चंदू भाई, आपकी तो पूरी जीवन रेखा ही बुरी तरह कटी-पिटी है। उफ, बुरा हाल है आपका तो...!” कहते-कहते वह रुक गया। खुद मेरा जी धक से रह गया। फिर उसने काफी दुखी और निराश होकर बताया कि “चंदू भाई, आपके तो पूरे जीवन में ही दुख और परेशानियाँ हैं। कभी आप चैन से नहीं रहेंगे।...बस, जीवन के आखिरी समय में आप थोड़ी शांति महसूस करेंगे, पर फिर जल्दी ही मत्यु आपको बुला लेगी।...आप बहुत दिनों तक यह शांति और चैन नहीं पा सकेंगे।”

आज सोचता हूँ, ये जो कदम-कदम पर आने वाली बाधाएँ और मुश्किलें हैं, कहीं इसी की ओर तो प्रदीप का इशारा नहीं था। बेशक मेरी सिद्धांतप्रियता ने ये सारी मुसीबतें खड़ी कीं, नहीं तो शायद मैं कुछ आराम से रह लेता।...पर सच बताऊँ कमलजीत जी, मेरी ये मुश्किलें, दुख-दर्द और बेआरामी मुझे पसंद है। मुझे एक कायर आदमी की शांति नहीं, एक लड़ते हुए आदमी की दिलेरी और लड़ते-लड़ते घावों की पीड़ा के साथ जीने से प्यार है। और अगर जीवन भर मुझे यही सब सहने को मिले, तो भी मुझे कोई शिकायत न होगी। बेशक बीच-बीच में ऐसे क्षण भी आते हैं, जब कि आँखों में आँसू भर आते हैं और चुपचाप गालों पर बहने लगते हैं। लगता है, जैसे मैं फूट-फूटकर रो पड़ूँगा। पर फिर मैं खुद ही इन आँसुओं को पोंछता हूँ, और पीछे का सब कुछ भूलकर आगे चल पड़ता हूँ।

यों कमलजीत जी, मेरी सिद्धांतप्रियता ने मुझे बड़ी असुविधापूर्ण स्थितियों में डाला, जिसमें दुनियादारी पीछे छूट गई, और दुनियादारी से जुड़ी जो-जो चीजें थीं, वे सब भी पीछे छूटती गईं। हालाँकि अपनी एक अलग राह पर चलते हुए जो आत्मिक सुख मुझे मिला, वह भी अपने आप में कुछ कम नहीं है और मैं उसे अपने जीवन की सबसे बड़ी दौलत मानता हूँ।

आपको बताऊँ, मैं अकसर ईश्वर से एक ही प्रार्थना करता हूँ कि हे ईश्वर, मेरा सिर या तो बस तेरे आगे झुके, या फिर उन अच्छे, भले और उदार लोगों के आगे, जिनमें सच्चे कलाकार, साहित्यकार, चिंतक, मनीषी और उदार गुणों से संपन्न मेरे गुरुजन शामिल हैं, जिन्होंने इस दुनिया को बनाने में अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया। इसके अलावा दुनिया में चाहे कोई कितना ही ताकतवर, शक्तिसंपन्न या पैसे वाला हो, या बड़े से बड़े सिंहासन पर बैठा सत्ताधीश हो, हे प्रभु, किसी के आगे मेरा सिर न झुकने देना।...मुझे मरना पसंद है, पर किसी अयोग्य आदमी के आगे सिर झुकाना नहीं। यह भी एक तरह की सिद्धांतप्रियता ही है, जिसके रास्ते मैंने खुद तैयार किए हैं और वे हर क्षण कुछ न कुछ त्याग और बलिदान माँगते हैं।...मुझे खुशी है कि मैं उन लेखकों की कतार में शामिल नहीं हूँ, जो पुरस्कार, पैसा और न जाने किस-किस चीज को पाने के लिए रिरियाते हुए, सत्ता के आगे नाक रगड़ते हैं। ऐसे लेखकों को क्या लेखक कहना चाहिए? कम से कम मेरा मन तो उन्हें लेखक मानने के लिए राजी नहीं है।

कमलजीत कौर: आप प्रोफेसर की नौकरी छोड़कर पूर्णत: साहित्य की ओर आ गए, इसमें आप की जीवनसाथी सुनीता जी का क्या योगदान रहा? 

प्रकाश मनु: कमलजीत जी, मैंने सन 1981 से 1983 कर डी.ए.वी. कॉलेज मलोट के हिंदी विभाग में पढ़ाया। मेरी पत्नी डा. सुनीता उस समय डी.ए.वी. कॉलेज फॉर वीमेन, अमृतसर में प्राध्यापिका थीं। वे दिन बड़े अच्छे और खुशियों भरे थे। मेरे विद्यार्थी मुझसे बहुत प्रेम करते थे, और मैं उन्हें पढ़ाता ही नहीं था, जी-जान से उनके व्यक्तित्व को सँवारने और उनके भीतर साहित्यिक समझ लाने के लिए व्याकुल था। इसलिए हर वक्त मेरे घर के दरवाजे उनके लिए खुले रहते थे। मैं उनका दोस्त अध्यापक था, जिससे वे अपने भीतर का सारा सुख-दुख कह लेते थे। पढ़ाने के अलावा मैं कविता वाचन, नाटक, डिबेट सबकी तैयारी करवाता था और पूरी तरह उसमें डूबा रहता था। विद्यार्थियों ने भी शायद इस तरह का दीवानगी भरा अध्यापक पहली बार ही देखा होगा। तो उनके उत्साह का ठिकाना न था, और वे मुझे अपना सच्चा दोस्त, गाइड और अभिभावक मानकर इज्जत करते थे। यहाँ तक कि उनमें से कुछ तो आज भी घर मिलने आते हैं और आदर से पैर छूकर जाते हैं। कहते हैं कि सर, हम आपको कभी भूल नहीं पाएँगे!

