कहानी: नीम का दरख़्त और वह बूढ़ा

ऋतु त्यागी
मुझे हुक्म मिला है कि मैं नीम अँधेरे में नीम के दरख़्त के नीचे की सारी सूखी पत्तियाँ बटोर लाऊँ और यह सारा काम मुझे सूरज की रोशनी होने से पहले ही कर लेना है। मैं पूरी तवज्जोह से काम करने की कोशिश में जुटी रहती हूँ। अब ठंड बढ़ गई है। अक्टूबर का महीना… पतझड़… ऑटम… फॉल... रोमन कैलेंडर का आठवां महीना… जो बाद में दसवें महीने में तब्दील हो गया। दरख़्त के पत्ते स्वत: ही सूखकर ऐसे गिरने लगते हैं जैसे धूप में जली दरख़्त की त्वचा की पपड़ियाँ उतर रहीं हों। अब मौसम के तेवर भी बदल रहें है। धूप का मिज़ाज भी कुछ कम तीखा होकर आकाश के के माथे पर एक गहरा चुंबन दे रहा था। अक्टूबर हमेशा मुझे एक विशाल छाती की तरह लगता है जो टूटते पत्तों की वेदना को सिर टिकाने की एक मुलायम जगह दे देता है।

अचानक हवा के छोटे-छोटे ठंडे झोंके मेरी गर्दन को सहलाकर पत्तियाँ उड़ाने लगते हैं और मेरा ध्यान फिर सूखी पत्तियों पर जम जाता है। हवा से मेरे सारे बाल मेरी आँखों में औचक घुसपैठ कर देते हैं। मैं दोनों हाथों से इन्हें रोकने की कोशिश करती हूँ पर मेरे हाथ फिर से अपने काम को अंजाम देने की कोशिश में लग जाते हैं। मुझे पत्तियाँ बटोरकर उस बूढ़े के पास जमा करानी हैं जो सामने के एक बंगले में बिल्कुल अकेला रहता है। मैं पिछले कुछ दिनों से ही उसके यहाँ काम कर रही हूँ। पिछले दिनों मुझे काम की बहुत ज़रूरत थी। मेरा पहला काम छूट चुका था और घर में मेरे अलावा कमाने वाला और कोई नहीं था। बीमार पिता और दो छोटी बहनों की सारी ज़िम्मेदारी बचपन से ही मेरे हिस्से आ गई थी इसलिए मैं शहर के बाहर इन बंगलों की तरफ काम ढूंढ़ने आ गई थी।
उस दिन बूढ़ा अपने घर के लॉन में खड़ा एक पेड़ की सूखी टहनी को निर्विकार भाव से देख रहा था पहले तो मैं उसकी दृष्टि की उम्मीद करती रही पर बूढ़े की टकटकी का टाँका टूटा ही नहीं। मैं गेट खोल कर अंदर जाने की कोशिश करने लगी कि तभी बूढ़े का नौकर भागा-भागा गेट की ओर बढ़ा, "ऐ… कहाँ घुस रही हो?” 
मैं थोड़ा सकपका गई तभी बूढ़े का ध्यान मेरी ओर गया। मैं नौकर को छोड़ अपनी ओर निर्विकार देखते बूढ़े की ओर बढ़ गई, ““साहब, मैं घर के सारे काम जानती हूँ। मुझे यहाँ नौकरी मिल सकती है?”

 मैंने अपना पक्ष उसके सामने रखा पर बूढ़ा मुझे उसी निर्विकार भाव से देखता रहा फिर बोला, “पर यहाँ अब किसी की ज़रूरत नहीं है।”

 “जी…" मैंने उदासी की एक ठंडी श्वास छोड़ी और मेन गेट की ओर बढ़ गई पता नहीं मुझे लगा जैसे बूढ़े की निर्विकार दृष्टि मेरी पीठ पर चिपकी चली आ रही है। मैं गेट से बाहर निकली ही थी कि बूढ़े की जर्जर आवाज़ आई, “सुनो एक काम है! क्या तुम रोज़ाना नीम के पेड़ से सूखी पत्तियाँ बटोर कर ला सकती हो? ध्यान रहे पत्तियाँ सूखी हों।”

मैंने मुड़कर बूढ़े की ओर देखा। फिर मेरे मुँह से अचानक निकला, “हाँ।" 

"ठीक है" कहकर बूढ़ा आश्वस्त होकर मेरी ओर देखने लगा

“पर मुझे पैसे कितने मिलेंगे?" 

