भारतीय ज्ञान परम्परा: ‘संस्कृति-विमर्श’ का आख्यान

भारतीय ज्ञान परम्परा: औपनिवेशिक मानसिकता, स्थानीय अकर्मण्यता (संस्कृति विमर्श)

लेखक: राकेश सिन्हा, राज्यसभा सांसद 
प्रकाशक: सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़  डेमोक्रेसी एंड कल्चर, नई दिल्ली
वर्ष: 2023 ईस्वी
मूल्य: ₹ 50 रुपये

पुस्तक समीक्षा: सितारे हिन्द


समीक्षित पुस्तक ‘भारतीय ज्ञान परम्परा: औपनिवेशिक मानसिकता, स्थानीय अकर्मण्यता’ प्रो. राकेश सिन्हा द्वारा लिखित है। सद्यः प्रकाशित यह पुस्तक लेखक के द्वारा किये गए ‘संस्कृति-विमर्श’ का आख्यान है। इस पुस्तक के द्वारा लेखक भारत की सामूहिक चेतना (Collective Conscience) पर संवाद करते हैं। प्रो. राकेश सिन्हा इस विषय को बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं। उनका कहना है “हम एक ऐसे मुद्दे पर संवाद कर रहे हैं जिसपर इस देश में लम्बे समय तक लम्बी बहस की आवश्यकता है”1 सवाल यह है कि लेखक ‘भारत की सामूहिक चेतना (Collective Conscience)’ को क्यों जरुरी मान रहे हैं? दरअसल लेखक की चिंता भारत को खंडित चेतना के रूप में मूल्यांकित न करके एक सामूहिक चेतना के रूप में मूल्यांकित करने की है। सामूहिक चेतना (Collective Conscience) अपनी आधुनिक अवधारणा में एकजुटतावादी दृष्टिकोण, सामूहिक सोच, व्यक्ति के एकाकी रूप में अस्तित्व में रहने के बजाय सामूहिक रूप में सामने आने पर बल देता है।

डॉ. सितारे हिन्द
इस पुस्तक में लेखक ने भारतीय बुद्धिजीवियों की औपनिवेशिक मानसिकता पर सवाल खड़े किये हैं। ‘औपनिवेशिक मानसिकता’ का प्रश्न एक वैश्विक प्रश्न है। लेखक भारतीय सभ्यता और संस्कृति के इतिहास को ‘औपनिवेशिक इतिहास-दृष्टि’ से देखना सही नहीं मानते हैं। भारतीय सभ्यता और संस्कृति का बहुत ही पुराना इतिहास है। भारत के असाधारण और अनूठे भूगोल के कारण इसकी संस्कृति भी बहुरंगी है। अपने विविधता भरे भौगोलिक परिवेश, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, गहराई तक फैली ज्ञान-परम्परा को संजोये यह देश हमेशा ही अपने मूल्यांकन की माँग करता रहा है। लेकिन दुःखद यह है कि अधिकांश बुद्धिजीवियों की औपनिवेशिक मानसिकता तथा अकर्मण्यता के कारण यह देश आज भी पहचान के विविध आयामों से अछूता है। भारतीय बुद्धिजीवियों की औपनिवेशिक मानसिकता पर सवाल उठाते हुए इतिहासकार दामोदर धर्मानंद कोसंबी ने भी कहा था कि “बुद्धिजीवी न केवल अपने वस्त्रों में, बल्कि उससे भी बढ़कर साहित्य और कला में नवीनतम ब्रिटिश फैशन की नकल करता है। आधुनिक उपन्यासों और कथाओं की रचना, देशी भाषाओं में भी, विदेशी नमूनों अथवा विदेशी प्रेरणा पर आधारित है।