पर सन् 1983 तक पंजाब के हालात काफी बदलने लगे थे। भिडराँवाला ने वहाँ के वातावरण को काफी विषाक्त कर दिया था। इस कारण मन बड़ा विरक्त हो गया था। फिर कुछ निजी पारिवारिक कारण भी थे, जिसके लिए हमारा दिल्ली में रहना जरूरी था। संयोग से उन्हीं दिनों मैं दिल्ली प्रेस, जहाँ से ‘सरिता’, ‘मुक्ता’, ‘गृहशोभा’, ‘चंपक’ आदि पत्रिकाएँ छपती हैं, के संपादक विश्वनाथ जी से मिलने गया तो वे बड़े प्रेम से मिले। मेरी कविताएँ इन पत्रिकाओं में अकसर छपा करती थीं। मैंने विश्वनाथ जी को बताया कि मैं पंजाब छोड़कर दिल्ली आना चाहता हूँ तो उन्होंने कहा, “आप हमारे यहाँ आ जाइए। हमें एक मेहनती आदमी चाहिए।”

मलोट में तब मुझे शायद सत्रह-अठारह सौ रुपए मिलते थे, पर दिल्ली प्रेस में सात सौ रुपए पगार पर काम शुरू किया। यह तो फरीदाबाद से दिल्ली आने-जाने में ही खर्च हो जाता था। फरीदाबाद में मेरी दीदी रहती थीं। तो मैं भी यहाँ एक कमरा, जिसके साथ रसोई और बाथरूम भी था, किराए पर लेकर रहने लगा था। पर फरीदाबाद से दिल्ली आने-जाने में कोई चार घंटे लगते थे। फिर आठ घंटे की नौकरी, जिसमें ढेर सारी रचनाओं के संपादन का काम मुझे करना होता था, और शाम होते-होते आँखों का कचूमर निकल जाता था। बड़ा कठिन समय था।...पर मन में कहीं न कहीं आशा की यह ज्योति झिलमिल करती थी कि मैं साहित्य और पत्रकारिता के जरिए दुनिया बदलने की मुहिम में शामिल हूँ। आर्थिक कष्ट बहुत थे, पर मैं अपने आप को समझाता था कि एक रोटी नहीं तो आधी खा लूँगा, पर जिऊँगा अपनी शर्तों पर। 

यों कमलजीत जी, मैं प्राध्यापक की नौकरी छोड़कर पत्रकारिता में आया, जो अपेक्षाकृत बीहड़ पथ था। तमाम तरह के कष्ट और मुश्किलें थीं यहाँ। आर्थिक कठिनाइयाँ भी, और एक तरह की असुरक्षा भी। पत्रकारिता में शोषण का जाल काफी बड़ा था, जिसका वर्णन मैंने अपने उपन्यास ‘यह जो दिल्ली है’ में किया है। फिर यहाँ कोई पैंशन भी नहीं थी, जिससे कम से कम जीवन के आखिरी दिन तो ठीक से बीत जाएँ। लेकिन एक धुन थी, जो मुझे आगे लिए जाती थी। पत्रकारिता के जरिए असल में मैं साहित्य की ही सेवा करना चाहता था। तो जीवन भर कष्टपूर्ण स्थितियाँ रहीं और मैंने यह सोचकर कि इस सबके जरिए आखिर तो मैं साहित्य की ही सेवा कर रहा हूँ, उन्हें खुशी-खुशी स्वीकार किया।...

हालाँकि ऐसे हालात में भी मैं जी सका, और सारी तकलीफों के बावजूद बेहिचक अपनी राह पर आगे बढ़ता रहा, इसमें निश्चित रूप से सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण योगदान मेरी जीवन संगिनी सुनीता जी का ही है। ऐसे बहुत मौके आए कि वे न होतीं तो मैं टूट जाता। पर उनमें असाधारण दृढ़ता है, मुझसे कहीं अधिक—और जो एक बार तय कर लिया, उसे जीवन भर निभाने का अपार माद्दा भी। सही पूछिए तो वे ही मेरी शक्ति भी हैं। मैं तो बहुत भावुक और गैर-दुनियादार हूँ। हर महीने कहाँ से रोशन-पानी आएगा, कैसे रोजमर्रा की घर की जरूरतें पूरी होगीं, मैं कुछ नहीं जानता। पर यह पूरा का पूरा मोर्चा उऩ्होंने बड़े साहस और दिलेरी के साथ सँभाल लिया। हमारे पास बहुत ज्यादा साधन न थे, बहुत सादा हमारा रहन-सहन था, पर जो कुछ भी था, उसमें हम सिर उठाकर बड़े स्वाभिमान से जीते थे।...

फिर सबसे बड़ी बात यह कि उन्होंने अपनी और घर की जरूरतें कम से कम रखीं। बहुत कम जरूरतों में कैसे घर चलाया जा सकता है, यह उनसे सीखा जा सकता है। हालाँकि इसके लिए खुद भी वे हाड़-तोड़ मेहनत करती रहीं। सौभाग्य से हमारी दोनों बेटियाँ भी ऐसी ही हैं, जिन्हें किसी भी तरह का दिखावा पसंद नहीं है, और जो मानती हैं कि दुनिया की सबसे बड़ी सुंदरता तो मन की सुंदरता होती है। सुनीता जी ने उन्हें बहुत अच्छे संस्कार दिए। इसलिए यह जीवन चल गया, वरना मैं तो कब का हार जाता...या फिर बीच राह में ही टूटकर बिखर जाता, या शायद इतना जी ही न पाता और कहीं बीच में ही सफर अधूरा छोड़कर चला जाता। पर निश्चय ही सुनीता जी ने मुझे सँभाला। उनका हौसला ऐसा है कि मैं मन ही मन उसे सलाम करता हूँ।...और सच कहूँ तो कमलजीत जी, आज मैं हूँ और आपके सवालों का जवाब दे पा रहा हूँ तो शायद इसलिए कि मुझे सच में एक सार्थक जीवन मिला है, जो सुनीता जी का ही दिया हुआ है। इसके लिए मेरी हर साँस उनकी ऋणी है।

कमलजीत कौर: आप विज्ञान विषय के विद्यार्थी थे। फिर आप साहित्य की ओर कैसे आए? 

