संस्मरण: तिहाड़ जेल में एक दिन

डॉ. सुनीता

- सुनीता


बरसों पहले तिहाड़ जेल में बिताया हुआ वह दिन क्या कभी भूल सकती हूँ? अब तो हो गए कोई दस-ग्यारह साल। या शायद कुछ ज्यादा ही हो गए हों। पर वह मन में इस तरह खुब गया कि लगता है, जैसे कल-परसों की ही बात हो। एक ऐसी ताजगी से भरा दिन—और स्फूर्ति से लबालब, कि उससे मुझे आज भी ताकत मिलती है।

पर वह अचानक ही हमारे जीवन में आ गया था। वरना इससे पहले क्या कभी कल्पना भी की थी कि एक पूरा दिन मैं तिहाड़ जेल में बिताऊँगी। और वह भी अकेले नहीं, मनु जी के साथ। यों तो भीष्म साहनी भी हमारे साथ ही थे—भले ही अपने नाटक ‘मुआवजे’ के जरिए, जिसने उस दिन तिहाड़ जेल को भी एक खूबसूरत रंगशाला में बदल दिया था। यह गौरव मिलने से शायद तिहाड़ जेल भी धन्य हो गई। और हाँ, रामजी बाली...! उस उमंग भरे युवा नाट्यकर्मी को तो मैं भूल ही कैसे सकती हूँ, जिसकी साँस-साँस में नाटक समाया हुआ है।

वह उत्साह और दीवानगी से भरा खुशदिल नाटककार अपने उसी लुभावने मायाजाल में लपेटकर हमें तिहाड़ जेल ले गया था—मुझे और मनु जी दोनों को। और हम किसी और ही दुनिया में पहुँच गए थे। हमारी देखी हुई दुनिया से कितनी अलग थी वह दुनिया। हमारी सोच और कल्पना से एकदम अलग।

आखिर तो वह नाटक की दुनिया थी। पर फैलते-फैलते इतनी फैल गई कि हमारी पूरी दुनिया उसमें समा गई।
यों, मैं सोचती हूँ कि वह पूरा दिन भी तो एक नाटक ही था, जब हम तिहाड़ में थे और तिहाड़ जेल हमारे भीतर। थी तो जेल ही, पर उसने इस कदर हमें अपनी स्नेह-डोर में बाँध लिया था कि वहाँ से आने का मन ही न था। और आए भी तो मन का एक हिस्सा वहीं छूट गया और आज तक आजाद नहीं हो पाया। आज भी वह उसी तिहाड़ जेल में बंद है—और उसे फख्र है कि वह किसी ऐसी-वैसी नहीं, बल्कि तिहाड़ जेल का कैदी है!

चलिए, अब तिहाड़ जेल जाने का वह पूरा किस्सा ही सुनाती हूँ।...

रामजी बाली—राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से कुछ अरसा पहले ही कोर्स पूरा करके निकला—एक भला-सा लड़का। नाटक उसके रक्त में है और उसकी कलाकार बनने की धुन को हमने लगातार निखरते देखा है। पहले भी उसके दो फोन आ चुके थे और आज फिर उसने ठकठकाया, “सर, आप चल रहे हैं न?”

पहले भी दो बार कार्यक्रम बना था, पर किसी न किसी कारण स्थगित होता रहा। और अब तीसरी बार...! 
नहीं-नहीं, जाना है—जरूर जाना है! कहाँ? तिहाड़ जेल में कैदियों द्वारा खेले जा रहे नाटक ‘मुआवजे’ (भीष्म साहनी) की रिहर्सल देखने।

हालाँकि रिहर्सल तो एक बहाना था। दिमाग में यह था कि चलो, इस बहाने कैदियों से मिलेंगे। देखेंगे कि जेल का जीवन कैसा होता है? कैसा है वहाँ का वातावरण? कैदी किन हालात में रहते हैं और जेल में क्या, कैसा महसूस करते हैं।

वे... यानी कैदी हमारे ही जैसे हैं या कि कुछ अलग किस्म के होते हैं? क्या उनके चेहरे पर हर समय ‘अपराध’ लिखा रहता है? या कि पश्चात्ताप...? या दोनों के बीच की कोई चीज...!

खैर, फरीदाबाद से हम सुबह नौ बजे वाली ई.एम.यू. से तिलक ब्रिज, दिल्ली पहुँचे। वहाँ से पैदल राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, जहाँ हमें जेल में खेले जा रहे नाटक के निर्देशक गुलशन वालिया मिलने वाले थे। दरअसल रामजी बाली और गुलशन वालिया दोनों मिलकर ही उस नाटक का निर्देशन कर रहे थे। और दोनों में बहुत ही बढ़िया तालमेल था। ऐसा तालमेल जो किसी उत्कृष्ट नाट्य प्रस्तुति के लिए जरूरी होता है।

गुलशन वालिया भी 1986 के बैच में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्र रहे हैं और तब से अब तक उन्होंने अनेक नाटकों का सफल निर्देशन किया है। नाटक में पूरी तरह डूबे हुए आदमी हैं। जैसे कोई कवि हर वक्त अपनी कविता पक्तियों की तलाश करता रहता है, ऐसे ही गुलशन वालिया हर वक्त नाटक में ही खोए रहने वाले आदमी हैं। मुझे लगा, वे नींद में भी नाटक को और बेहतर कैसे बनाया जाए, यही सपने देखते होंगे। ऐसे लोगों को देखकर मुझे हमेशा यह लगता है कि उन पर कोई जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए। उन्हें उसी लीन अवस्था में रहते हुए देखना एक अद्भुत आनद की अनुभूति कराता है।

खैर, नाट्य विद्यालय में गाड़ी तैयार थी और कोई साढ़े ग्यारह बजे हम तिहाड़ जेल नं. पाँच के गेट पर पहुँचे। गेट इतना ऊँचा कि भीतर का कुछ भी दिखाई न दे। बस, एक आध झरोखा सा, जालीदार। उस भारी-भरकम लोहे के गेट में एक छोटी-सी खिड़की थी, जिसमें से एक-एक आदमी आ या जा सकता था। उस खिड़की के बाहर भी दो-तीन सिपाही थे और भीतर भी। बार-बार वही खिड़की खुलती थी और बंद होती थी।

