संस्मरण: एक मुलाक़ात डॉ. कुँअर बेचैन से

उषा राजे सक्सेना

उषा राजे सक्सेना


हमारी पहली मुलाक़ात कुँअर जी से कैसे हुई इसका खुलासा करने के लिए मुझे पीछे मुड़ना पड़ेगा। बात उन दिनों की है जब भारत के अधिकांश श्रेष्ट एवं प्रसिद्ध कवियों और साहित्यकारों का आतिथेय हमारा अथवा हमारे मित्रों का आवास होता था। कविगण हमारे घर पर हमारे साथ सात दिनों तक रहते थे। हर पल कविता का रंगोत्सव होता, जलपान, भोजन, कवि सम्मेलनों में जाना, घूमना-फिरना सब साथ-साथ होता था। मन में बहुत उमंग और ऊर्जा थी। बड़ा प्रेरक समय था। उन दिनों सरकार की तरफ से कोई वित्तीय प्रबंध नहीं था। हम अपनी कार स्वयं ड्राइव करते हुए उन्हें घुमाते-फिराते लंदन, बर्मिंघम, मैनचेस्टर याने पूरे मिडलैंण्ड में कवि सम्मेलन कराते थे। चौबीसो घंटे हम साथ रहते थे। इन यात्राओं में दूरियाँ खतम हो जाती थीं। आपसी निकटता और आत्मीयता बढ़ जाती थी। इन विद्वान साहित्यकारों के संगति में हमारे सृजन का भी विस्तार होता। कवियों को सुनना बीच-बीच में अपनी कविताओं का इस्लाह कराते जाना एक दिव्य अनुभव की तरह लगता और हम सहज ही गुरु और शिष्य का पावन संबंध भी बना लेते। अब सब स्वप्न-सा लगता है। शायद वह समय, उसकी निजता, उसकी मधुरता और खनखनाहट इस युग की आपा-धापी में खो गए हैं। अब संस्थाओं के पास सरकारी अवदान आवंटित हैं। कवियों को होटलों में रखा जाता हैं जो संभवतः इस समय की ज़रूरत है। वार्षिक कवि सम्मेलन का स्वरूप बदला है। अब काव्य यात्रा कार्यक्रम 15-20 दिनों का होता है जिसे मेरे पति के.बी,एल, सक्सेना मेरे आग्रह पर आईसीसीआर एवं भारतीय उच्चायोग के सहयोग से आगे बढ़ा रहे हैं। इस कवि सम्मेलन की अपनी गरिमा हैं। बीते दिन चूंकि वापस नहीं आते अतः उनके चलचित्र हमारे जेहन में सुंदरतम रूप में आवंटित हो जाते है।

डॉ. कुँअर बेचैन
सभी जानते हैं कि उस समय के भारतीय उच्चायुक्त डॉ. लक्ष्मी मल्ल सिंघवी हमारे संरक्षक थे किंतु हमारी ‘यूके हिंदी समिति’ एक स्वैच्छिक संस्था थी। अतः हम सब हिंदी प्रेमी, स्वयंसेवक थे। हम पर कबीर का दोहा ‘कबिरा खड़ा बाजार में लिए लुकाठी हाथ, जो घर जारो आपनो चलो हमारे साथ’ बिल्कुल सही उतरता था। उस समय हम दोनों काम-काजी लोग थे। दोनों बच्चे अभी पढ़ाई कर रहे थे। हम कोई धनाढ्य भी नहीं थे फिर भी अपनी ‘यूके हिंदी समिति’ के कवि सम्मेलनों को तीव्र गति देने के लिए संपूर्ण वित्त प्रबंध हम सब अपनी ही जेब से करते थे। आरंभ के कई वर्षों तक मैं स्वयं दो हवाई टिकट स्पांसर किया करती थी। वह वक्त था जब हमें हिंदी प्रेमियों को जोड़ने का जुनून था और हिंदी का ध्वज विश्व में फहराना था। ऐसे में हम जानते थे कि कवि-सम्मेलन से बड़ा कोई और विकल्प हो नहीं सकता था। हमारा विश्वास था, ‘जहाँ न पहुचे रवि वहाँ पहुँचे कवि’। इन कवि सम्मेलनों के माध्यम से ही हम भारत के कवियों और साहित्यकारों से जुड़े। साथ ही यूके में ढेरों सुप्त साहित्यकारों को पुरवाई पत्रिका, वार्षिक कवि-सम्मेलनों और 1999 में लंदन हुए विश्व हिंदी सम्मेलन द्वारा उनकी गुफा से बाहर ले आने के साथ नए कवियों और लेखकों को लिखने को की प्रेरणा दी थी। उसी का प्रभाव है कि आज यूके में साहित्यकारों और संस्थाओं की पूरी फौज हिंदी भाषा और साहित्य को तत्परता से आगे बढ़ा रही है।