प्रकाश मनु: ऐसा है कमलजीत जी, स्कूली पढ़ाई के दिनों में मैं बहुत बुद्धिमान विद्यार्थी माना जाता था। बहुत अच्छे नंबर आते थे और अपनी कक्षा के सबसे होशियार बच्चों में मेरी गिनती होती थी। तो घर वालों का स्वाभाविक सपना था कि मैं इंजीनियर बनूँ। मेरे बड़े भाई, जगन भाईसाहब इंजीनियर थे, तो यह राह कुछ मुश्किल भी न थी। पर मेरा मन तो साहित्य में ही रमता था। हालाँकि मैं तो बस साहित्य के लिए ही जनमा हूँ, यह अहसास होने में काफी लंबा समय लग गया। आगरा कॉलेज, आगरा में भौतिक विज्ञान में एम.एस-सी. करते हुए मुझे बड़े साफ तौर से इलहाम सा हुआ कि मुझे तो साहित्य के लिए ही यहाँ भेजा गया है। तो मैंने अपने आप से पूछा कि आखिर चक्की के दो पाटों के बीच मैं कब तक पिसता रहूँगा? मुझे अब तय करना ही होगा कि मेरा आगे का रास्ता क्या होगा? और तभी मैंने निश्चय किया कि अब जिऊँगा या मरूँगा साहित्य में ही।...पूरी रोटी न मिल सकी तो आधी खाऊँगा, पर साहित्य की ही रोटी खाऊँगा मैं। 

यह सन् 1973 की बात है कमलजीत जी। कोई पचास बरस हो गए इस बात को। तब से मैं कह सकता हूँ कि मेरी एक-एक साँस साहित्य के लिए ही समर्पित है।

कमलजीत कौर: बचपन से ही साहित्य में आपकी रुचि रही, लेकिन क्या कारण था कि आप ने ज्यादातर बाल साहित्य लिखना शुरू कर दिया? 

प्रकाश मनु: कमलजीत जी, साहित्य और बाल साहित्य कोई दो अलग चीजें तो हैं नहीं। बाल साहित्य भी तो आखिर साहित्य ही है। आप बाल साहित्य पढ़ें या बड़ों के लिए लिखा गया साहित्य, एक सहृदय पाठक के रूप में अनुभूति, रस और सर्जनात्मक आनंद में आप कोई अंतर नहीं महसूस करेंगी। दोनों में एक ही आनंद की धारा बहती है, दोनों एक ही सर्जनात्मक रस और अलौकिक दीप्ति से ओतप्रोत हैं। और मैं लिखता हूँ तो भी बड़ों या बच्चों के साहित्य में मैं कोई अंतर नहीं महसूस करता। लिखते समय एक ही जैसी तल्लीनता की स्थिति में पहुँच जाता हूँ, और एक तरह की समाधि सी लग जाती है। मुझे यह होश कहाँ रहता है कि मैं बच्चों के लिए लिख रहा हूँ या बड़ों के लिए। बस, रचना ही मुझे आगे-आगे चलाए जाती है और मैं उस सृजनात्मक डोरी में बँधा-बँधा खिंचा चला जाता हूँ।...

तो कमलजीत जी, ऐसे दो अलग-अलग खाने मैंने नहीं बनाए कि यह साहित्य बच्चों का है तो कुछ अलग चीज है, और यह बड़ों का है तो इसमें कुछ और करना है। अपने आप कुछ होता हो तो होता हो, पर जतन करके मैं ऐसा कुछ नहीं करता। लिखता हूँ तो चाहे बच्चों का साहित्य हो या बड़ों का, मैं पूरी तरह डूब जाता हूँ। हाँ, बस एक अंतर रहता है कि जब बच्चों के लिए लिखता हूँ, तो खुद मेरा बचपन या फिर आज का बचपन ही एक बच्चा बनकर मेरे आगे बैठ जाता है। मैं लिखते समय बार-बार उसकी आँखों में झाँक लेता हूँ, और जब वहाँ खुशी की एक बारीक सी चमक नजर आने लगती है तो मैं समझ जाता हूँ कि मैं ठीक राह पर जा रहा हूँ, और मेरी कलम खुशी और आनंद से नाचने लगती है। ऐसे ही बड़ों के लिए लिखता हूँ, तो मेरे भीतर या आसपास से निकलकर कोई संजीदा चेहरा, कोई सहृदय इनसान मेरे सामने आ खड़ा होता है, और लिखते समय उसके चेहरे पर आ-जा रहे भावों पर मेरी नजर होती है। और लिखते समय अपने सामने बैठे उस संजीदा चेहरे पर मुझे हलकी सी भी तृप्ति की झाँई नजर आने लगती है तो भीतर आनंद का झरना बह उठता है कि मैं शायद कुछ कर सका, मैं शायद सच में ही कुछ रच सका, और फिर मैं और अधिक प्रफुल्लता और आवेग के साथ उस राह पर आगे बढ़ता हूँ। हालाँकि रचना पूरी होने पर मुझे एक सा ही आनंद मिलता है, फिर चाहे वह बच्चों की रचना हो या फिर बड़ों की।

यों कमलजीत जी, बड़ों के लिए भी मैंने बहुत लिखा है और अब भी निरंतर लिखता ही हूँ। बड़ों के लिए लिखे गए मेरे उपन्यासों ‘यह जो दिल्ली है’, ‘कथा सर्कस’ और ‘पापा के जाने के बाद’ की जबरदस्त चर्चा हुई थी। कविता-संकलन ‘छूटता हुआ घर’ पर मुझे पहला गिरिजाकुमार माथुर स्मृति पुरस्कार मिला था। इसी तरह मेरी कहानियाँ, बड़े ही असाधारण किस्म के इंटरव्यू और आलेख हिंदी की बड़ी प्रसिद्ध और प्रतिष्ठापित पत्रिकाओं में निरंतर छपते रहे हैं। पुस्तकें भी काफी आई हैं। अभी हाल में ही बड़ों के लिए लिखी गई कहानियों का संग्रह ‘तुम याद आओगे लीलाराम’ छपा है। इसी तरह कुछ बरस पहले प्रभात प्रकाशन की ‘लोकप्रिय कहानियाँ’ शृंखला में मेरी पुस्तक आई थी, ‘प्रकाश मनु की लोकप्रिय कहानियाँ’ जिसे बहुत सराहा गया, और अब भी लोग उसे ढूँढ़-ढूँढ़कर पढ़ते हैं। मेरे पास भी इन कहानियों पर जब-तब काफी सुखद प्रतिक्रियाएँ आती हैं।

कमलजीत कौर: पिछले कुछ वर्षों में विज्ञान और सूचना प्रौद्योगिकी की तरक्की के कारण हमारे समाज में अनेक परिवर्तन हुए हैं। क्या आपको बाल साहित्य में भी कोई बदलाव नजर आ रहा है? 