इस बार खिड़की फिर खुली। हम चारों—मैं, प्रकाश मनु, गुलशन वालिया और रामजी बाली अंदर जाने लगे तो सिपाहियों ने मुझे और मेरे पति प्रकाश मनु जी को रोक लिया। रामजी बाली ने हमें इशारा किया कि “अभी पाँच मिनट आप रुकिए, हम भीतर से बात करके आते हैं।”

हम गेट के सामने ही पेड़ के नीचे बैठ गए। इसी बीच अदालत से कैदियों से भरी बस आई, जिसके भीतर एक और जंगला लगाया गया था, ताकि कैदी भाग न सकें। और बस के रुकते ही, सिपाहियों ने उस जंगले का ताला खोला तो एक-एक कैदी बड़े निष्फिक्र भाव से उतरने लगा। बस के पास एक सिपाही भरी स्टेनगन लिए बिल्कुल सावधान की मुद्रा में खड़ा था, ताकि कोई कैदी भाग न पाए।

इन कैदियों को देखकर मन में एक अजीब-सा भाव आता था कि न जाने इन्होंने कौन-सा अपराध किया होगा? न जाने ये कितने खूँख्वार होंगे? दिल में दहशत की एक लहर-सी दौड़ गई। 

कोई बीस-पच्चीस मिनट बाद रामजी बाली बाहर आया। बोला, “चलिए...!” 

मैंने पूछा, “क्या हमें अंदर जाने की परमीशन नहीं मिल रही थी?”

उसने बताया कि “जिस अधिकारी से विधिवत परमीशन ली थी, हमारे अंदर आने और जेल में नाटक का रिहर्सल देखने की, वह आज छुट्टी पर है। इसलिए दूसरे कुछ और अधिकारियों से परमीशन लेने में थोड़ी देर हो गई। अब ऐसी कोई बात नहीं। आप आराम से जेल देख सकते हैं और नाटक की रिहर्सल भी।...” मुसकराकर रामजी बाली ने हमें साथ ले लिया।

जैसे ही हम उस लोहे की खिड़की से भीतर घुसे, अंदर वाले सिपाही ने फड़ाक से फिर उसे बंद कर दिया और ताला लगा दिया। हमें एकबारगी लगा, “बस, अब हम भी कैदी हैं और यहाँ से कभी बाहर नहीं निकल पाएँगे।”
*

अंदर एक बड़ी सी ड्योढ़ी थी, जिसमें फर्श पर अभी-अभी अदालत से वापस आए कैदी लाइन में बैठे थे। उनकी एक-एक कर तलाशी ली जा रही थी, बड़ी सख्ती से। यहाँ तक कि चप्पल के बक्कल तक खुलवाकर देखे जा रहे थे, ताकि उनमें कोई पुर्जा या कोई आपत्तिजनक सामग्री न छिपा ली गई हो।

रामजी बाली और गुलशन वालिया हालाँकि नाटक के सिलसिले में यहाँ पिछले दो महीने से लगातार आ रहे हैं, फिर भी सुरक्षा के लिहाज से उनकी भी तलाशी ली गई और प्रकाश मनु जी की भी। हाँ, मुझे इससे नहीं गुजरना पड़ा। यह पुरुषों की जेल थी। ड्योढ़ी खत्म होते ही फिर वैसा ही विशालकाय मजबूत लोहे का फाटक और उसमें वही तीन गुणित दो फुट की खिड़की।

उस खिड़की को लाँघकर भीतर जाते ही, दो व्यक्ति सफेद झक्क कुरते-पायजामे और जैकेट पहने स्वागत की मुद्रा में मिले। उन्होंने विनम्रता से हाथ जोड़कर नमस्कार किया, हमने भी हाथ जोड़ दिए। लगा, शायद जेल के कोई अधिकारी होंगे! पर रामजी बाली ने पूछने पर थोड़ा आगे जाते ही बताया कि ये कैदी हैं और नाटक में भाग ले रहे हैं।

मेरा मुँह आश्चर्य से खुला-सा रह गया—इतने साफ-सुथरे, सलीकेदार। आत्मविश्वास से परिपूर्ण! और स्वास्थ्य की चमक जिनके चेहरों पर थी—ये कैदी हैं? उससे कहा कुछ नहीं, पर बहुत ही हैरानी हुई। मन में कैदी की तसवीर तो दूसरी ही है कि कोई बड़ा-सा कच्छा और ऊपर खुली-सी बंडी पहने शख्स। वह भी मटमैली-सी, जिस पर कोई नंबर लिखा होता है—313, या 526 या 727...!! और कहाँ यह झक्क सफेद प्रेस किया हुआ कुरता-पायजामे और जैकेट पहने दो स्वस्थ और शालीन पुरुष!

आगे बढ़ते हुए रास्ते के दोनों ओर खूब बड़ी-बड़ी कोई पचासेक फुट लंबी और दो फुट चौड़ी बैंचें, पक्की सीमेंट की बनी हुई, सड़क के दोनों ओर दिखाई दीं। पूछने पर रामजी बाली ने बताया कि कैदियों के घरों से जो खाने-पीने का सामान आता है, वह मुलाकात के दिन इन्हीं बैंचों पर बैठकर कैदी खाते हैं। भीतर बैरकों में यह सामान नहीं ले जाने दिया जाता।

उसी सड़क पर दोनों ओर झाड़ीनुमा पेड़ लगे थे, जो इतने अच्छे ढंग से तराशे गए थे, मानो हरी छतरियाँ हों। इतनी सफाई और खुलापन, खूब धूप, खूब खुला आसमान। आगे सड़क के मोड़ पर ही भगवान बुद्ध की श्वेत, भव्य प्रतिमा थी। बैठी मुद्रा में मानो संकेत कर रही हो कि अपने मन के अवांछित आवेश को शांत रखो। उसे ऊर्जा में बदल दो, वर्ना वह तुम्हें अपराधी बना देगा।