“जितने बाकी नौकरों को मिलते हैं,” बूढ़े की दिलचस्पी शायद मोलभाव में नहीं थी इसलिए उसने मेरी और देखे बिना भीतर की ओर कदम बढ़ा दिए। काम कुछ अजीब था फिर मुझे ख्याल आया सूखी पत्तियाँ हमेशा तो नहीं मिलेंगी, “तो क्या यह बूढ़ा मेरे पैसे काट लेगा?” पर मैंने ऐसा कुछ नहीं पूछा।

बूढ़ा अब तक जा चुका था चूँकि मुझे काम की इस समय सख़्त ज़रूरत थी इसलिए मैं अपनी ही ख़ामोशी का स्पंदन सुनते हुए बाहर निकल आई। बाहर निकलते हुए मैंने नौकर से पूछना चाहा पर वह अपने साहब के पीछे-पीछे चला गया फिर पता नहीं क्या हुआ? भागा-भागा वह मेरी ओर आया और मेरी शंका की नुकीली नोक को अपनी और करके बोला, “देखो! पतझड़ के इस मौसम में साहब पत्तियाँ मँगाते हैं। पहले माली यह काम कर दिया करता था लेकिन अब वह छुट्टी पर है तो तुम्हें रोज़ाना सुबह सूखी पत्तियाँ बटोर कर लानी है। और इस पूरे लॉन की सफाई भी करनी है, ठीक है? कुछ और पूछना है तो पूछो।”

 मैंने कुछ नहीं कहा और "ठीक है" कहकर वहाँ से उस दिन चली आई। लौटते हुए मैं सोच रही थी कि “बूढ़ा सनकी तो नहीं नीम की सूखी पत्तियों का क्या करेगा यह?”
 
अगले दिन नीम अँधेरे में ही मैं पत्तियाँ बटोरने नीम के पेड़ के पास जा पहुँची। हवा में कँपकँपाती हरी पत्तियों के दाँतेदार किनारे किसी आरी की तरह हवा में जमी ठंडक को काटने का प्रयास कर रहे थे। एकबारगी लगा जैसे बूढ़ा इन पत्तियों की ओट से मुझे देख रहा था।

“क्या बूढ़ा पत्तियों का कीटनाशक की तरह उपयोग करेगा?”

पत्तियों पर सुबह कि ओस का पानी था इसलिए मुझे वहाँ भीगापन महसूस हुआ। मैंने अपने दुपट्टे को कसकर चारों तरफ से लपेट लिया और एक बड़े से थैले में पत्तियाँ बटोरने शुरू कर दिया। पत्तियाँ हवा में उड़कर चर्र-चर्र की आवाज कर रही थीं जैसे पुराने संदूक में दबी किसी स्त्री की सिसकी कराह रही हो। बूढ़े के नौकर ने मुझे बताया था कि जितनी पत्तियाँ बटोर सको बटोर, लेना। बूढ़े को खुश करने के लिए पत्तियों की संख्या का अधिक होना अनिवार्य था। नौकर को पत्तियाँ सौंपकर मैं लॉन की सफाई में लग गई। मैं उसे पत्तियाँ ले जाते देख रही थी मुझे उत्सुकता थी कि बूढ़ा इन पत्तियों का क्या करेगा। और मैं ये देखना चाहती थी इसलिए मेरी गर्दन घूमकर बूढ़े के दरवाज़े के खुलने का इंतजार करने लगी पर बूढ़े के नौकर ने चौखट पर चढ़ते ही के कमरे के दरवाजे को धड़ाम से बंद कर मेरी उत्सुकता को तीव्र स्वर के साथ मुझे लौटा दिया। मुझे लगा जैसे दरवाजे के उस पार सुलगता कोयले का कोई टुकड़ा है जो निरंतर राख की तरह बढ़ता जा रहा है, “क्या वह कोयला बूढ़ा है?” 

पेड़ों से घिरे सूखे पत्तें मुझे बूढ़े की हथेलियों जैसे लगते हैं जो देह से निर्लिप्त होकर अपने पर्वतों की ऊँचाई से लॉन में छलांग लगा रहें हों। करीब पच्चीस दिन होने को आए थे मेरा काम बदस्तूर चल रहा था।

वह बूढ़ा रोज़ाना इन सूखी पत्तियों को क्या करता होगा? इतने दिनों के बाद भी सूखी पत्तियों के रहस्य पर पड़ा आवरण मुझे मुँह चिढ़ा रहा था। आवरण पर पड़ी सिलवटों और बूढ़े के गालों पर पतंग के मांझे की तरह उलझी झुर्रियों में मैं ना जाने क्यों एक साम्य देख रही थी। मुझे यही काम मिला है मैं अपने काम में किसी तरह की भी कोताही बरतना नहीं चाहती। आज मैं फिर अपना वही काम करने नीम अंधेरे में निकल पड़ी हूँ। मैं सूखी पत्तियाँ ढूँढ़ रही हूँ पर वहाँ दूर-दूर तक कोई पत्ती नहीं है। दरख़्त के पाँव के नीचे भी कुछ नहीं है। उसके तने की मोटी, फटी व खुरदुरी खाल को देखकर मुझे घबराहट होने लगी है। खाली हाथ लौटने पर बूढ़े की प्रतिक्रिया कैसी होगी? मेरे दिमाग में एक गुबार सा उठने लगा है। मैं घबराकर दरख़्त के तने को दोनों बाँहों में भरकर झिंझोड़ने लगती हूँ। उसकी सबसे नीचे लटकती डाल से सूखी पत्तियाँ नोचने के प्रयास में लड़खड़ा जाती हूँ पर पत्तियाँ मेरी तर्जनी और अँगूठे की सीमाओं का अतिक्रमण कर जाती है। आज दरख़्त ने सूखी पत्तियाँ देने से पूरी तरह इनकार कर दिया है। मैं सर झुकाए बूढ़े के बंगले में दाख़िल होती हूँ। मुझे देखते ही बूढ़े का नौकर दौड़कर आता है। वह मायूस है उसकी आँखें आँसुओं से भरी हैं। वह मेरे पास आकर बुदबुदाता है, “वे नहीं रहे… वे नहीं रहे…। रात देर से सोये थे। मैंने सुबह उठाने की कोशिश की पर नहीं उठे… मैंने बहुत हिलाया पर वे नहीं उठे। बिल्कुल नहीं उठे।“