प्रकाश मनु: हाँ, कमलजीत जी, यह बात आपकी ठीक है कि विज्ञान और सूचना प्रौद्योगिकी के कारण हमारे समाज में काफी बदलाव आए हैं, और इसका बच्चों और बाल साहित्य दोनों पर ही काफी प्रभाव देखने को मिलता है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इससे हमारे परिवार का ढाँचा काफी कुछ बदला है। आपसी संबंधों पर असर पड़ा है। नौकरी, व्यवसाय, पढ़ाई-लिखाई आदि के सिलसिले में अब लोग घर से सैकड़ों मील दूर, यहाँ तक कि विदेश जाने में भी नहीं हिचकते। नौकरियों के अवसर बढ़े हैं और इस कारण घर से दूर जाना कई बार लाजिमी भी हो जाता है। इन सब कारणों से पुराने परंपरागत संयुक्त परिवार टूटने लगे हैं, और अब एकल परिवार अधिक दिखाई पड़ते हैं। फिर बड़े शहरों में ऐसे एकल परिवार भी बहुत हैं, जिनमें माता-पिता दोनों को ही नौकरी के सिलसिले में घर से बाहर जाना पड़ता है। इससे बहुत सी समस्याएँ पैदा हुई हैं। 

पहले बच्चे दादी-दादी या नाना-नानी के सान्निध्य में पलते थे, तो उन्हें दादी-नानी का अकूत प्यार मिलता था। बीच-बीच में उनकी मीठी सीख और समझदारी भरी बातें भी सुनने को मिल जाती थीं, जिससे उनकी राह आसान हो जाती थी। साथ ही दादी-नानी से एक गहरी मानसिक सुरक्षा और भावनात्मक सहारा भी उन्हें मिलता था, जिससे उनके पैर कभी भटकते नहीं थे और वे अच्छाई और इनसानियत की राह पर चलते थे। फिर दादी-नानी की कौतुकपूर्ण कहानियाँ उनके मन में कल्पना के नए-नए क्षितिज और सुंदर वातायन खोल देती थीं। यह सुख उनके लिए सचमुच एक अविस्मरणीय सुख था, जिससे जाने-अनजाने उनके भाव-जगत का निर्माण होता था। बिना पंखों के उड़ते हुए वे कल्पना में नई-नई दुनियाओं की सैर कर लेते थे। और इस सुख को वे जीवन भर सहेजे रहते थे।...

दुर्भाग्य से आज बच्चे इस सबसे वंचित हैं। हाँ, अब उन्हें टी.वी., मोबाइल, कंप्यूटर और इलेक्ट्रोनिक दुनिया के नए-नए गैजेट्स बहुत आसानी से मिल जाते हैं। इसलिए बच्चा समाज से कटकर एक वर्चुअल या काल्पनिक दुनिया में जीने लगता है। उसके पारंपरिक खेल, उसके दोस्त, यहाँ तक कि परिवारिक और सामाजिक संबंध—ये सभी पीछे छूटते से जा रहे हैं। इस कारण बच्चा बहुत अकेला और असुरक्षित हो गया है और छोटी-छोटी समस्याओं से घबरा जाता है। वह किसी से अपना सुख-दुख नहीं बाँट पाता, किसी को अपनी समस्या नहीं बता पाता। इस कारण अंदर-अंदर घुटता रहता है और कई बार निराशा में ऐसा आत्मघाती कदम उठा लेता है कि उसके घर-परिवार के लोग, मित्र और परिचित लोग एकदम भौचक्के रह जाते हैं। वे सब लगभग एक ही सुर में कहते हैं कि “अरे, यह बच्चा तो बड़ा सीधा-सरल था। हम तो सोच भी नहीं सकते थे कि यह ऐसा कदम उठा लेगा...!” पर इस सीधे-सरल बच्चे के भीतर क्या कुछ चल रहा है, क्या उन्होंने कभी यह समझने की कोशिश की? यह बात कोई नहीं कहता, और समस्या की असली जड़ भी यही है।

असल में कमलजीत जी, बच्चा आज एकदम अकेला हो गया है। माता-पिता की अति व्यस्त दुनिया में उसके लिए ज्यादा स्थान नहीं है। अध्यापकों की अपनी विवशता है। अन्य पारिवारिक रिश्तों और सामाजिक संबंधों से तो वह बहुत दूर आ ही चुका है। लिहाजा उसका संसार केवल मोबाइल और गैजेट्स की दुनिया तक सीमित हो गया है। लेकिन दुर्भाग्य से आज का बच्चा विज्ञान और सूचना प्रौद्योगिकी द्वारा निर्मित जिस वर्चुअल दुनिया में रहने का आदी होता जा रहा है, वह उसका सुख-दुख नहीं बाँटती। इन सबके कारण बच्चा एक तरह की दोस्तविहीनता की हालत में पहुँच जाता है, और नितांत अकेला रह जाता है। जैसे कोई अंधे कुएँ में आ पड़ा हो। 

हिंदी के वर्तमान बाल साहित्य में बच्चे का अकेलापन और उससे जुड़ी समस्याएँ बड़ी प्रमुखता से सामने आ रही हैं। मेरी एक कहानी है, ‘लाल फूलों वाली किताब’। शायद आपने पढ़ी हो। उसमें मम्मी-पापा दोनों काम पर गए हैं, पीछे बच्चा अकेला घर में उदास बैठा है। वह इस अकेलेपन से तंग आ गया है और सोचता है कि किससे दो बातें कर ले। तब उसे अपने सामने लाल परी नजर आती है, जो उसके आगे दोस्ती का हाथ बढ़ाती है और साथ खेलती भी है। बाद में वह उसे लाल फूलों वाली किताब देकर जाती है, जिसमें ढेर सारी सुंदर-सुंदर कहानियाँ हैं। परी मुसकराकर कहती है, “अब जब भी तुम्हें मेरी याद आए, तुम इस पुस्तक की एक से एक सुंदर, रंगभरी कहानियाँ पढ़ना। तुम्हें बहुत मजा आएगा।”

इसी तरह एक और कहानी है, ‘खुशी का जन्मदिन’। कहानी की नायिका खुशी है। उसका जन्मदिन आया तो वह खुशी और उत्साह से छलछला उठती है। वह उसे खूब धूम-धाम से मनाना चाहती है। पर उसके मम्मी-पापा दोनों काम पर गए हैं। खुशी घर में अकेली है, एकदम उदास। सोच रही है कि भला यह मेरा कैसा जन्मदिन है? कोई भी तो मेरी खुशी बाँटने वाला नहीं है। तभी अलमारी में रखे उसके खिलौनों में कुछ हलचल सी हुई। एक-एक कर कूदते हुए वे खुशी के सामने आ खड़े होते हैं, और फिर एकाएक सारे मिलकर खुशी के चारों ओर गोल घेरा बनाकर नाचते हुए, ‘हैपी बर्थडे टु यू’ गाने लगते हैं। यही नहीं, खुशी के जन्मदिन को पूरे आनंद से मनाने के लिए वे बड़े मजे में बर्थडे पार्टी के लिए खाना तैयार करते हैं और खूब हँसते-चहकते हुए सर्व भी करते हैं। ऐसे में खुशी के आनंद और उत्साह की कल्पना की जा सकती है। उसे लगता है, मेरा ऐसा बर्थडे तो आज तक नहीं मन पाया।