वहाँ प्रशांत मुद्रा में यह श्वेत मूर्ति देख, क्षण भर पैर ठिठक गए। लगा, जिसकी भी सोच से यह मूर्ति यहाँ स्थापित की गई है, उसे हजार बार धन्यवाद! जो भी कैदी पहली बार यहाँ आता होगा, उसे कम से कम एक क्षण तो इस मूर्ति की शांतिमयता, शांतचित्तता अपनी ओर अवश्य आकर्षित करती होगी। और अगर कोई कुछ देर इसके सामने खड़ा हो जाए, तो निश्चय ही भगवान बुद्ध की करुणा उसके हृदय की सारी जलन, दाह, घृणापूर्ण आक्रोश हर लेती होगी।
आगे गए तो देखा, इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय की तरफ से तिहाड़ जेल में एक अलग सेल खोला गया है, कैदियों को पढ़ाने के लिए। यहाँ एक बहुत अच्छी लाइब्रेरी भी है। यह एक बड़ा-सा परिसर है, जिसके चारों ओर बड़े-बड़े हॉलनुमा कमरे हैं और बीच में खूब खुला, चौकोर मैदान। मैदान के एक कोने में कुछ टोंटियाँ लगी थीं और उनके आसपास पक्का फर्श था। वहाँ कुछ कैदी कपड़े धो रहे थे। यहाँ फिर मुझे आश्चर्य हुआ कि किसी ने भी वह नंबर वाली बंडी और कच्छा नहीं पहन रखा था, जैसा कि आम तौर से मुंबइया फिल्मों में दिखाया जाता है। मुझे लगा—‘ये कोई और लोग हैं। कैदी तो कहीं सींखचों के पीछे होंगे—खूँख्वार, जेल के कपड़ों में!’

पर यह सुखद आश्चर्य था कि ये सभी जो कपड़े धो रहे थे या इधर-उधर आ-जा रहे थे, वे सभी कैदी थे। पूरा दृश्य किसी आम बस्ती का-सा था, जिसमें हर कोई अपने घर के साफ-सुथरे कपड़े पहने था। सबसे बड़ी बात यह थी कि किसी के भी चेहरे पर अपराधी होने का कोई भाव नहीं था। हर कोई हमसे ऐसे मिल रहा था, मानो हम उनके घर आए मेहमान हों।
*

इतने में ही हम उस बड़े से हॉल में पहुँए गए जहाँ नाटक की रिहर्सल होनी थी। रामजी बाली और गुलशन वालिया को देखते ही नाटक के सभी प्रतिभागी आवाज दे-देकर एक-दूसरे को बुलाने लगे कि “गुरु जी आ गए हैं। जल्दी आ जाओ, नाटक की रिहर्सल करनी है।”

कोई कपड़े धो रहा था, कोई खाना खाने गया था, कोई यहाँ-वहाँ टहल रहा था। लेकिन पंद्रह-बीस मिनट के भीतर ही कोई बीस-पच्चीस कैदी जो नाटक में भाग ले रहे हैं, इकट्ठे हो गए। दो कैदी साफ-सुथरे गिलासों में हमारे लिए ठंडा पानी ले आए। और फिर दो और कैदी कैंटीन से चाय और पकौड़े ले आए। इस बीच तबला नहीं आ पाया था, तो उसके बिना ही नाटक की रिहर्सल शुरू हो गई।

नाटक की शुरुआत एक गाने से हुई। नाटक के सभी पात्र मिलकर, “उठा-पटक भई, उठा-पटक है...!” गाते हुए गोल घेरे में घूम रहे थे। रामजी बाली और गुलशन वालिया कुर्सी के हत्थे पर ही इतनी अच्छी थाप दे रहे थे कि तबले की कमी महसूस नहीं हुई।

भीष्म साहनी का यह नाटक ‘मुआवजे’ भारतीय राजनीतिज्ञों और अफसरों पर करारा व्यंग्य है जो देश पर आई हर आपदा को अपने फायदे और वोट बैंक बढ़ाने की कुंजी समझते हैं।

नाटक में लगभग बीस-पचीस अभिनेता हैं, जो सभी तिहाड़ जेल के कैदी हैं। पर इनमें से किसी को भी देखकर ऐसा नहीं लगा कि ये कैदी हैं। कम से कम उन दो घंटों में, जब तक नाटक की रिहर्सल चलती रही, किसी के भी चेहरे पर ऐसी कोई छाया तक नजर नहीं आई, जिससे लगे कि वे यहाँ आकर कैदी का जीवन जी रहे हैं। सभी आत्मविश्वास से लबालब थे और अपने-अपने पात्र को इतनी तल्लीनता से जी रहे थे कि लगता था वे जन्मजात अभिनेता हैं। उनमें से तीन-चार का अभिनय तो हमेशा याद रहेगा। लाला सुखराम, मंत्री, जग्गा (विशेष रूप से जब वह जगन्नाथ बन जाता है), गुमाश्ता और ढपली वाले सुथरा का अभिनय करने वाले कैदी अपने-अपने पात्र को अद्भुत तल्लीनता के साथ जी रहे थे। लगता था, इनके अलावा शायद कोई और यहाँ जँच ही नहीं सकता था।
नाटक ने इस कदर हम सभी को बाँधे रखा कि कब ढाई, पौन तीन बज गए, पता ही न चला।

इन्हीं पात्रों में एक कैदी ऐसा भी था जो बहुत अच्छा गायक है, और अपने गीतों की रचना खुद ही करता है। वह बुल्लेशाह के गीत बहुत ही अच्छे गाता है। इस नाटक में भी एक सिचुएशन पर उसने बहुत बढ़िया गीत की रचना की है, और उसकी धुन भी खुद ही बनाई है। वह शायद कुछ दिन पहले ही पंजाब से आया है और हत्या के अपराध में बंदी है। 

मैं सोचने लगी, कौन-सा ऐसा क्षण रहा होगा जिसमें इतना संवेदनशील और उच्च कोटि का गायक हत्यारा बन गया होगा? निश्चय ही वह बड़ी विकट स्थिति रही होगी, जिसने इस कलाकार की सारी संवेदनशीलता को पल भर में दरकिनार कर, इसे हत्यारा बना दिया। पर यह भी बराबर लगता है कि उस क्षण के बीत जाने पर इसके मन में कोई पश्चात्ताप नहीं है, बल्कि उस क्षण इसे जो बिल्कुल उचित लगा, वही इसने किया। यही भाव कमोबेश सभी कैदियों का लगा। ठीक है, सजा भुगत रहे हैं, पर जो किया उसे गलत नहीं मानते।

इन्हीं में से एक कैदी बहुत ही स्वस्थ और हँसमुख युवक है। बताया गया कि वह कहीं हरियाणा का है। उसे पिता इनकम टैक्स में बड़े अधिकारी हैं और माँ अध्यापिका। यह अबोध-सा दिखने वाला युवक भी शायद हत्या के अपराध में बंदी है, लेकिन इतने अच्छे, प्रेस किए हुए कपड़ों में! और शरीर—जिम में बॉडी बिल्डिग का कोर्स किया हुआ हो जैसे। ऐसी बाँहें, जैसे मछलियाँ उछल रही थीं। इतना अपार बल छलछलाता, ठाठें मारता! इसे तो कहीं बड़ा सैनिक अधिकारी होना चाहिए था। इसका यह अपार ठाठें मारता बल देश की रक्षा में काम आना चाहिए था।
अंदर से बार-बार आवाज आती है—‘यह यहाँ कैसे है? कैसे? कैसे...क्यों..?’