उन्हीं आरंभ के दिनों में, 1996 के जुलाई के महीने में मैं अपनी पुस्तक ‘ब्रिटेन में हिंदी’ के लिए सामग्री तलाशने ब्रिटिश लाइब्रेरी गई थी। वहाँ लाइब्रेरियन ने कुछ समकालीन लेखकों की पुस्तकें मेरे सामने रखते हुए कहा कि इन पुस्तकों को पढ़ कर मैं बताऊँ कि ये पुस्तकें पुस्तकालय में संग्रहित करने योग्य हैं या नहीं। उन पुस्तकों में एक पुस्तक थी ‘मरकत द्वीप की नीलमणि’। इस पुस्तक ने मुझे सबसे पहले आकर्षित किया, और मैं इस पुस्तक को पूरी रात पढ़ती रही। रचनाकार के लेखन के हुनर और उसके गहन संवेदनाओं के अभिव्यक्ति पर आश्चर्य करती रही कि किस कुशलता से उसने उपन्यास के चरित्रों द्वारा कवि के व्यक्तिगत जीवन की संवेदनशील आवश्यकताओं के साथ भारतीय साहित्य, इतिहास, दर्शन, शास्त्रीय संगीत एवं रस सिद्धांतों का प्रतिपादन रोचक ढंग से प्रिया नीलमणि द्वारा कराया है। पहले कभी इस तरह का एकालाप करता हुआ फिलॉसॉफ़िकल रोमानी उपन्यास नहीं पढ़ा था जो इस उपन्यास के नायक कवि और उसकी प्रशंसक प्रेमिका/नायिका के मनोभावनाओं, संवेदनाओं और करुणा को इस गहराई और खूबसूरती से उकेरती हो। पुस्तक ‘मरकत द्वीप की नीलमणि’ एक प्रेमाख्यान है। जिसमे बड़े ही निराले ढंग से ठुमरी, ग़ज़ल, कविता और गीत आदि लिखने की विधा के बारे में विद्वतापूर्ण संवाद हैं। इस रसीले उपन्यास में लालित्य है, साथ ही कहानी के प्लॉट में प्रेम है, कवि है, कविता है, कवि की प्रेमिका है, ‘वो’ है और है उपन्यास का लेखक जिसकी उपस्थिति जगह-जगह बनी रहती है। कहीं-कहीं बोझिल होने के बावजूद भी पुस्तक मुझे रुचिकर और पठनीय लगी।

कथाकार ने इस उपन्यास में बेटी से नेपथ्य में बैठी माँ से हुए संवादों द्वारा एक कल्पनाशील कोमल हृदय कवि और उसकी प्रेमिका के संवेदनपूर्ण चाहत के गुप्त दरवाज़ों, खिड़कियों, तहख़ानों और रोशनदान के कपाट खोले हैं। उपन्यास में मुख्यतः तीन पात्र हैं कवि, उसकी प्रेमिका नीलमणि और ‘माँ’। माँ अंत तक नेपथ्य में रहती है। और चौथा पात्र ‘वो’ जो होता है, है तो वह शुरू से ही पर अदृश्य रहता है पर बाद में छाया की तरह उभरता है, वह रहस्यमय है। अचानक बहुत महत्वपूर्ण हो उठता है और कहानी के ताने-बाने में वह ऐसा बुन जाता है कि कहानी सुखांत होते-होते दुखांत हो जाती है और पाठक के मन में अवसाद-सा घुलने लगता है। पर दुख तो जीवन साथी है और एक कवि के जीवन में दुःख और वियोग की पीड़ा न हो तो उसमें संवेदना कैसे जगेगी? आदि कवि वाल्मीकि के मुख से निकली कविता की पहली पंक्ति हृदय में उमड़ी असीम पीड़ा की अभिव्यक्ति है –
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः । यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी काममोहितम् ।।

