सूरज सिंह नेगी के उपन्यास साहित्य में वृद्ध विमर्श

नीलम वाधवानी

शोधार्थी, हिंदी विभाग, भाषा साहित्य भवन, गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद
ईमेल: vishnukriplani36@gmail.com
चलभाष: +91 840 122 4237


अद्यतन हिंदी कथा साहित्य के चर्चित एवं वरिष्ठ युवा कथाकार सूरज सिंह नेगी का जन्म अल्मोड़ा जिले में 17 दिसंबर 1967 में हुआ। पिता स्व. इंद्रसिंह नेगी तथा माता लक्ष्मी देवी जी की छत्रछाया में रहते हुए हाई स्कूल की शिक्षा पैतृक गांव में लेने के पश्चात कॉमर्स कॉलेज, जयपुर से प्रथम श्रेणी में स्नातक की डिग्री प्राप्त करी। तत्पश्चात राजस्थान यूनिवर्सिटी, जयपुर में प्रथम श्रेणी से एम.कॉम तथा एम फिल करते हुए “A Critical Appraisal of Industrial Development of Rajasthan " विषय पर पीएच.डी. की उपाधि ग्रहण की। डॉक्टर नेगी जी संप्रति सवाई माधोपुर में अतिरिक्त जिला कलेक्टर एवं अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट के पद को शोभायमान कर रहे हैं।
 डॉ. नेगी जी के अब तक दो कहानी संग्रह ‛पापा फिर कब आओगे' (2016) तथा ‛सांझ के दीप', चार उपन्यास ‛रिश्तों की आंच' (2016), ‛वसीयत' (2018), ‛नियति चक्र' (2019) तथा ‛यह कैसा रिश्ता'(2020) प्रकाशित हो चुके हैं। स्वयं सतत सृजनशील रहते हुए सर्जनशील लेखक समाज का निर्माण करने वाले नेगी जी के 6 से अधिक नाटक अप्रकाशित हैं। साहित्यिक गतिविधियों तथा राजकीय गतिविधियों के निर्वहन हेतु उन्हें कई अवार्ड एवं सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।