एक साठ पार के वृद्ध हैं जो इस नाटक में लाला सुखराम का रोल निभा रहे हैं। मुझे ऐसा लगा कि नाटक को सिरे तक पहुँचाने और कामयाब बनाने का सबसे ज्यादा जोश उन्हीं में है! इतना बढ़िया अभिनय, इतना उत्साह! सब कुछ भूलकर अपने पात्र से एकमेक हैं। मानो यह आदमी जानता ही नहीं कि थकान किस चिड़िया का नाम है। बार-बार उलट-पलटकर आगे-पीछे रिहर्सल होती रही और इस शख्स का वही उत्साह। चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं।
गुमाश्ता का अभिनय करने वाला विनोद उत्तर प्रदेश के एटा जिले का है। हत्या के अपराध में बंदी है। दुबला-पतला शरीर, नाटा कद और साँवला चमकीला रंग, मगर आँखें बहुत चमकदार। गुमाश्ता के पात्र को जिया है इसने, बेजोड़ अंदाज में। लगता है, इस पात्र को सिर्फ यही लड़का सजीव कर सकता था। भाषा पर क्या गजब की पकड़ है इसकी। और आंगिक अभिनय—लाजवाब!

इसके साथ ही एक बात और महसूस हुई। वह यह कि हर कैदी इस बात के लिए कृतज्ञ था कि वे सब तो मिट्टी थे। जो भी कमाल है, वह तो ‘गुरु जी’ का ही है! गुरु जी यानी गुलशन वालिया और रामजी बाली, इन्होंने हमें गढ़ा है। जो हैं, इनकी बदौलत ही हैं। कितनी विनम्रता से वे सब इस बात को स्वीकार कर रहे थे।

नाटक के इन्हीं अभिनेताओं में एक पाकिस्तानी कैदी भी था। खूब स्वस्थ काया, चमकता गोरा रंग और शक्ति से लबालब। उसके सामने कोई काम, जिसमें शारीरिक ताकत लगानी हो, रुक नहीं सकता। उसने नाटक में एक भाड़े के हत्यारे जग्गा का रोल किया है, जो बाद में एक बड़ी डकैती डालने के कारण बड़ा अमीर आदमी बन जाता है। फिर यही जग्गा चुनाव में खड़ा होता है तो उसकी जय-जयकार होती है। इस रोल को उसने बखूबी जिया है, अपने बेफिक्र शाही अंदाज में!

नाटक खत्म हो चुका था। मैं चुप और अवाक्। कुछ रोमांचित सी। मन ही मन नाटक और उसके अभिनेताओं को सराह रही थी।
*

अब तक तीन बज चुके थे। गुलशन वालिया, रामजी बाली और कैदी कलाकारों के आग्रह के कारण हमने भी वहीं खाना खाया। ठाकुर साहब ने बड़े आग्रह से खाना खिलाया। वे यहाँ पिछले सात साल से हैं। हेराफेरी के आरोप में, पर अपने खास अंदाज और वय के कारण सभी उन्हें ‘ठाकुर साहब’ कहकर ही बुलाते हैं। पूरा नाम—देवेंद्र ठाकुर। यहाँ आने के बाद ही शायद उनमें यह बदलाव आया हो कि वे बहुत विनम्र हैं। 

झक्क सफेद कुरता-पायजामा और ऊपर काली जैकेट। कहीं से भी तो वे कैदी नहीं लगते। पूरी ठसक है उनकी चाल-ढाल में। और खाना इतने सलीके से परोस रहे थे, मानो हम उनके ही घर खाने के लिए आमंत्रित हों। अपने हाथ से बनाया गोभी, गाजर, मिर्च, नीबू का अचार उन्होंने बड़े आग्रह से थाली में रखा। और कहा, “आंटी जी, अगर आपको अच्छा लगे तो मैं दो किलो नीबू का अचार आपके लिए भी डाल दूँ।” 

मैं हैरान! जेल में इतने स्वाद और फुरसत से खाना कहाँ हो पाता है! पूछा, “तुम डालते कहाँ हो? क्या इसकी इजाजत मिल जाती है?”

इस पर उन्होंने एक ठाटदार मुसकराहट के साथ बताया, “हाँ, सब्जियाँ तो यहीं की हैं। मसाले खुद अपने पैसे से डाल लेते हैं, तो कुछ साथी अपने भोजन में अचार का स्वाद पा लेते हैं।”

खाने में मूँग की साबुत दाल थी, उबली हुई लेकिन स्वादिष्ट। और खूब रसे वाली आलू की सब्जी, साथ से सूखे फुलके। खाने में कुछ भी ऐसा नहीं लगा कि उसे खाते हुए अच्छा न लगे या खाने का मन ही न हो। ठीक-ठाक खाना था। जेल के बाहर की दुनिया में करोड़ों लोग ऐसे हैं, जिन्हें यह भी नसीब नहीं होता। उस हिसाब से तो यह काफी बेहतर था। सुबह ही इन लोगों को चाय और दो-दो ब्रेड का नाश्ता मिलता है। शाम को पाँच बजे के करीब भुने हुए चने दिए जाते हैं, उससे पहले चाय भी। और फिर सात बजे के लगभग रात्रि-भोजन।

नाटक में नूरी नाम का एक और पात्र था, जग्गे का सहयोगी। उसे पंजाब का एक प्यारा-सा लड़का अभिनीत कर रहा है। मैंने उससे पूछा, “तुम यहाँ कब से हो?”