इस संपूर्ण उपन्यास की अंतरधारा प्रेम है, प्रेम में पीड़ा अंतर्निहित है और पीड़ा कविता की जननी है।
उपन्यास का आरंभ नीलमणि का माँ को संबोधित करते हुए अपने प्रथम-दर्शन के प्रेम यानी लव एट फर्स्ट साइट की कथा से आरंभ होती है-
‘सच कहती हूँ माँ!
मैं ज़रा- भी झूठ नहीं बोलूंगी।

यह कहानी मैं उस दिन की घटना से शुरू कर रही हूँ जब पहली-पहली बार किसी के धड़कनों में मुझे अपने मन के स्पंदन की प्रतीति हुई थी। जब उनके शब्दों ने मेरे रोम-रोम को छूकर मुझमें नया अर्थ भरा था।’ कहानी में माँ है किंतु उसकी ‘फिज़िकल’ उपस्थिति पूरे उपन्यास में कहीं भी नज़र नहीं आती है।

नीलमणि माँ को संबोधित करते हुए अपने प्रेमी कवि के प्रथम-दर्शन (लव ऐट फर्स्ट साइट) में हो जाने वाले प्रेम की अनुभूति की संवेदना का विवरण मधुर, कोमल एवं काव्यात्मक, भाषा और शैली में खुलकर करती है जिसमें कवि के ‘रूप’ का नहीं कवि के ‘शब्दों’ का उसके गीतों का बखान है, बयान है जो उसे प्रेम रस में डुबो देता है। नायिका का प्रेमी कवि मंच से काव्य पाठ करता है। संवेदनशील नायिका नीलमणि उसके शब्दों के सुगंध में खो जाती है। वह तरल हो उठती है और ‘अनंत शून्य की बाँसुरी से’ गुज़रती है। उसके गीतों के मादक धुनों का सम्मोहन और उसकी मदिर तानों के अक्षुण्य जादू’ का प्रभाव मानो उसे किसी अभौतिक (वायावी) संसार में ले गया हो ‘या फिर ऐसा भी महसूस हुआ था कि किसी मीठी-सी आग की शराबी लपटों ने अपूर्व संजीवनी के साथ किसी मृत शब्द के ठंडे बदन में जीवन की आँच भर कर प्राण फूँक दिए हैं।’ उपन्यासकार ने माँ को मात्र आलंबन बनाया है मणि से कहानी कहलवाने के लिए। कभी-कभी उपन्यास पढ़ते हुए माँ बेटी के संवाद में इस तरह (प्रेमी और प्रेम संबंधों के विवरण) का नैकट्य थोड़ा नाटकीय लगता है। अतः उपन्यास पढ़ते हुए सोचती रही कि उपन्यासकार ने पुस्तक ‘डायरी फॉर्म’ या पत्र विधा में क्यों नहीं लिखी? पर फिर सोचा यदि उपन्यासकार ने इसे पूर्णतः पत्र शैली अथवा दैननन्दिन के रूप में लिखी होती तो यह रचना इतनी अनोखी और निराली कैसे होती। वस्तुतः यह उपन्यास एक अनोखे प्रकार का एकालाप है जिसमें जगह-जगह लेखक स्वयं नायक के रूप में उपस्थित है अपनी आंतरिक चिर-प्यास और बेचैनियों के साथ।

सच तो यह है कि उन दिनों हम डॉ. कुँअर बेचैन को नहीं जानते थे। देश छोड़े हमें 33 वर्ष हो चुके थे। हिंदी लिखना-पढ़ना छूट चुका था। यूके हिंदी समिति के गठन के साथ ही लिखने-पढ़ने का दौर दुबारा नियमानुसार आरंभ हुआ।