आधुनिक परिस्थितियों में सही तथा गलत के द्वंद्व को सामने रख कर यथार्थ को संबोधित करते हुए वृद्ध विमर्श से जुड़ी कहानियाँ एवं उपन्यास हमें स्वतंत्र्योतर काल से ही प्राप्त होने लग जाते हैं। विशेषकर उपन्यासों में यदि देखा जाए तो 1981 में पंकज बिष्ट के उपन्यास ‛उस चिड़िया के नाम' में सर्वप्रथम वृद्ध विमर्श के बीजों को देखा जा सकता है। तत्पश्चात 21वीं सदी में सन् 2000 में रवींद्र वर्मा का ‛पत्थर ऊपर पानी' तथा कृष्णा सोबती का ‛समय सरगम’, 2002 में काशीनाथ सिंह का ‛काशी का अस्सी’ उपन्यास, 2005 में ममता कालिया का ‛दौड़’ उपन्यास, 2007 में चित्रा मुद्गल का ‛गिलिगडु' उपन्यास, 2010 में काशीनाथ सिंह का ‛रेहन पर रग्घू’ उपन्यास, 2011 में रमेश चंद्र शाह का ‛सफेद पर्दे पर’ उपन्यास, हृदयेश का चार दरवेश उपन्यास आदि वृद्ध विमर्श साहित्य को समृद्धि देते हैं। साहित्यकार हमेशा अपनी कुछ विशेषताओं को लेकर साहित्य में अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है।
डा. नेगी जी के कथा साहित्य की यह विशेषता है कि वह यथार्थ को चित्रित करते हुए भी आदर्श के प्रति पाठक को सचेत करता हुआ चलता है। क्या हो रहा है तथा क्या होना चाहिए इसका हल उपन्यासों में लेखक द्वारा परत दर परत गंभीरता से स्पष्ट कर दिया जाता है। यह आदर्श समाधान पाठक को न सिर्फ संस्कारों एवं जीवन मूल्यों के बारे में सोचने को विवश करता है अपितु, एक साकार रूप ग्रहण करते हुए पाठक के व्यावहारिक जीवन का हिस्सा बनने की सामर्थ्य रखता है।
 जीवन मूल्यों के प्रति आस्थावान लेखक सूरज सिंह नेगी के संपूर्ण कथा साहित्य में वृद्ध जीवन का जीवंत एवं सूक्ष्म चित्रण मिलता है। आज मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए कहा जा सकता है कि हमारे देश के बुजुर्गों को अपने परिजनों से सामंजस्य बनाये रखने की मजबूरी होती है। यदि किसी कारणवश वह अपने परिजनों से सामंजस्य बना पाने में अक्षम रहता है, तो वृद्ध आश्रम ही एक मात्र विकल्प रह जाता है, जो सभी बुजुर्गों के लिए आसान नहीं होता, उनके लिए वहाँ का वातावरण उन्हें स्वीकार्य नहीं होता। बुजुर्गों के प्रति न्याय करने हेतु आवश्यक है कि उनके बारे में संवेदनशीलता से विचार किया जाए। उनकी भावनाओं को पढ़ने का प्रयास किया जाए। ‛रिश्तों की आँच’ उपन्यास में माता पिता एवं संतान के रिश्तों को आधार बनाते हुए स्पष्ट किया है कि किस प्रकार पिता अपना संपूर्ण जीवन अपने बच्चों के हित में लगा देते हैं। वृद्धावस्था में वही बच्चे अपने दायित्वों को भूल जाते हैं किंतु माता पिता सब कुछ जानते हुए भी बच्चों से मनमुटाव कभी नहीं करते है। पिछले छः दशक में विकास इतनी तीव्र गति से हुआ है जिसने जीवन शैली और सामाजिक व्यवस्था में अप्रत्याशित परिवर्तन किया है । वर्तमान बदलाव से आज के बुजुर्ग हतप्रभ हैं और अपने को परिवार एवं समाज के नए वातावरण में समायोजित कर पाने में असमर्थ पाते हैं। वृद्धावस्था की शिथिलताओं को व्यक्त करते हुए ‛रिश्तों की आँच' उपन्यास में लेखक कहते है, “अक्सर बुढ़ापे में इंसान दूसरों पर निर्भर हो जाया करता है। जो काम हम यौवनावस्था में स्वयं कर लेते है, जैसे भी आना हो, जाना हो, क्या खाना, किससे मिलना, इन सब में स्वतंत्र होते है। वृद्धावस्था आते ही इन सभी कामों के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाते है।"1 इस उपन्यास के माध्यम से अप्रत्याशित सामाजिक परिवर्तनों के सन्दर्भ में बुजुर्गों की समस्याओं को समझना, उनका अध्ययन करना और संभावित समाधानों को खोजने का प्रयास करना ही लेखक का प्रमुख प्रयास रहा है।