राकेश सिन्हा
भारतीय नाटक दो हजार साल से भी अधिक पुराना है, किन्तु आज के भारत का शिक्षित रंगमंच, और उससे भी बढ़कर भारतीय सिनेमा, दूसरे देशों के रंगमंच और सिनेमा की नक़ल करता है।”2 अतः विवेच्य पुस्तक में लेखक की चिंता भारतवर्ष की ज्ञान-परम्परा को भारतीय-दृष्टि से देखने की है। लेखक मानते हैं कि भारतीय साहित्य और संस्कृति में ऐसे बहुत से तत्व हैं जिनका अनुकरण विश्व के अन्य राष्ट्रों ने किया है। उदाहरण के रूप में लेखक कविकुलगुरु कालिदास और उनके प्रसिद्ध नाटक ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ को सामने रखते हुए कहते हैं “सन् 1783 में विलियम जोन्स (William Jones) ने महाकवि कालिदास के महान ग्रन्थ ‘शकुन्तला’ का अनुवाद किया था। वह काल था, जब जर्मनी और जर्मन विद्वान् अपनी नाट्य-शैली को फ्रांस के आधिपत्य से मुक्त कराने के लिए निरंतर प्रयास कर रहे थे। उस समय जर्मनी की नाट्य शैली पर फ्रांसीसी साहित्य (French Literature) का इतना अधिक आधिपत्य था कि जर्मनी के लोग अपने आपको फ्रेंच शैली का गुलाम मानते थे। सन् 1791 में जार्ज फ़ॉर्स्टर (Georg Forster) ने विलियम जोन्स द्वारा अंग्रेजी में अनुवादित शकुन्तला के लैटिन अनुवाद से इसका जर्मन में अनुवाद किया। ‘शकुन्तला’ ने जर्मन के विद्वानों के सैकड़ों साल के परिश्रम और कठिनाई को दूर कर नाट्यशास्त्र का रास्ता बताया और उस समय से जर्मन नाट्य-शैली फ्रांस की दासता से मुक्त हुई।”3 लेखक की चिंता यहाँ साफ समझी जा सकती है कि जहाँ एक तरफ महाकवि कालिदास के महाकाव्य तथा नाटकों ने जर्मन विद्वानों को मार्ग प्रशस्त किया वहीं भारत में कालिदास प्रायः उपेक्षित रहे हैं। एक ऐसे कवि जो हमारे गौरव हैं, जिन्होंने अपनी प्रांजल भाषा से कई रचनाएँ रची और भारत के विविधतापूर्ण भूगोल को विश्व में प्रसिद्ध किया, ‘जड़’ और ‘चेतन’ को सम भाव से वर्णित करते हुए जड़ में भी चेतनता का आभास करवाया, ऐसे महाकवि की उपेक्षा उनकी कम अपनी परम्परा के मूल्यांकन के प्रति घोर अन्याय है। महाकवि कालिदास तो यहाँ महज प्रतीक के रूप में हैं। एक सभ्यता समीक्षक के रूप में लेखक की असली चिंता सभ्यता, संस्कृति और भारत की महान साहित्यिक परम्परा के लगातार हो रहे अवमूल्यन के प्रति है। लेखक भारतीय जन समुदाय को सावधान कर रहा है कि जो जाति अपनी संस्कृति और परम्परा के प्रति नासमझ और असावधान रहेगा, हीन भावना से ग्रस्त रहेगा वह निःसंदेह गुलामी की और जाएगा। उसका पतन अवश्यंभावी है।

लेखक दूसरा उदाहरण ‘विज्ञान भैरव तंत्र’ से देते हैं। कश्मीर शैव धर्म की कौल त्रिका परम्परा से सम्बंधित यह पुस्तक अनुमानतः सातवीं से दसवीं शताब्दी के मध्य लिखी गई थी। इसे ‘शिव-विज्ञान-उपनिषद्’ भी कहा जता है जिसकी रचना अभिनवगुप्त ने की थी। अभिनवगुप्त कश्मीर के दार्शनिक तथा कव्यशास्त्री थे। भारतीय संस्कृति और साहित्य पर इनके व्यक्तित्व तथा काव्यशास्त्रीय सिद्धांतों  पर बहुत ही गहरा प्रभाव है। ‘विज्ञान भैरव तंत्र’ में 112 प्रकार की चेतना (Consciousness) की बात कही गई है।”4 हम देखते हैं कि आज विज्ञान के क्षेत्र में ‘तंत्रिका विज्ञान (Neuro Science) पर शोध चल रहा है लेकिन यह तथ्य  हतप्रभ करता है कि भारतीय मनीषियों ने अपने चिंतन और उच्च प्रतिभा के द्वारा शताब्दियों पूर्व ही इस क्षेत्र में मील का पत्थर स्थापित कर दिया था। जरुरत है अपनी परम्परा के उच्चतम प्रदेयों को समझने और संरक्षित करने की।