“दो साल से!” उसने बताया।

“अच्छा, लगता तो ऐसा है, जैसे कल ही आए हो।” मैंने हँसकर कहा।

लंबे बाल लड़कियों जैसे। चेहरे पर हमेशा खेलती मुसकराहट। छोटा-सा रोल, पर उसने खूब निभाया। बिल्कुल ऐसा लगा, जैसे किसी कॉलेज का विद्यार्थी हो। पूछने पर उसने बताया कि यहीं वह इग्नू के सेंटर में (गो कि यह जेल में है) पढ़ाई कर रहा है और उसने कमर्शियल आर्ट में डिप्लोमा लिया हुआ है। उसकी पेंटिंग्स की प्रदर्शनी भी जेल में लगी है, जिसे समयाभाव के कारण हम देख नहीं पाए। हमें बताया गया कि बहुत-से कैदियों ने यहाँ से अपनी अधूरी छूटी हुई पढ़ाई पूरी की है। और नाटक में भाग ले रहे ‘सक्सेना’ नाम के पात्र ने तो यहीं रहकर अपनी पी-एच.डी. का शोध-कार्य पूरा किया है। सुनकर सुखद आश्चर्य हुआ। लगा कि यह जेल नहीं, वाकई में एक ‘सुधारघर’ है।
समय तो कम था, क्योंकि पाँच बजे तक हमें यहाँ से निकलना भी था। पर जेल को थोड़ा और घूमकर देखने का मन था। इस काम के लिए रामजी बाली ने जोश से लबालब ठाकुर साहब को पहले ही तैयार कर लिया था कि वे हमें जेल में घुमाएँगे। उसने हँसकर बताया कि शुरू-शुरू में उसे भी ठाकुर साहब ने ही जेल दिखाई थी!

तो साढ़े तीन बजते-बजते हम खाने से निबटकर उस हॉल से बाहर निकले और ठाकुर साहब ‘जेल गाइड’ के रूप में हमारे साथ हो लिए।
*

चलते-चलते इस परिसर से बाहर निकले तो देखा ‘जग्गा’ जी (प्रसन्न चेहरे वाला पाकिस्तानी कैदी) अपने कपड़े धो रहे हैं। पास से गुजरे तो ‘उन्होंने’ सलाम किया। मुझसे रहा नहीं गया। मैंने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा, मनु जी ने भी। मन में कुछ हुआ कि यह हमसे अलग कैसे हो सकता है? नहीं, यह तो हमारा ही बिछुड़ा हुआ भाई है, बेटा है। हम दोनों ने उसे दुआएँ दीं कि वह जल्दी अपने घर पहुँच सके। 

मैंने महसूस किया कि इस स्पर्श से उसका चेहरा आरक्त हो उठा है और वह कृतज्ञता से भार से दब-सा गया है। इतने में ‘मँगलू’ और ‘रिक्शावाला’ (नाटक के पात्र) भी टकराए। उनके भी कंधे पर हमने प्यार से हाथ रखा, तो अनायास एक पनीला-सा भाव उनकी आँखों में उतर आया। और हमने पाया कि हम ही मन प्रार्थना कर रहे हैं, “हे ईश्वर, इन्हें जल्दी से जल्दी इनके परिवारों से मिला दे। ये यहाँ से जल्दी मुक्त हों।”

ठाकुर साहब हमारे साथ ही साथ चल रहे थे। रास्ते की हर चीज के बारे में बताते हुए। पर इन क्षणों में वे भी भावुक हो जाते हैं, और चुपके से आँखें पोंछ लेते हैं।

चलते-चलते मैंने ठाकुर साहब से पूछ लिया, “भाई, तुम यहाँ कब से हो?”

“सात साल से।”

“क्या किया था?”

एक क्षण के लिए ठाकुर असहज होते हैं, फिर एकदम सीधा जवाब देते हैं, “आरोप तो मारपीट और जबरन पैसे छीनने का है, पर...!” और फिर जब वे असलियत बताते हैं तो दृश्य एकदम बदलने-सा लगता है। एक सीधा-सा आदमी अपने दिए हुए पैसे वसूलने के लिए ‘ठकुराई’ पर उतर आता है और फिर...!”

“घर में कौन-कौन हैं? बच्चे...!”

“तीन बच्चे हैं, छोटे-छोटे। पत्नी और बच्चे ननसाल में हैं।” बताते हुए उन्होंने हवा में हाथ हिलाया और आँखों में उदासी-सी घुमड़ आई, “क्या पढ़ेंगे? कुछ नहीं।...उनकी तो जिंदगी बर्बाद हो रही है।”

इसी बीच सामने बड़ा-सा रसोईघर दिखने लगा था। ठाकुर साहब को जैसे ‘पलायन’ का रास्ता मिल गया। वह अधिक देर तक उस स्थिति में नहीं रहना चाहते थे। शायद इसलिए कि वह उनकी दुखती रग है। 
*

सामने खूब बड़ा सा रसोईघर था। एक विशाल कक्ष, हॉलनुमा। उसके साथ दो-तीन कमरे थे, जिनसे प्याज और आटे की बोरियाँ दिखाई पड़ रही थीं। शायद चीनी, दाल, चावल आदि की भी बोरियाँ थीं। ये कमरे मानो भंडारघर थे। रसोई के सामने ही एक बड़ा सा मंच जैसा बना हुआ था। पक्का सीमेंट का फर्श। उस पर आठ-दस कैदी बैठे साग काट रहे थे। साग-यानी सरसों, मेथी, पालक, बथुआ आदि और वे बड़ी मुस्तैदी से अपने काम में जुटे हुए थे। उन्होंने एक नजर हमें देखा, फिर अपने काम में लग गए। एक तरफ बड़ा-सा भगौना रखा था।
“इसमें क्या बनता है भाई...?” 