वृद्ध माता-पिता के प्रति संवेदन शून्यता के इस युग में यदि संवेदनशीलता का छोटा सा दीपक तलाश करने की कोशिश की जाए तो हमें ‛वसीयत' उपन्यास में संपूर्ण आभामंडल के साथ जगमगाता हुआ सूर्य प्राप्त होगा। ऐसा सूर्य जो युवा पीढ़ी के मन में अपने माता पिता के प्रति उदासीनता के भावों को नष्ट करने में पूर्णतया समर्थ है। भावों की अंतरंग गहराइयों के साथ लिखा गया ‛वसीयत’ उपन्यास पारिवारिक संबंधों पर आधारित है, जिसमें लेखक ने उत्तराखण्ड की कुमाऊंनी भाषा को शामिल कर पारिवारिक रिश्तों की महत्ता को उजागर करने का प्रयास किया है। यह उपन्यास तीन पीढ़ियों को समानांतर लेकर लिखा गया उपन्यास है,। लेखक ने यथार्थ को दिखाते हुए उपन्यास में एक ऐसा चित्र उकेरा है जहाँ पुत्र से पिता बनने की यात्रा का बड़ा ही मार्मिक चित्रण है। उपन्यास में माता-पिता की पीड़ा का वर्णन करने के लिए कई ऐसी घटनाओं को लेखक ने कथा यात्रा में पिरोया है जो सीधे पाठक के हृदय को रोमांचित करते हुए स्थिति पर विचार करने को प्रेरित कर देती है। नायक विश्वनाथ के माध्यम से कथाकार ने विश्वनाथ के पिता एवं विश्वनाथ के पुत्र दोनों के व्यवहार को अपनी स्थिति से तुलना करते हुए कहानी को आगे बढ़ाया है। एक स्थिति वह है जब विश्वनाथ का पुत्र आज विश्वनाथ की वृद्धावस्था में उसकी सतत उपेक्षा कर रहा है। पुत्र द्वारा की गई यही उपेक्षा विश्वनाथ के लिए अपने पिता के साथ स्वयं द्वारा किए हुए व्यवहार की स्मृति जागृत कर देती है। ऐसे में उसे अपने पुत्र राजकुमार में अपनी ही युवावस्था तथा स्वयं में अपने पिता की परछाई नजर आती है। उसे याद आता है किस तरह वह सदा अपने पिता को इसलिए दोषी मानता रहा कि उन्होंने विश्वा को बाहर पढ़ने हेतु अनुमति नहीं दी। अपनी युवावस्था में माता-पिता की चिंताओं से कोसों दूर विश्वनाथ को यदि चिंता थी तो वह थी ख्याति प्राप्त करने की। जिसे तरक्की हेतु विदेश जाने का पत्र तो जान से भी प्यारा लगा, लेकिन पिता द्वारा भिजवाए गये उस पत्र का मूल्य कुछ भी नहीं जिसमें उसकी मां की बीमारी तथा अंतिम इच्छा को बताते हुए पिता उसे घर बुला रहा है। स्मृति शैली में लिखे गए इस उपन्यास में डायरी तथा पत्रों के माध्यम से कथा को सार्थक विस्तार मिला है। विश्वनाथ की वृद्धावस्था से आरंभ होने वाला यह उपन्यास पुत्र राजकुमार के व्यवहार को तो पाठक के सामने रखता ही है किंतु वर्तमान के प्रति चिंतित तथा पश्चात्तापबोध से ग्रस्त विश्वनाथ द्वारा जो युवावस्था में गलतियाँ हुई है उन्हें भी समानांतर बताता रहता है। एक प्रसंग में विश्वनाथ जी के बुजुर्ग मित्र शर्मा जी की स्थिति को रखते हुए आज की संपूर्ण वृद्ध पीढ़ी की स्थिति को रख दिया गया है। जहाँ अपने ही पोते के जन्मदिन पर घर के नौकर को तो पार्टी में ले जाया जाता है किंतु दादा को नहीं। पार्टी के दिन अकेले घर में रह रहे दादा के भोजन तक की व्यवस्था नहीं की जाती है शर्मा जी की पंक्तियों में “बहू तो पराये घर की बेटी है उसे क्या दोष दूँ, उसने तो मेरी तकलीफें नहीं देखी हैं पर मेरा करण जो बचपन से ही मेरी मजबूरी देखता आ रहा है आज मेरी भावना को न समझ सका। मैंने एक-एक पल कैसे बिताया, मेरी आत्मा ही जानती है। रात के ग्यारह बजे तक बेसब्री से इंतजार करता रहा। न कोई फोन आया, न ही वह लोग पार्टी कर घर वापस लौटे। भूख के मारे हाल बेहाल हो रहा था। सोचा था पार्टी में से लौटते समय मेरे लिए खाना पैक करके ले आयेंगे। मैंने किचन में देखा कुछ न था, तभी टिफिन पर नजर पड़ गई। अक्सर सुबह की बची हुई रोटियाँ टिफिन में रख दी जाती हैं और शाम को काम वाली बाई को दे दी जाती हैं मैंने टिफिन में रखी रोटी निकाली और खा कर भूख शान्त कर डाली।"2 युवा पीढ़ी किस प्रकार पाश्चात्य सभ्यता की चकाचौंध कर देने वाली रोशनी में अपनों के अपनेपन का प्रकाश खोती जा रही है, इसका बखूबी चित्रण उपन्यास में किया गया है। उपन्यास में जिसे विरासत माना गया है वह है अपने पिता की डायरी जिसके भीतर पिता ने लिखा है कि-“ मेरे पुरखों द्वारा आजन्म परोपकार, परहित, त्याग, समर्पण और सत्य का पालन करते हुए संस्कार, जीवन मूल्यों तथा सिद्धांतों के साथ जीवन यापन किया गया, जिनका अनुसरण मैंने अपने संपूर्ण जीवन काल में किया, यही मेरी असल कमाई है, जिसे मैं आज अपने विश्वा के नाम वसीयत के रूप में समर्पित करता हूँ।"3 लेखक द्वारा लिखी इन पंक्तियों ने न सिर्फ उपन्यास के शीर्षक की सार्थकता को सिद्ध किया है वरन वृद्धावस्था में जीवन को नैराश्यपूर्ण न बनाकर मातृभूमि की सेवा में समर्पित हो जाने वाले भाव की ओर भी दिशा निर्देशित किया है। कुल मिलाकर परिवार, पैसा, नाम व शोहरत इन सभी के तालमेल पर रचित है डॉ. सूरज सिंह नेगी का ‛वसीयत' उपन्यास। जिसमें केवल परिवार की दासतां नहीं, बल्कि वो कड़वा सच है जो हमारे समाज का यथार्थ है।