पहली बार मेरा परिचय कुँअर बेचैन से उनकी पुस्तक ‘मरकत द्वीप की नीलमणि’ के लेखक के रूप में उनकी पुस्तक के द्वारा हुआ था। उपन्यास के पिछले पन्ने पर लिखे परिचय से यह तो समझ में आ गया कि यह उपन्यास एक ऐसे कवि का है जो संवेदनशील होने के साथ-साथ हिंदी भाषा और साहित्य का गहन ज्ञान रखता है। उसने भारतीय दर्शन का भी अध्ययन किया है जिसके कुछ सिद्धांत वह इस उपन्यास के माध्यम से प्रतिपादित करना चाहता है| साथ ही मुझे यह भी लगा कि लेखक खुद को प्यार करने को साथ–साथ मनुष्य और प्रकृति को पूरे मन से प्यार करता है। वह व्यष्टि से समष्टि की ओर जाता है। वह ब्रह्म, प्रकृति और जीव के रहस्यों को समझता है पर और अधिक गहराई से उसे समझना और समझाना चाहता है। इस उपन्यास द्वारा वह अपने जीवनानुभवों के साथ प्रकृति के रहस्यों का विश्लेषण अपने पात्रों के माध्यम से कर रहा है। उपन्यास के भाव, भाषा और कथावस्तु तीनों ही बता रहे थे कि यह कवि भावुक है और प्रेम के सागर में रांझा की तरह डूबा हुआ है। वह अपनी दिली ख्वाहिशों, चाहतों, अनुभवों और जीवन दर्शन को अपने पात्रों, नायक कवि, नीलमणि और ‘वो’ के माध्यम से व्यक्त करना चाहता है। उपन्यास गद्य में काव्याख्यान है। रूपक इस उपन्यास की जान है। इसे ललित उपन्यास की संज्ञा दी जा सकती है। सारांश यह है कि उपन्यास के कथावस्तु के अनोखेपन, सलिल प्रवाह और शैली के लालित्य के कारण मैंने इस उपन्यास ‘मरकत द्वीप की नीलमणि’ की अनुशंसा की और वह आज भी ब्रिटिश लाइब्रेरी की क़दीमी पुस्तकों के बीच संग्रहीत हैं।

महीने भर बाद ही डाँ, कुँअर बेचैन, बालकवि बैरागी और रामदरश मिश्र आदि यूके हिंदी समिति के आग्रह और निमंत्रण पर आए। हमारी प्रसन्नता की कोई सीमा न रही। कवि तुलसी दास ने कहा है, ‘जापर जाकी सत्य सनेहू, ता तेहि मिलहुँ न कछु संदेहूँ।’ गृह में प्रवेश करने के पश्चात अवसर पाते ही जलपान से पूर्व ही मैं कुँअर जी को अपने अध्ययनकक्ष में ले गई और उन्हें उनका उपन्यास ‘मरकत द्वीप की नीलमणि’ दिखाई उनके चेहरे पर वही ज़रा तिरछी सी मुस्कराहट आ गई जो उपन्यास के नायक के चेहरे पर आ जाती है। पुस्तक को हाथ में लेते ही बोले, ‘अरे! यह आप के पास कहाँ से आ गई? यह पुस्तक तो बस अभी-अभी प्रकाशित हुई है।’ ‘यह एक राज़ है। इसे रहस्य ही रहने दें।’ मैंने ऐसा क्यूँ कहा, यह राज़ मुझे भी नहीं मालूम है। उन्होंने पुस्तक पर पल भर में दो चिड़ियों का एक प्यारा सा रेखा चित्र खींचते हुए बेहद खूबसरत अक्षरों में लिखा, ‘स्नेहमयी उषा राजे सक्सेना एवं समस्त परिवार को -सस्नेह कुँअर बेचैन- 16.9.96।’ संभवतः नियति चाहती थी कि यह राज़ तब खुले जब उनकी 77वीं वर्षगाँठ हो।
कुँअर जी को 77वीं वर्षगाँठ पर हार्दिक बधाई!
आप श्रोताओं के दिलो पर राज करते रहें। आपकी लेखनी निरंतर गतिशील रहे, आपके सुर सदाबहार रहें, आप शब्दों में अनुभूति के रंग भरते रहे जिससे उसके नये-नये अर्थ स्पष्ट होते रहें।
‘देखें शत शारदों की शोभा, जीवें सुखी सौ वर्ष
देखें नव कलरव में सौ वसंत के हर्ष’

शुभकामनाओं सहित-
उषा राजे सक्सेना
usharajesaxena@gmail।com
+44 7443 483 235

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