पूछने पर पता चला कि एक बार में 25-30 किलो चावल उबलते हैं। और वे एक नहीं, दो बार बनते हैं, तब पूरे होते हैं। यानी साठ किलो के करीब रोज चावल बनते हैं, एक समय के भोजन में।

उसके पास ही एक भाड़ नजर आया, तो आश्चर्य हुआ। उस पर बड़ी-सी कड़ाही रखी थी। पूछने पर ठाकुर साहब ने बताया कि “इसमें रोज शाम को बँटने वाले चने भूने जाते हैं, जो पाँच बजे के आसपास बाँटे जाते हैं।” 

ताजे भुने चने...! एक बड़ी-सी थाली में हरी मिर्च और धनिया कटे रखे थे और एक तरफ कटे प्याज। शायद सब्जी और दाल में डालने के लिए होंगे। 

फिर रसोई के भीतर जाकर देखा। वहाँ कई आयताकार बड़ी-बड़ी मेजें थीं, जिनके पास खड़े होकर दस-बारह कैदी फटाफट रोटियाँ बेल रहे थे। उनके पास ही पाँच-छह कैदी दो बड़े आयताकार तवों पर डाल रहे थे। नीचे गैस जली हुई थी। और कुछ कैदी उन रोटियों को अगले दो तवों पर उलटकर फटाफट सेंक रहे थे। उनके पास आटा गूँदने की मशीन रखी थी, जिसमें एक ही बार में बीस-पच्चीस किलो आटा गूँदा जाता है। पास में ही एक बहुत बड़े भगौने में चाय बन रही थी, बालटियों से निकालकर वह चाय डोलचियों में डाली जा रही थी—कैदियों में बाँटने के लिए। हमें भी वही चाय पिलाई गई। चाय ठीक-ठाक थी, स्वाद बुरा न था। पास में ही एक बड़े से देग में दाल पक रही थी रात के खाने के लिए और एक बड़े देग में सब्जी।
यह सारा काम कैदी ही कर रहे थे।

“क्या हमेशा ये ही लोग खाना बनाते हैं?” पूछने पर ठाकुर साहब ने बताया, “नहीं, ड्यूटी बदलती रहती है, थोड़े-थोड़े दिन बाद।”

“तो क्या सभी कैदी खाना बनाने जानते हैं?”

“नहीं जी, यहाँ रहते-रहते सीख जाते हैं। जो नहीं सीख पाते, उन्हें सीखना पड़ता है, ड्यूटी तो सबकी लगती है। धीरे-धीरे सब सीख जाते हैं।”

सब काम इतनी सफाई से और फुर्ती से हो रहा था कि उसे देखकर सबसे पहले यही खयाल आया, मानो कोई ब्याह का खाना बन रहा हो। कैदियों में से एक शायद अकरम भाई (28-30 वर्ष) यहाँ सुपरविजन कर रहे थे, ताकि कहीं कोई त्रुटि न रह जाए, सब काम सफाई से हो। उनके चेहरे पर वैसा ही भाव हमें नजर आया, जैसा बारात की अगवानी के लिए जिम्मेदारी सौंपे गए व्यक्तियों के चेहरे पर होता है। एकदम मुस्तैद कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए। अपना बेहतरीन रोल अदा करना है, ऐसा भाव। मैंने कहा भी, “भाई, यहाँ तो ऐसे लग रहा है, जैसे कोई बारात का खाना हो।”

उनके चेहरे पर बड़ी भली सी मुसकान आ गई और अपनी प्रशंसा सुनकर संकोच से चेहरा आरक्त हो आया। आँखें नीची हो गईं। 

ठीक इसी पल मैं सोच रही थी, यह शख्स अपने घर में कितना जिम्मेदार पति होगा, कितना प्यारा ‘पापा’ और माँ-बाप का मजबूत सहारा। पर जाने कैसा दुर्भाग्य रहा होगा, जो उसे यहाँ ले आया। मन से दुआ निकली और मैंने अकरम भाई के कंधे पर हाथ रखते हुए मैंने कहा, “बहुत जिम्मेदारी से काम कर रहे हो!”

लगा, उनके भीतर कुछ पिघल रहा है और हमारे भीतर भी!...

यहीं एक पुलिस का सिपाही भी था, जो पिछले अठारह साल से यहाँ है। उससे मनु जी ने पूछा, “क्या कभी इन कैदियों की आपस में लड़ाई भी हो जाती है, किसी काम को लेकर?”

“छोटी-मोटी बातों को छोड़ दें, तो बड़ा हादसा कभी नहीं हुआ। सब आराम से रहते हैं।”

उसके चेहरे पर एक ऐसा तरल मानवीय भाव था, जिसमें सबके लिए क्षमा थी। उसके दिल में कहीं न कहीं यह भाव था कि ये सभी एक बड़े सुख से वंचित हैं। परिवार में रहने के सुख से। इसलिए ये सहानुभूति के पात्र हैं। शायद इसी वजह से इनके प्रति उसके मन में इतनी करुणा हो।
*

ठाकुर साहब सब जगह यह कहकर हमारा परिचय दे रहे थे कि ये लेखक हैं और अखबार से हैं। तो जो प्रश्नाकुल निगाहें थीं, वे फौरन सहज हो जातीं और वे खुद ही बहुत-कुछ बताने को तैयार हो जाते। कुछ के मन में यह भाव भी लक्षित हुआ कि चाहे कहीं से भी आए हों, हमारी स्थिति में क्या बदलाव आएगा? हमें ये छुड़ा तो देंगे नहीं। हालचाल पूछने आए हैं, चले जाएँगे। पर ज्यादातर का रवैया सहयोगी, बल्कि दोस्ताना रहा। और कुछ को हम दोनों को साथ देखकर शायद अपने परिवार की बेतरह याद आई। यह भाव कई जोड़ी आँखों से झलका और मन में गुड़ुप सा हो गया। उनकी यह छवि हमारे मन में उतर गई।

अब ठाकुर साहब हमें एक वार्ड में ले जा रहे थे, जहाँ कैदी वास्तव में अपनी बैरकों में रहते हैं। शायद यह वार्ड न. 11 था या कुछ और, ठीक-ठीक याद नहीं।

यह एक बड़ा-सा अहाता था जिसके तीन तरफ छोटी-छोटी कोठरियाँ थीं और उनके आगे लंबे बरामदे। कोठरियों में चार-चार, पाँच-पाँच कैदी थे। उसी में एक कोने में स्टील का कमोड था और एक टोंटी थी। साथ में थोड़ी सी जगह एक जने के बैठने के लिए—नहाने या कपड़े धोने के लिए। पाँच जनों के हिसाब से कोठरी तंग थी और इसमें हाथ-पैर थोड़े सिकोड़कर ही लेटा जा सकता था। ऐसी तंग-सी जगह में भी एक कोठरी में देखा कि चार कैदी साफ-सुथरे कपड़े पहने खूब तरोताजा से थे और तफरीह के मूड में गप्पें लड़ा रहे थे। हमें आया देख, पहले तो वे अचकचाए, फिर ठाकुर द्वारा हमारा परिचय दिए जाने पर खड़े हो गए। लगभग ‘स्वागत’ की मुद्रा में। मैंने कहा, “यह जगह छह फुट तो नहीं लगती। पैर कुछ सिकोड़ने पड़ते होंगे।”

“हाँ, जी किसी तरह तो गुजारा करना ही है।”

“पर खाना तो यहाँ ठीक-ठाक मिलता है न?”