‛नियति चक्र' उपन्यास में पिता का स्नेह अपने बच्चों के प्रति इतना प्रगाढ़ होता है कि वह उनके वशीभूत हो जाता है। पिता अपनी औलाद में अपना अक्स देखता है। अपनी औलाद के प्रति वात्सल्य एवं प्रेम के वशीभूत अपना सब कुछ औलाद को सुपुर्द कर देता है। बेटा उस पिता के त्याग और प्रेम को नहीं समझ पाता। अपने अंतिम समय में पिता को अपने ही घर से बेघर होना पड़ता है यहाँ तक कि अपना वास्तविक नाम तक छिपाना पड़ता है ताकि दुनिया उसके बेटे को ताने न दे। नियति चक्र घूमता है और एक दिन बेटा अर्श से फर्श पर आ जाता है। नियति चक्र उपन्यास से पुत्र चित्रांश की पंक्तियों में “मैंने बाबूजी के जीवन काल में उनका तिरस्कार किया, मैं स्वयं उनको अपना प्रतिद्वन्द्वी मान बैठा, मुझे लगा जैसे वह पुरातनवादी विचारधारा के साथ जी रहे हैं। यहाँ तक कि उनके घर से जाने के बाद भी मुझ पर कोई असर नहीं हुआ, लेकिन इस पुण्यात्मा को सम्मान न देने का नुकसान मुझे उठाना पड़ा। धीरे-धीरे कम्पनी घाटे में जाने लगी, तैयार किए जा रहे माल की गुणवत्ता घटिया होने से बाजार में खरीददार नहीं मिले। कार्य का बोझ बढ़ता जा रहा था। इसी दौरान जब आपसे मुलाकात हुई और बाबूजी के विषय में नजदीक से जानने का अवसर मिला, मैंने प्रण कर लिया था कि उनके बताए गए मार्ग पर चलूँगा आप द्वारा सौंपी गई बाबूजी की डायरी एक जीता जागता जीवन दर्शन है।"4 एक पुत्र की बदलती हुई मानसिक स्थिति का चित्रण करते हुए उपन्यासकार ने चित्रांश के हृदय परिवर्तन को दिखाया है- “पिताजी की डायरी जब भी किसी संकट में या असमंजस में होता हूँ मेरा मार्गदर्शन करती है, लगता है जैसे मेरे बाबूजी आज भी मेरा मार्गदर्शन कर रहे हैं। जिन कर्मनिष्ठ और संस्था के वफादार कर्मचारियों को मैंने अहंकारवश संस्था से निकाल दिया था उनसे पुनः सम्पर्क साधा और उन सबको अपनी भूल के लिए क्षमा याचना करते हुए संस्था में लौट आने का आग्रह किया, आज बाबूजी के समय के कुछ वफादार कर्मचारी मार्गदर्शक को भूमिका में कार्य कर रहे हैं। सच यही है कि मैं अहंकार के वशीभूत इन नींव के पत्थरों की कद्र न कर सका और कंगारूओं को देख उन्हीं को सब कुछ मान बैठा था।"5 इस तरह उसे अपनी भूल का अहसास होता है वह समझ जाता है कि जिस चकाचौंध में वह रह रहा था वह सब पिता के आशीर्वाद से ही था। किंतु अब उसे समझ में आ गया था कि कर्म ही इंसान को महान बना सकता है।