‘भारतीय ज्ञान परम्परा: औपनिवेशिक मानसिकता, स्थानीय अकर्मण्यता’ पुस्तक में लेखक, लार्ड मैकाले की शिक्षा नीति की तीखी आलोचना करते हैं। “मैकाले 1830 ई. में ब्रिटिश पार्लियामेंट का सदस्य चुना गया, और 1834 ई. में गवर्नर-जनरल की एक्जीक्यूटिव काउन्सिल का पहला कानून सदस्य नियुक्त होकर भारत आया....अंग्रेजी भाषा को सरकारी भाषा तथा शिक्षा का माध्यम और यूरोपीय साहित्य, दर्शन तथा विज्ञान को भारतीय शिक्षा का लक्ष्य बनाने में इनका बड़ा हाथ था।”5 लेखक का मन इस बात से व्यथित है कि जिस यूरोप ने हमें राजनितिक दासता दी और फिर सांस्कृतिक और वैचारिक दासता की तरफ धकेला, हम उसी यूरोप केन्द्रित वैचारिकता को आधार बनाकर अपनी सभ्यता और संस्कृति का मूल्यांकन करते हैं । जाहिर सी बात है कि ऐसा मूल्यांकन हममें हीनता का ही बीजारोपण करेगा।

इस चर्चा के दौरान प्रो. राकेश सिन्हा जी ने भारतीय नवजागरण के प्रमुख हस्ताक्षर प्रोफ़ेसर कृष्ण चन्द्र भट्टाचार्य के वर्ष 1931 ई. के संवाद को उद्धृत किया है। बंगाल के महान दार्शनिक प्रोफ़ेसर कृष्ण चन्द्र भट्टाचार्य को एक व्यापक सर्वदेशीय विचार को आगे बढ़ाने के लिए जाना जाता है। इस पुस्तक के माध्यम से प्रोफ़ेसर कृष्ण चन्द्र भट्टाचार्य का नाम हिंदी पाठक वर्ग के बीच जाना बेहद प्रासंगिक होगा, क्योंकि हिंदी पाठक वर्ग इस महान विभूति के नाम से प्रायः अपरिचित ही रहा है। विवेच्य पुस्तक में बड़े ही सम्मान के साथ उनके विचारों का स्मरण किया गया है। एक व्याख्यान में प्रोफ़ेसर कृष्ण चन्द्र भट्टाचार्य ने कहा था कि “राजनीतिक दासता से मुक्ति का तो आन्दोलन चल रहा है, लेकिन विचारों की जो दासता है, उससे मुक्ति का आन्दोलन चलना चाहिए। राजनीतिक दासता को समाप्त करना, राजनीतिक दासता की अनुभूति करना, राजनीतिक दासता को देख लेना आसान होता है, लेकिन वैचारिक दासता को, संस्कृति की दासता को देखना, उसकी अनुभूति करना, उससे मुक्ति पाना कठिन होता है।”6 यूरोप केन्द्रित वैचारिक दासता (Euro Centric Ideological Domination) का प्रभाव भारत सहित तीसरी दुनिया के देशों में कितना है, यह एक वैश्विक विमर्श का विषय है। इस विमर्श को एडवर्ड सईद (Edward Said) ने अपनी पुस्तक ‘Orientalism (1970)’ में उठाया था जिसमें उन्होंने बताया था कि यूरोप, भारत सहित तीसरी दुनिया के देशों पर शासन करने के लिए वहाँ की सभ्यता और संस्कृति को दोयम दर्जे का दिखाने लगा। यूरोपीय शासक वर्ग जानता था कि हम विजेता तभी बन सकते हैं जब जनता राजनीतिक दासता के साथ-साथ वैचारिक और सांस्कृतिक दासता स्वीकार कर ले। लार्ड मैकाले ने अपनी शिक्षा नीति के द्वारा बड़ी चालाकी से इसको अंजाम दिया। 

विवेच्य पुस्तक में लेखक का मन बिहार के स्मृतिशेष प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय और उसके विशाल पुस्तकालय को याद करके व्यथित हो जाता है। ऐतिहासिक तथ्य है कि भारतीय ज्ञान-परम्परा की विश्व प्रसिद्ध संस्था नालंदा विश्वविद्यालय और उसके विशाल पुस्तकालय को बारहवीं शताब्दी में खिलजी वंश के संस्थापक बख्तियार खिलजी द्वारा आग के हवाले कर दिया गया था। लेकिन लेखक तब अधिक दुखी होते हैं जब वो देखते हैं कि भारतीय ज्ञान परम्परा की एक बेमिसाल संस्था को जबरन ध्वस्त किये जाने की घटना पर एक भी ढंग की पुस्तक तक नहीं है, जबकि दुनिया के इतिहास में ज्ञान पर यह सबसे बड़ा हमला था।   इसके बनिस्बत मिस्र के नष्ट कर दिए गए ‘द ग्रेट लाइब्रेरी ऑफ़ अलेक्जेंड्रिया’ पुस्तकालय पर सैकड़ों पुस्तकें मिल जाती हैं। प्रस्तुत तथ्य के द्वरा लेखक कहना चाहते हैं कि ऐसे विषयों पर अगर चर्चा न हो, पुस्तकें न लिखी जाए तो वैश्विक स्तर पर हमारा वैचारिक प्रभाव कमतर ही रहेगा। 