“नहीं जी, दाल ऐसी कि उसमें पता ही न चले किस चीज की है? न नमक न मिर्च, और रोटियाँ जली हुई या कच्ची।”
यह युवक (भाषा से लगा) हरियाणा की तरफ का था और कुछ विद्रोही से स्वभाव का था। ऐसा जिसे कुछ भी पसंद नहीं आ सकता था। चेहरे पर शरारत का भाव साफ झलक रहा था कि वह जान-बूझकर यहाँ की बुराई कर रहा है।
इतने में ही उसी वार्ड में रहने वाले चौधरी साहब आ गए। वे ठाकुर साहब के अच्छे दोस्त हैं और पिछले पाँच साल से यहाँ हैं। चौधरी साहब कोई पचपन-साठ की उम्र के रहे होंगे। लेकिन साफ-सफेद कुरते-पायजामे में स्वस्थ काया और दमकता रंग। शायद किसी उच्च कुलीन परिवार के रहे हों। वे गाँव के बहुत भले और समझदार आदमी लग रहे थे। आते हुए उन्होंने उस विद्रोही और शरारती से लड़के की बातें सुन ली थीं। इसलिए हमारे बिल्कल पास आकर उससे बोले, “अरे, क्यूँ झूठ बोल रिया है? आज तो साबत मूँग की दाल बणी थी अर आलू का झोल था। इब घर जिसी फुल्ली रोटी तो तनैं कयूकर मिलैगी अठै। शुकर मना, आछी रोट्टी मिल रई है, दोनूँ टैम ताजी।”
मुझे लगा, चौधरी जी ठीक कह रहे हैं, क्योंकि अभी घंटा भर पहले तो हमने यही खाना खाया था और उसमें हमें कोई खराबी नहीं लगी थी। चौधरी जी थोड़े दिन पहले ही दो महीने के लिए पैरोल पर छूटकर अपने गाँव रहकर आए हैं। मनु जी ने पूछा, “...आप यहाँ कैसे? क्या हुआ था?”

पूछने पर चौधरी जी ने बताया कि जमीन का कोई झगड़ा था। हत्या का झूठा केस बना दिया गया। इसी चक्कर में पिछले पाँच साल से वे यहाँ हैं। मुकदमा चल रहा है और अब तो वह गवाह भी मुकर गया है, जिसे विपक्ष वालों ने खड़ा किया था। उन्हें उम्मीद है कि जल्दी ही उनकी रिहाई हो जाएगी। एक आश्वस्ति का-सा भाव उनके चेहरे पर नजर आता है।

अब आगे की तिहाड़-परिक्रमा में चौधरी जी भी हमारे साथ हो लिए, क्योंकि वे ठाकुर साहब के अच्छे दोस्त हैं। हम धीरे-धीरे इन बैरकों को देखते हुए आगे बढ़ रहे थे। बीच-बीच में कुछ बड़े कमरे भी थे जिनमें काफी (शायद 20-25) कैदी इकट्ठे रह रहे थे। जमीन पर ही बिस्तर बिछे थे। एक कोने में टी.वी. भी रखा था और कुछ कैदी उसे बड़ी तल्लीनता से देख रहे थे। इस वार्ड के बीच में एक खुला मैदान है। उसमें कुछ कैदी वॉलीबॉल खेल रहे थे और लग रहा था, जैसे किसी स्कूल-कॉलेज का मैच हो! कुछ इधर-उधर खड़े गपिया रहे थे।

वार्ड में गेट के पास ही एक बड़ा-सा पक्का चबूतरा बना था, पीपल के पेड़ के नीचे। यहाँ सर्दियों में एक साथ सौ-पचास कैदी धूप सेक सकते हैं। या कभी कोई खास बात कैदियों को बतानी हो तो इस मंच का उपयोग किया जाता है। सभी कैदियों की पानी पीने की बोतलें एक तरफ बनी टोंटियों के आगे लाइन में लगी थीं। यहाँ पीने का पानी निर्धारित समय पर ही आता है। कैदी अपना-अपना पानी भर लेते हैं। खाने के बरतन भी हर कैदी के अपने ही होते हैं। खाने का वक्त होने पर कुछ कैदियों की ड्यूटी लग जाती है, जो बालटियों में दाल-सब्जी रसोईघर से लाते हैं और टोकरों में रोटियाँ। फिर वार्ड में आकर बाँटते हैं।

कोठरियाँ तो कुछ तंग लगीं, पर बीच के खुले मैदान को देखकर लगा कि यहाँ खूब हवा, धूप और खुलापन है। जेल की बंद-बंद सी दुनिया की एक तसवीर जेहन में थी। पर लगा कि कम से कम यहाँ तो वैसा नहीं है।
इस वार्ड को देखकर बाहर निकले तो ठाकुर साहब ने याद दिलाया कि “साढ़े चार बज चुके हैं। अब आपको एक वार्ड और दिखा देता हूँ जल्दी से। यह ड्रग एडिक्ट्स का है।” 

दरअसल हमने ठाकुर साहब को पहले ही सावधान कर दिया था कि हम पाँच बजे तक यहाँ से चल देंगे। उसी हिसाब से वह इतने कम समय में हमें अधिक से अधिक वार्ड दिखाना चाहते थे। अब चौधरी जी भी हमारे साथ ही साथ चल रहे थे। इतने में ही वह वार्ड भी आ गया यानी ड्रग एडिक्ट्स का। वहाँ बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—‘आसरा’। 

वाह! कितना अच्छा नाम दिया है इस वार्ड का। कमाल की सूझ है नाम देने वाले की भी। जिन नशेडियों से पूरी दुनिया नफरत करती है, अपने पास नहीं बैठने देती, धिक्-धिक् करती है—ऐसे ही लोगों के लिए यह ‘आसरा’ बनाया गया है। यह बाकी वार्डों से थोड़ा अलग हटकर बनाया गया है। शायद इस सावधानी के चलते कि कहीं दूसरे वार्डों में भी यह लत न फैल जाए। या फिर दूसरे कैदी भी शायद इनसे बचना चाहते हों या नफरत करते हो। खैर, जो भी कारण रहा हो!...यह वार्ड हमें कुछ अलग सा लगा।