ऐसी मेरी और भी कई कहानियाँ हैं, जिनमें अकेले बच्चे की उदासी और उलझन है, तो उसे दूर करने के लिए कोई न कोई ऐसा खुशदिल इनसान मिल जाता है, जिससे उसे बड़ा सहारा मिलता है। इसी तरह बच्चे के होमवर्क की उलझन और परेशानी को लेकर भी कई कहानियाँ हैं। पर यहाँ भी बच्चे को अपनी परेशानियों से निजात पाने का कोई न कोई रास्ता जरूर नजर आ जाता है, जो उसे निराशा के घेरे से बाहर ले आता है, और उसके जीवन में फिर से नई उम्मीद की किरण झलमलाने लगती है। कहना न होगा, कि मेरी इन कहानियों को बच्चों ने सबसे अधिक पसंद किया है।

कमलजीत कौर: क्या आपको लगता है कि आज का बाल साहित्य बच्चों संबंधी चिंताओं को भी अभिव्यक्ति दे पा रहा है?

प्रकाश मनु: निश्चित रूप से कमलजीत जी। खासकर इधर का बाल साहित्य तो जैसे बाल मन और बाल मनोविज्ञान से एकदम सटकर चल रहा है, और बच्चे के मन की छोटी से छोटी हलचल, ऊहापोह और गहरी उधेड़बुन भी उसमें व्यक्त होती है। बच्चों के छोटे-बड़े सुख-दुख, चिंता और उलझनें, स्कूल और मित्रों से जुड़ी उनकी कुछ अलग तरह की समस्याएँ, उनकी भटकन, बिना वजह का झेंपूपन, आत्मप्रदर्शन और कुछ असामान्य किस्म की आदतें, कुल मिलाकर तो आज के बाल साहित्य में सभी के लिए जगह है। मैं पूरे यकीन के साथ यह बात कह सकता हूँ कि आज की बाल कविता हो, कहानी, उपन्यास, नाटक या अन्य विधाएँ, बच्चा और बाल संसार उनके केंद्र में है। 

इधर कई ऐसी मर्मस्पर्शी बाल कविताएँ लिखी गई हैं जिनमें बच्चे के दिनोंदिन भारी होते जाते बस्ते की चिंता है। ‘बस्ता कैसा भारी है, यह कैसी लाचारी है!’ सरीखी मर्मस्पर्शी पंक्तियाँ आपको इधर काफी देखने को मिल जाएँगी, जिनमें बच्चे का मन बोल रहा है। बड़ों की दुनिया से शिकवे-शिकायतें भी इधर कविता में बहुत आई हैं, जो पहले इस तरह रचनाओँ में नहीं आ पाती थीं। मेरी कविता ‘मम्मी जी, एक बात बताओ’ ऐसी ही कुछ अलग तरह की शिकायती कविता है। ऐसे ही एक और कविता ‘अब तो बात करोगी मम्मी’ में बच्चा मम्मी की नाराजगी को दूर करने का हर संभव जतन करता है। वह सब कुछ बर्दाश्त कर सकता है, पर प्यारी मम्मी की नाराजगी नहीं झेल पाता। मैं समझता हूँ, पहले ये भाव कविता में कभी इतने खुलकर नहीं आ पाए थे। 

इसी तरह आज की कहानियों में कहीं बच्चे के होमवर्क की समस्या है, तो कहीं मित्रों से रूठारूठी और तनाव की। कहीं परीक्षा के भूत से बेकल और परेशान बच्चे हैं तो कहीं एकल परिवारों में अकेले घर में बंद रहने वाले बच्चे की बेचैनी को व्यक्त किया गया है। स्कूल में तरह-तरह की प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए उत्सुक बच्चे हैं तो खराब दोस्तों की संगत में आकर भटकाव के शिकार हुए बच्चो की समस्याएँ भी हैं। अध्यापक और बच्चों के संबंधों को लेकर भी कई भावनात्मक कहानियाँ पढ़ने को मिलती हैं। गरीबी की मार झेल रहे बच्चों का दुख-दर्द आज की बाल कहानियों में उतरा है तो बड़ों की दुनिया को लेकर उसके शिकवे-शिकायतें भी। इसी तरह आज के बाल नाटक और उपन्यासों में भी बच्चों की दुनिया के तमाम रंग-रूप दिखाई देते हैं, उनके दुख, तनाव और परेशानियाँ भी। बच्चों के मन में जागते नए-नए सपने और कुछ कर दिखाने की ललक भी आज के बाल साहित्य में बड़ी प्रमुखता से अभिव्यक्ति पाती है।

खेल के समय भी खेल न पाने और हर वक्त पढ़ो-पढ़ो की हिदायतें सुनकर बच्चे के मन में जो खीज पैदा होती है, उस पर तो खुद मेरी कई कविताएँ हैं। इनमें ‘कितना और पढ़ूँ मैं बाबा, कितना और पढ़ूँ?’ कविता तो बच्चों में बहुत लोकप्रिय हुई है। इसी तरह घर में बच्चे को प्यार न मिलने या स्कूल में मिली उपेक्षा को लेकर भी कहानियाँ लिखी गई हैं। दोस्तों से जुड़ी कई समस्याएँ भी बच्चे को परेशान करती हैं, और उनका बच्चे के मन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। आज की बाल कहानियाँ, नाटक और उपन्यास उन्हें बखूबी व्यक्त कर रहे हैं। इस तरह आज के बच्चे और बाल जीवन से जुड़े बहुत सारे अत्यंत विरल किस्म के अनुभव भी आज के बाल साहित्य में बड़ी प्रमुखता से आ रहे हैं। एकल परिवारों में बच्चे के अकेलेपन को केंद्र में रखकर लिखी गई मेरी कई कहानियाँ हैं। ऐसे ही गाना गाने को लेकर झेंपने वाले बच्चे पर भी मेरी एकदम अलग तरह की कहानी है, ‘गुल्लू को गाना नहीं आता’। दोस्तों के बीच हर वक्त डींगे हाँकने वाले बच्चे को केंद्र में रखकर मेरी बड़ी दिलचस्प कहानी है, ‘जब अज्जू ने डींग हाँकी’। ऐसे ही एक हड़बड़िए बच्चे के हड़बड़िएपन पर लिखी गई मेरी कहानी ‘झटपट सिंह’ को भी बच्चों ने बहुत पसंद किया है। 