इस पुस्तक में लेखक भारतीय ज्ञान-परम्परा की तीन विशेषताओं की तरफ पाठकों का ध्यान आकर्षित करते हैं – 1. संवाद का स्वभाव  2. कला की रचना का प्रयोजन ‘स्वान्तः सुखाय’ और 3. समावेशी प्रवृत्ति

पहली विशेषता के उदाहरण स्वरूप प्रो.राकेश सिन्हा जी ने संस्कृत साहित्य के महान रचनाकार भर्तृहरि तथा यशोविजय को उद्धृत किया है जिन्होंने माना था कि ज्ञान की वृद्धि हेतु दूसरी संस्कृतियों, परम्पराओं और सभ्यताओं में निरंतर संवाद की जरुरत है। लेकिन इसके लिए यह जरुरी है कि संवाद करने वाला अपनी संस्कृति, परम्परा तथा सभ्यता से पूर्ण परिचित हो।

भारतीय काव्यशास्त्र की समृद्ध परम्परा रही है। इसमें ‘काव्य प्रयोजन’ पर लगातार विमर्श होता रहा है कि काव्य का प्रयोजन क्या है? गोस्वामी तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ में इसके रचे जाने के पीछे ‘स्वान्तः सुखाय’ की प्रवृत्ति उद्घाटित की है – 
   “नानापुराणनिगमागम सम्मतं यद् रामायणे निगदितं क्व़चिदन्यतोऽपि।
   स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथगाथा भाषानिबंधमतिमंजुलमातनोति।।”(बालकाण्ड/7)

अनेक पुराण, वेद और शास्त्र से सम्मत तथा जो रामायण में वर्णित है और कुछ अन्यत्र से भी उपलब्ध रघुनाथ की कथा को तुलसीदास अपने अन्तःकरण के सुख के लिए अत्यंत मनोहर भाषा रचना में निबद्ध करता है। विवेच्य पुस्तक में प्रो. राकेश सिन्हा जी ने आठवीं शताब्दी के बौद्ध   विद्वान् शांतिदेव का जिक्र किया है, जिन्होंने अपनी रचनाओं में तुलसीदास से पूर्व ही काव्य का उद्देश्य स्वान्तः सुखाय घोषित करते हुए कहा था “मैं जो कुछ भी लिख रहा हूँ, अपनी संतुष्टि के लिए लिख रहा हूँ। मैं कुछ नया नहीं लिख रहा हूँ। मैं वही लिख रहा हूँ जो आप जानते हैं। जो आप समझते हैं, मैं स्वान्तः सुखाय के लिए पुस्तक लिख रहा हूँ।”7 इससे प्रतीत होता है कि ‘स्वान्तः सुखाय’ को काव्य का उद्देश्य मानना भारतीय परम्परा का एक अभिन्न हिस्सा है।

भारत हमेशा से समावेशी संस्कृति का उन्नायक रहा है। यहाँ लेखक ने भारतीय परम्परा की इस प्रवृत्ति की पहचान बड़ी बारीकी के साथ की है। भारतीय मनीषी ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की बात करते रहे हैं। ‘महोपनिषद्’ के षष्टम अध्याय का 71वाँ मन्त्र है – 
   “अयं निजः परोवेति गणना  लघुचेतसाम्।
   उदारचरितानां  तु  वसुधैव  कुटुम्बकम्।।”8