इस वार्ड के गेट के अंदर घुसते ही दाईं तरफ खूब बड़े से क्षेत्र को समतल किया गया था और कुछ कैदी उसमें घास लगा रहे थे। देखकर बड़ा अच्छा लगा। वातावरण की स्वच्छता के प्रति कितनी जागरूकता है। महीने, दो महीने में इस मैदान पर बढ़िया हरा मुलायम (घास का) गलीचा बिछ जाएगा, तब कितना स्वच्छ और सुंदर लगेगा। हर किसी को दो क्षण फुरसत से बैठने के लिए आमंत्रित करता सा।

थोड़ा और आगे जाने पर बाईं तरफ एक काला बोर्ड टँगा था, जिस पर कैदियों की संख्या लिखी थी—248। यानी यहाँ 248 ‘नशे के रोगी’ थे। इतने में एक प्रमुख ड्यूटी सिपाही हमें देखकर चौंका। ठाकुर साहब ने पहले की तरह हमारा परिचय दिया, तो वह भी सहज हो आया।

दाईं तरफ से सफेद कुरते-पायजामा पहने, लंबी-चौड़ी कद-काठी के दुबे जी भी सामने आ गए। अब तक हम इस परिसर के मुख्य मैदान तक आ चुके थे। वहाँ एक बड़ी सी बेंच और दो-तीन कुर्सियाँ थीं, जिनमें एक पर वह ड्यूटी सिपाही बैठा था। हमने देखा कि उस विस्तृत और बिल्कुल साफ, कच्चे मैदान में दो-तीन गोल दायरों में कैदी बैठे हैं, खूब फुरसत से। ठीक वैसे, जैसे स्कूल के दिनों में हम ‘कोकला छुपाती जिम्मे रात आई जे’ वाला खेल खेलते समय गोल दायरा बनाकर बैठते थे। 

इतने में ही हमने देखा कि दो या तीन गोल दायरों में बैठे हुए कैदी धीरे-धीरे उठकर उत्सुकतावश हमारी ओर बढ़ रहे हैं। हमारी ओर यानी, जहाँ हम बीच में बैठे थे—दुबे जी, सिपाही, ठाकुर साहब, चौधरी जी और दो-तीन अन्यों के साथ। दुबे जी ने सोचा, शायद ऐसे तो भीड़ हो जाएगी। तब उन्हें हलके से डाँटने के स्वर में कहा, “चलो-चलो, उधर जाकर बैठो।”

“क्या यहाँ रहकर इनकी नशे की आदत बिल्कुल छूट जाती है?” मनु जी ने पूछा।

“हाँ जी, कोशिश तो पूरी की जाती है। इलाज भी होता है इनका यहाँ, और योग आदि द्वारा भी इन्हें ठीक किया जाता है। ध्यान की कक्षाएँ भी लगती हैं, विपश्यना आदि द्वारा। कुछ कैदी तो उसमें बहुत रुचि लेते हैं तो उन्हें खूब गहराई तक सिखाया जाता है। इनमें से कुछ तो यहाँ से बिल्कुल ठीक होकर जाते हैं।” सुनकर हम चकित।
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इसी बीच दुबे जी से, जो कि एक बहुत जिम्मेदार, भले आदमी लग रहे थे, मनु जी ने पूछा, “आप यहाँ कैसे आए?”
दुबे जी ने किंचित गर्व से बताया, “पहले मैं भी पुलिस में अच्छी पोस्ट पर था।” फिर एकाएक दुख की एक गहरी छाया उनके चेहरे पर उतर आई, “अब यहाँ हूँ...!” एक करुण मुसकान उनके चेहरे पर छिटक गई, जिसका अर्थ था कि सब समय का फेर है। हमने इस पर अविश्वास प्रकट किया तो दोनों हाथों को आसमान की तरफ उठाते हुए बोले, “सब किस्मत का खेल है। जैसी उसकी मर्जी...!”

और फिर उनकी कथा। सच्ची कहूँ तो अकथ कथा, जिसने हमारी आँखें सजल कर दीं...!

दुबे जी का दर्द हमारे भीतर बह रहा था। उनके साथ-साथ हमें भी पिघलाता सा।...पर ठाकुर साहब हमें बार-बार समय का ध्यान दिला रहे थे। उनका मन अभी और भी वार्ड दिखाने का था, पर समयाभाव के कारण हमें लग रहा था कि साँझ तेजी से उतर रही है, घर में दोनों बेटियाँ ऋचा और अपर्णा इंतजार कर रही होंगी। इसलिए अभी हमें निकल लेना चाहिए। यही सोचकर हमने ठाकुर साहब और चौधरी जी से विदा ली और फिर बाहर की ओर चल दिए।

गेट के पास ही रामजी बाली और गुलशन वालिया मिल गए तो हमें देखकर उनके चेहरे पर मुसकान आ गई। बोले, “अरे, आप अभी तक यहीं हैं, आप तो जल्दी जाने की कह रहे थे। चलिए, अच्छा हुआ आप मिल गए। हम गाड़ी में आपको स्टेशन तक छोड़ देते हैं—अभी छह पच्चीस वाली ट्रेन आप पकड़ सकते हैं। आठ बजे तक घर पहुँच जाएँगे।” उनके साथ ही हम गेट से बाहर निकले और स्टेशन की ओर चल दिए।

मेरी जिंदगी का यह अब तक का सबसे अद्भुत दिन था। वे कैदियों के चेहरे क्या मैं जीवन भर भूल पाऊँगी? नहीं, कभी नहीं। इसलिए कि उनमें से लगभग हर चेहरा बता रहा था—वे अपराधी नहीं हैं। अपराधी तो वे हालात हैं जो उन्हें घेर-घारकर यहाँ ले आते हैं। और हाँ, यह तिहाड़ जेल अगर आज हमें, ‘सुधारगृह’ लगती है तो इसके लिए किरण बेदी समेत अन्य अधिकारियों को भी मैं मन ही मन धन्यवाद देने लगती हूँ।
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डॉ. सुनीता, 545, सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008, 
चलभाष: 09910862380

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