बाल साहित्य के और लेखकों ने भी इस तरह की बड़ी सुंदर और प्रभावशाली रचनाएँ लिखी हैं। अगर मैं उनके बारे में बताने बैठूँ, तो कई पन्ने भर जाएँगे। पर हाँ, उसका संकेत कर देना मुझे जरूरी लगा। इस लिहाज से आप हिंदी के बाल साहित्य को पढ़ें, खासकर बाल कथा साहित्य, तो वहाँ एक अनमोल खजाना आपको दिखाई पड़ेगा, जो बच्चे के मन और व्यवहार को समझने के लिहाज से बहुत काम का और जरूरी है।

कमलजीत कौर: मनु जी, अब एक थोड़ा अलग सा सवाल। आपके कथा साहित्य में बाल जीवन और आधुनिकता बोध किस रूप में सामने आता है। और साथ ही उसमें मौलिकता कितनी है? क्या आप इस बारे में कुछ बताएँगे।

प्रकाश मनु: देखिए कमलजीत जी, बाल साहित्य का एक अदना सा लेखक, चिंतक और पाठक होने के नाते मैं कह सकता हूँ कि किसी भी रचनाकर्मी के सृजन और समूचे रचना-संसार का महत्त्व इस बात से आँका जा सकता है, कि उसके पास अपना मौलिक चिंतन कितना है, या कि है भी या नहीं। ऐसे बहुत से लेखक हो सकते हैं, जिनके पास मौलिक चिंतन तो क्या, चिंतन जैसी कोई बात हो ही नहीं। उनके लिए लिखना एक शगल है, कोरा मनोरंजन या थोड़े-बहुत आनंद की चीज। और इससे उन्हें जो सराहना मिलती है, उससे उनका सुख थो़ड़ा और बढ़ जाता है। पर ऐसे लेखकों को सच पूछिए तो लेखक नहीं कहा जा सकता। वे जैसा-तैसा कुछ लिख तो लेते हैं, पर मेरे विचार से वे लेखक नहीं हैं। केवल शब्दों की क्रीड़ा करने वाले लोग हैं।

सच्चा लेखक क्या होता है और किसी लेखक की मौलिकता या अपनी एक अलग पहचान क्या होती है, जिसे वह अपने लिखे शब्द-शब्द में उतार देता है, यह देखना हो तो आप तुलसीदास, प्रेमचंद या निराला सरीखे लेखकों को देखें। अगर वे बड़े लेखक हैं तो इसलिए कि उनकी शख्सियत एक साहित्यकार की शख्सियत थी। वे केवल साहित्य लिखते समय ही साहित्यकार नहीं होते थे, बल्कि वे साहित्य को जीते थे। हर क्षण जीते थे। और अपने साहित्य के जरिए कोई बड़ा काम करना चाहते थे। बहुत कुछ बदलना चाहते थे, और एक नया समाज गढ़ना चाहते थे। और यह काम बगैर मौलिक चिंतन के नहीं हो सकता था। यह मौलिक चिंतन तुलसी में आया तो वे हिंदू समाज के उद्धारक बन गए, प्रेमचंद में आया तो वे भारतीय समाज की सच्चाइयों को व्यक्त करने वाले अनूठे कथाकार बन गए, और निराला में आया तो वे एक बड़े राष्ट्रीय पुनर्जागरण के महानायक बन गए। 

निस्संदेह तुलसी हों, प्रेमचंद या फिर निराला--वे हमारी महानतम साहित्यिक विभूतियाँ हैं। पर क्या उनमें मौलिक चिंतन न होता तो भी वे इतने बड़े साहित्यकार हो सकते थे? कदापि नहीं। इससे पता चलता है कि बगैर मौलिक चिंतन के कोई लेखक बड़ा साहित्यकार नहीं हो सकता।

अब अगर अपनी बात कहूँ, कि क्या सचमुच कोई मौलिक चिंतन मेरी काव्य शख्सियत या मेरे साहित्य में है? तो इसका जवाब, कायदे से, मुझे नहीं, मेरे पाठकों और अध्येताओं को देना चाहिए। पर मैं इतना जरूर कह सकता हूँ कि मैं केवल लिखने के लिए नहीं लिखता। मैंने लिखने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित किया है। जीवन का एक-एक क्षण अर्पित किया है और बहुत कष्ट उठाए हैं। पर साहित्य ही मेरे लिए जीवन आशा और जीवन आधार भी है।...और मेरा साहित्य भी कोरे आनंद के लिए नहीं है। मैं साहित्य के जरिए बहुत कुछ कहना, बहुत कुछ बदलना चाहता हूँ। और अगर बाल साहित्य की बात करें, तो बच्चों के लिए लिखते हुए मुझे कहीं अंदर से लगता है कि अपने लिखे साहित्य के जरिए मैं देश के बचपन को ही नहीं सँवार रहा, आने वाले भविष्य की भी नींव रख रहा हूँ। मेरा मानना है कि बच्चे एक बड़े परिवर्तन के वाहक हो सकते हैं। वे जो आज सीखेंगे, वह जिंदगी भर उनके साथ रहेगा, और फिर आगे चलकर वे ही देश और समाज के एक सुखद भविष्य की इमारत खड़ी करेंगे। 

हालाँकि बच्चों को सीधे-सीधे सीख देने में मेरा यकीन नहीं है। मेरी सारी कोशिश यह है कि अपनी रचनाओं के जरिए मैं उन्हें खेल-खेल में बहुत कुछ सिखा दूँ। वे बड़ा सपना देखना सीखें। वे बड़े काम करना सीखें, और एक दिन अपने बड़े इरादों से बहुत कुछ बदल दें। ऊँच-नीच और भेदभाव की दीवारें गिरा दें और मनुष्यता का जय-जयकार करें। और कुछ इस तरह से जिएँ—एक संवेदनशील इनसान की तरह—कि अच्छे काम करने वाले, अच्छे लोगों का एक कारवाँ बनता चला जाए—और आखिर उनके निरंतर प्रयत्नों से ‘विजयिनी मानवता हो जाए!’ मैं समझता हूँ, एक साहित्यकार के रूप में यही मेरा मौलिक चिंतन भी है।

कमलजीत कौर: मनु जी, भविष्य में आप आने वाले बाल साहित्यकारों से क्या अपेक्षाएँ रखते हैं? 