अर्थात् यह अपना है और यह पराया है ऐसी गणना छोटे हृदय वाले लोग करते हैं । उदार हृदय वालों का तो पृथ्वी ही संसार है। प्रो. राकेश सिन्हा लिखते हैं “जब हम भारत की ज्ञान परम्परा की बात करते हैं, तो हम किसी के विरुद्ध नहीं हैं, किसी को हटाना नहीं चाहते हैं, हम किसी को बहिष्कृत (Eexclude) नहीं करना चाहते हैं, हम सब समावेशी (Inclusive) होना चाहते हैं .....वैदिक काल से लेकर आज तक हमने पृथ्वी को अपना भूगोल माना और ब्रह्मांड को अपनी चेतना का कारण और परिणाम दोनों माना।”9  इस बहस को लेखक अद्वैत वेदान्त के महान दार्शनिक आदि शंकराचार्य के ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ से जोड़ते हैं। हम इस बात से पूर्ण परिचित हैं कि आदि शंकराचार्य ने आध्यात्मिक रूप से सम्पूर्ण भारत को संगठित करने का महत्वपूर्ण प्रयास किया था।

विवेच्य पुस्तक में लेखक औपनिवेशिक साये में बनाई गई शिक्षा पद्धति की तीखी आलोचना करते हैं। उनका मानना है कि हम बुद्धिजीवी अकर्मण्यता के शिकार हैं, क्योंकि हम अपनी ज्ञान परम्परा से अनिभिज्ञ हैं, अगर भिज्ञ रहते तो हमारे कविकुलगुरु कालिदास को ‘शेक्सपियर ऑफ़ इंडिया’ की जगह पर ‘कालिदास ऑफ़ ब्रिटेन’ कहा जाता। इस पुस्तक का परिशिष्ट बेहद महत्वपूर्ण है जिसमें लेखक भारत की बहुरंगी लेकिन सामासिक संस्कृति को ध्यान में रखते हुए कुछ महत्वपूर्ण बातें प्रस्तावित करते हैं। जिसमें महाविद्यालय तथा विश्वविद्यालय स्तर पर भारत की परम्परा, संस्कृति, भौगोलिक स्थिति आदि से सम्बंधित शोध-कार्य को वरीयता देने की बात की गई है।

देखा जाये तो विवेच्य पुस्तक ‘भारतीय ज्ञान परम्परा: औपनिवेशिक मानसिकता, स्थानीय अकर्मण्यता’ गहन चिंतन और शोध का परिणाम है। यह काफी विचारोत्तेजक पुस्तक है तथा शोध और विचार के नए आयामों को खोलती है। यह पुरानी औनिवेशिक धारणाओं पर न सिर्फ प्रश्न उठती है, बल्कि नई सोच भी प्रस्तावित करती है। अतः यह पुस्तक आज के समय के लिए बेहद जरूरी एवं प्रासंगिक है।

सन्दर्भ सूची
1. भारतीय  ज्ञान परम्परा: औपनिवेशिक मानसिकता, स्थानीय अकर्मण्यता, राकेश सिन्हा, सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ डेमोक्रेसी एंड कल्चर, नई दिल्ली, वर्ष-2023, पृष्ठ संख्या-5 
2. प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता, दामोदर धर्मानंद कोसंबी, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, वर्ष – 2009, पृष्ठ संख्या-15
3. भारतीय ज्ञान परम्परा: औपनिवेशिक मानसिकता, स्थानीय अकर्मण्यता, राकेश सिन्हा, सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ डेमोक्रेसी एंड क्लचर, नई दिल्ली, वर्ष-2023, पृष्ठ संख्या-5-6 
4. वही, पृष्ठ संख्या - 7 
5. सच्चिदानन्द. “लॉर्ड मैकाले.” लॉर्ड मैकाले - भारतकोश, ज्ञान का हिन्दी महासागर , भारतकोश, 19 Jan. 2014,   bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%B2%E0%A5%89%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A1_%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%87. 
6.भारतीय ज्ञान परम्परा: औपनिवेशिक मानसिकता, स्थानीय अकर्मण्यता, राकेश सिन्हा, सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़   डेमोक्रेसी एंड कल्चर, नई दिल्ली, वर्ष-2023, पृष्ठ संख्या-10
7. वही, पृष्ठ संख्या-20 
8. राष्ट्र-चेतना के चरण, डॉ. शशिप्रभा अग्निहोत्री (संपादक), नार्दर्न बुक सेंटर, नई दिल्ली, वर्ष-2009 पृष्ठ संख्या-287
9. भारतीय ज्ञान परम्परा: औपनिवेशिक मानसिकता, स्थानीय अकर्मण्यता, राकेश सिन्हा, सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़   डेमोक्रेसी एंड कल्चर, नई दिल्ली, वर्ष-2023, पृष्ठ संख्या-20

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