निष्कर्ष रूप में संवेग, मानवीय संवेदना, परम्परागत मूल्यों को स्थापित करने वाले भाव पूर्ण शब्द डॉक्टर नेगी के कथा साहित्य का परिचय देते हैं। जो वृद्धों के प्रति संवेदनहीनता के इस युग में इसे और अधिक प्रासंगिक बना देते हैं। यहाँ यह कहना आवश्यक है कि डॉक्टर नेगी ने अपने साहित्य के माध्यम से पत्र विधा तथा डायरी विधा की प्रासंगिकता को भी सिद्ध किया है। सहज सरल भाषा को अपनाते हुए सूरज सिंह नेगी जी का संपूर्ण साहित्य उपन्यास सम्राट प्रेमचंद के साहित्य के समान आदर्श उन्मुख यथार्थवादी साहित्य है। डा. रमेश चंद मीणा के शब्दों में  “समीक्षित उपन्यास वसीयत पढ़ते हुए पिता पुत्र संबंधों पर ज्ञानरंजन की कहानी ‛पिता' याद आती है उषा प्रियंवदा की ‛वापसी' में भी पिता पुत्र के रिश्तों में दरार दिखाई पड़ती है। निर्मल वर्मा का उपन्यास ‛अन्तिम अरण्य', हृदयेश का ‛चार दरवेश', कृष्णा सोबती का ‛समय सरगम' आदि वृद्धों की असहायता को दिखाते हैं। ‛वसीयत' इससे पूर्व में लिखे गए उपन्यासों की विषय वस्तु से अलग और विशिष्ट कथ्य की रचना साबित होती है। इसमें न केवल वृद्धों की आज के समय की असहायता और अकेलापन उजागर होता है अपितु पिता-पुत्र के आपसी रिश्तों में बढ़ती दूरी को दिखाने के बाद पुनः जोड़ने का आदर्शवादी उपक्रम मिलता है।"6 यह पंक्तियाँ उनके सभी उपन्यासों पर भी उसी तरह लागू होती हैं जिस तरह ‛वसीयत' पर।

संदर्भ सूची

1. ‛रिश्तों की आंच' उपन्यास डॉक्टर सूरज सिंह नेगी नवजीवन पब्लिकेशन, प्र. स. 2016, पृष्ठ 101
2. ‛वसीयत' उपन्यास डॉक्टर सूरज सिंह नेगी,साहित्यागार प्रकाशक, पृष्ठ 80
3. वही,पृ.213
4. ‛नियति चक्र' उपन्यास, डॉक्टर सूरज सिंह नेगी, सनातन प्रकाशन, पृष्ठ 122
5. वही,, पृष्ठ 123
6. ‛समकालीन विमर्शवादी उपन्यास', रमेश चंद मीणा, पृष्ठ 151


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