प्रकाश मनु: आने वाले साहित्यकारों से मैं कहना चाहूँगा कि अगर बच्चों के लिए वे कुछ अच्छा और सार्थक लिखना चाहते हैं तो इसके लिए जरूरी है कि वे बच्चों से जुड़ें, उनके मन के अंदर झाँकना सीखें और बच्चों के दोस्त लेखक होकर लिखें। मैं बड़ी विनम्रता से कहना चाहता हूँ कि जो कुछ आप बच्चों के दोस्त लेखक होने के नाते लिखते हैं, बस वही सार्थक है, बाकी सब निष्फल। उसे अच्छा बाल साहित्य नहीं कह सकते। इसी तरह केवल कथ्य पर ही ध्यान देना जरूरी नहीं है, बल्कि अपनी भाषा, अभिव्यक्ति और बात कहने का अंदाज—सभी को माँजना चाहिए, ताकि जो कुछ वे लिखें, वह सीधा बच्चों के मन में उतर जाए, और एक बार पढ़ने के बाद वे उसे कभी भूल न पाएँ। 

एक बात और मैं आने वाले लेखकों से कहना चाहता हूँ कि केवल लिखना ही काफी नहीं है, बल्कि खूब पढ़ना भी चाहिए। इसी तरह अपने लिखे हुए को बार-बार तराशना और संपादित करना भी जरूरी है। असल में जब हम कोई कविता या कहानी लिखते हैं तो लिखने से पहले वह हमारे मन में बन चुकी होती है। लिखते वक्त तो हम शब्द और आकार देकर उसी को बाहर लाते हैं, जो पहले ही हमारे मन में सृजित हो चुका है। इसलिए जब भी हम कोई कविता या कहानी लिखें, हमें सोचना चाहिए कि क्या यह ठीक-ठीक वही है, जो हमारे मन में बिजली की कौंध की तरह सृजित हुआ था। और अगर वह नहीं है, तो हमें इसके लिए बार-बार जद्दोजहद करके, सही शब्द और सही अभिव्यक्ति तलाशकर उसे मुकम्मल बनाने की कोशिश करनी चाहिए। इस लिहाज से हमारी हर रचना एक तरह से स्वतंत्र, संपूर्ण और अद्वितीय भी होती है। और वह ऐसी बन सके, यहीं लेखक की कला और सामर्थ्य की परीक्षा होती है। और इसी से पता चलता है कि कोई लेखक सिद्ध या उस्ताद लेखक है या नहीं।

फिर जो आने वाले साहित्यकार बच्चों के लिए लिखना चाहते हैं, मैं उनसे कहूँगा कि वे बच्चे के सपनों को आकार दें। बल्कि कुछ और भी आगे जाकर मैं कहूँगा कि वे बच्चों की दादी-नानी बनकर लिखें। बचपन में दादी-नानी से सुनी कहानियों का किसी बच्चे पर कितना गहरा असर पड़ता है, इसे हम सब जानते हैं। इस मामले में वे किसी बड़े से बड़े उस्ताद कहानीकार को भी पीछे छोड़ देती हैं। बच्चे साँस रोककर, बड़ी उत्सुकता से दादी या नानी की कहानी सुनते हैं कि आगे क्या हुआ...आगे क्या हुआ। और धीरे से कहानी के सुर में मिलाकर, वे उनके मन में अच्छाई का बीज भी डाल देती हैं, ताकि वे जीवन में हमेशा अच्छी राह पर चलें, अच्छे और भले इनसान बनें और दूसरों के दुख-दर्द को भी समझें। 

मैं समझता हूँ कि एक अच्छे बाल कहानीकार को भी ऐसा ही होना चाहिए। कम से कम मैंने तो पूरी जिंदगी वैसा ही होने की कोशिश की है। मैं कितना कर पाया, इसका निर्णय तो आने वाला समय करेगा, पर बच्चों और बच्चों के लेखकों के इतने प्यार भरे पत्र और सुखद प्रतिक्रियाएँ मुझे मिलती हैं कि मेरा मन और आत्मा संतुष्ट है कि बच्चों के लिए जो कुछ मैंने लिखा, वह कहीं न कहीं तो दर्ज हुआ ही, और कम से कम निष्फल तो नहीं गया।

***


परिचय: प्रकाश मनु
 
सुप्रसिद्ध साहित्यकार, संपादक और बच्चों के प्रिय लेखक। मूल नाम: चंद्रप्रकाश विग।
जन्म: 12 मई, 1950 को शिकोहाबाद, उत्तर प्रदेश में।
शिक्षा: आगरा कॉलेज, आगरा से भौतिक विज्ञान में एम.एस-सी. (1973)। फिर  साहित्यिक रुझान के कारण जीवन का ताना-बाना ही बदल गया। 1975 में हिंदी साहित्य में एम.ए.। 1980 में यू.जी.सी. के फेलोशिप के तहत कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से ‘छायावाद एवं परवर्ती काव्य में सौंदर्यानुभूति’ विषय पर शोध संपन्न। कुछ वर्ष प्राध्यापक रहे। लगभग ढाई दशकों तक बच्चों की लोकप्रिय पत्रिका ‘नंदन’ के संपादन से जुड़े रहे। अब स्वतंत्र लेखन। प्रसिद्ध साहित्यकारों के संस्मरण, आत्मकथा तथा बाल साहित्य से जुड़ी कुछ बड़ी योजनाओं पर काम कर रहे हैं।
उपन्यास: यह जो दिल्ली है, कथा सर्कस, पापा के जाने के बाद।
कहानियाँ: अंकल को विश नहीं करोगे, सुकरात मेरे शहर में, अरुंधती उदास है, जिंदगीनामा एक जीनियस का, तुम कहाँ हो नवीन भाई, मिसेज मजूमदार, मिनी बस, दिलावर खड़ा है, मेरी श्रेष्ठ कहानियाँ, मेरी इकतीस कहानियाँ, 21 श्रेष्ठ कहानियाँ, प्रकाश मनु की लोकप्रिय कहानियाँ, मेरी कथायात्रा: प्रकाश मनु, मेरी ग्यारह लंबी कहानियाँ।
कविता: एक और प्रार्थना, छूटता हुआ घर, कविता और कविता के बीच।
जीवनी: जो खुद कसौटी बन गए
आत्मकथा: मेरी आत्मकथा: रास्ते और पगडंडियाँ।
हिंदी के दिग्गज साहित्यकारों के लंबे, अनौपचारिक इंटरव्यूज की किताब ‘मुलाकात’ बहुचर्चित रही। ‘यादों का कारवाँ’ में हिंदी के शीर्ष साहित्कारों के संस्मरण। देवेंद्र सत्यार्थी, रामविलास शर्मा, शैलेश मटियानी, रामदरश मिश्र तथा विष्णु खरे के व्यक्तित्व और साहित्यिक अवदान पर गंभीर मूल्यांकनपरक पुस्तकें। साहित्य अकादेमी के लिए देवेंद्र सत्यार्थी और विष्णु प्रभाकर पर मोनोग्राफ। सत्यार्थी जी की संपूर्ण जीवनी ‘देवेंद्र सत्यार्थी: एक सफरनामा’ प्रकाशन विभाग से प्रकाशित। इसके अलावा ‘बीसवीं शताब्दी के अंत में उपन्यास: एक पाठक के नोट्स’ आलोचना में लीक से हटकर एक भिन्न ढंग की पुस्तक। 
बाल साहित्य की सौ से अधिक पुस्तकें, जिनमें प्रमुख हैं— प्रकाश मनु की चुनिंदा बाल कहानियाँ, मेरे मन की बाल कहानियाँ, मेरी संपूर्ण बाल कहानियाँ (तीन खंड), मैं जीत गया पापा, मेले में ठिनठिनलाल, भुलक्कड़ पापा, लो चला पेड़ आकाश में, चिन-चिन चूँ, मातुंगा जंगल की अचरज भरी कहानियाँ, मेरी प्रिय बाल कहानियाँ, इक्यावन बाल कहानियाँ, नंदू भैया की पतंगें, कहो कहानी पापा, बच्चों की 51 हास्य कथाएँ, चुनमुन की अजब-अनोखी कहानियाँ, गंगा दादी जिंदाबाद, किस्सा एक मोटी परी का, चश्मे वाले मास्टर जी, धरती की सब्जपरी, जंगल की कहानियाँ, अजब-अनोखी शिशुकथाएँ (तीन खंड), बच्चों का पंचतंत्र, ईसप की 101 कहानियाँ, तेनालीराम की चतुराई के अनोखे किस्से, (कहानियाँ), प्रकाश मनु के संपूर्ण बाल उपन्यास (दो खंड), गोलू भागा घर से, एक था ठुनठुनिया, चीनू का चिड़ियाघर, नन्ही गोगो के कारनामे, खुक्कन दादा का बचपन, पुंपू और पुनपुन, नटखट कुप्पू के अजब-अनोखे कारनामे, खजाने वाली चिड़िया, अजब मेला सब्जीपुर का (उपन्यास), मेरी संपूर्ण बाल कविताएँ, प्रकाश मनु की बाल कविताएँ, बच्चों की एक सौ एक कविताएँ, हाथी का जूता, इक्यावन बाल कविताएँ, हिंदी के नए बालगीत, बच्चों की अनोखी हास्य कविताएँ, मेरी प्रिय बाल कविताएँ, मेरे प्रिय शिशुगीत, 101 शिशुगीत (कविताएँ), मुनमुन का छुट्टी-क्लब, इक्कीसवीं सदी के बाल नाटक, मेरे संपूर्ण बाल नाटक (दो खंड), बच्चों के अनोखे हास्य नाटक, बच्चों के रंग-रँगीले नाटक, बच्चों को सीख देते अनोखे नाटक, बच्चों के श्रेष्ठ सामाजिक नाटक, बच्चों के श्रेष्ठ हास्य एकांकी (बाल नाटक), विज्ञान फंतासी कथाएँ, अजब-अनोखी विज्ञान कथाएँ, सुनो कहानियाँ ज्ञान-विज्ञान की, अद्भुत कहानियाँ ज्ञान-विज्ञान की (बाल विज्ञान साहित्य)।
हिंदी में बाल साहित्य का पहला बृहत् इतिहास ‘हिंदी बाल साहित्य का इतिहास’ लिखा। इसके अलावा ‘हिंदी बाल कविता का इतिहास’, ‘हिंदी बाल साहित्य के शिखर व्यक्तित्व’, ‘हिंदी बाल साहित्य के निर्माता’ और ‘हिंदी बाल साहित्य: नई चुनौतियाँ और संभावनाएँ’ पुस्तकें भी। संस्मरण, साक्षात्कार, आलोचना और साहित्येतिहास से संबंधित विचारोत्तेजक लेखन। कई महत्त्वपूर्ण संपादित पुस्तकें और संचयन भी। कई पुस्तकों का पंजाबी, सिंधी, मराठी, गुजराती, कन्नड़ समेत अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद।
पुरस्कार: बाल उपन्यास ‘एक था ठुनठुनिया’ पर साहित्य अकादमी का पहला बाल साहित्य पुरस्कार। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के ‘बाल साहित्य भारती पुरस्कार’ और हिंदी अकादमी के ‘साहित्यकार सम्मान’ से सम्मानित। कविता-संग्रह ‘छूटता हुआ घर’ पर प्रथम गिरिजाकुमार माथुर स्मृति पुरस्कार।
पता: 545, सेक्टर-29, फरीदाबाद-121008 (हरियाणा), 
चलभाष +91 981 060 2327
ईमेल: prakashmanu333@gmail.com
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संक्षिप्त परिचय: कमलजीत कौर
मानसा (पंजाब) में जन्म। पिता का नाम सरदार गिरधारी सिंह तथा माता का नाम श्रीमती भागवंती कौर। 
पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ से हिंदी में एम.ए. किया। सन् 2011 में एम.फिल. के बाद जीरकपुर (मोहाली, पंजाब) में हिंदी अध्यापिका के रूप में नियुक्ति। सन् 2013 में कुलवंत सिंह से विवाह। सन् 2014 में पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ के सांध्य काल विभाग की प्रोफेसर श्रीमती नीरज जैन के निर्देशन में पी-एच.डी. का शोधकार्य प्रारंभ कर दिया। अब वे ‘प्रकाश मनु के कथा-साहित्य में बाल सरोकार’ विषय पर अपना शोधकार्य कर रही हैं। वर्ष 2018 में उनका पहला हिंदी काव्य-संग्रह ‘चुप’ सप्तऋषि प्रकाशन, चंडीगढ़ से प्रकाशित हुआ। फिलवक्त शोधकार्य के साथ-साथ बाल साहित्य को लेकर शोधपत्र भी लिख रही हैं।
संपर्क - 108/ए, फर्स्ट फ्लोर, सिरसा सिटी, जीरकपुर (मोहाली), पिन-140603 (पंजाब), 
चलभाष: +91 805 464 0276
ईमेल: jeetkamaljeet.cpl@gmail.com

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