मैं अब जड़़ थी, “दरख्त की सूखी पत्तियाँ...” मेरे मुँह से न चाहते हुए भी कुछ लड़खड़ाते शब्द बाहर निकलने लगे। 

“सुनो!” मैंने भीतर जाते नौकर को अपने भय और दुख से गीले हो चुके स्वर से पुकारा। वह मुड़ा पर वहीं खड़ा रहा, “मुझे पता है तुम क्या जानना चाहती हो?”

मैं आश्चर्य और कातरता से उसे देख रही थी।

“… यही न, कि हमारे साहब सूखी पत्तियों का क्या करते थे?” वह थोड़ा तिरछा होकर मेरे हावभाव को पकड़ने की कोशिश कर रहा था। मैं अपने पैरों पर अभी भी जमी थी, न जाने क्यों? पर मेरी आँखों के कोने सिकुड़कर माथे की सिलवटों की गहराई को बढ़ाने में अपना योगदान दे रहे थे।

“करीब तीन साल पहले मेमसाब अपनी लंबी बीमारी के बाद दुनिया से चली गयीं…। साहब मेमसाब से बहुत प्यार करते थे जब वह बीमार हुई तब वह रात दिन उनके आसपास ही रहते कभी माथा सहलाते कभी पाँव के तलवे। मेम साहब को ब्रेन ट्यूमर था अपने आख़िरी दिनों में वह बिस्तर से नहीं उठ पाती थीं तो साहब भी वहीं बैठे रहते। दोनों के कोई बच्चा नहीं हुआ, दोनों शायद एक दूसरे को ही अपना बच्चा मानते थे क्योंकि अगर यह दोनों झगड़ते भी तो ठीक दो बच्चों की तरह और फिर कुछ ही देर में एक जैसे हो जाते। मैं उनको खिलखिलाते देखता जैसे कुछ हुआ ही न हो। उन दोनों को देखकर मुझे लगता कि शायद इनके बीच में यदि कोई बच्चा आता भी तो क्या ये उसकी उपस्थिति महसूस कर पाते? क्योंकि यह दोनों अपने आप में ही इतने डूबे थे कि कोई और वहाँ हो या न हो, उसकी उपस्थिति का इन दोनों पर ही कोई असर नहीं होता था। मेमसाब के जाने के बाद साहब बिल्कुल अकेले होकर टूट गए। उनको देखकर कईं बार लगता जैसे कोई बूढ़ा दरख़्त अपनी जड़ें छोड़ रहा हो।…जहाँ वह नीम का दरख़्त है ना वहीं मेमसाब की समाधि है।“

वह मुझे एक झटके में सब कुछ बताकर तेज़ी से बंगले के अंदर चला गया। उस समय मुझे उसकी पीठ दरख़्त की किसी सूखी पत्ती की तरह लगी जिसे कोई भी मसलकर बिखेर देगा। उसके जाने के बाद मैं किसी पत्थर की तरह न जाने कितनी देर जमी रही। बूढ़े की घायल इच्छा को किसी हारे हुए योद्धा की तरह हवा में डूबते हुए देख रही थी। मेरा कंठ अपनी समूची आद्रता को लॉन की घास पर ओस के रूप में छोड़कर सूखा हो चला था। पेट से उठने वाली हूक पेट में ही घुमड़कर मृत हो गई थी।

“क्या नीम का दरख़्त जानता था कि बूढ़ा मर चुका है?” कोई अदृश्य तार था जो दोनों के बीच बंधा हुआ था। मेरी चेतना इस तार पर कटी पतंग की तरह लटकी हुई थी कि अचानक हवा का एक कसा हुआ झोंका तमतमाते हुए मेरे गाल पर पड़ा जो मेरी चेतना को लौटाने के लिए काफी था।


7 comments :

  1. बहुत ही शानदार कहानी है।

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  2. कहानी बरबस अपनी ओर खींचती है. बहुत रोचक है.कथ्य और शिल्प में नयापन है.

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  3. रोचकता ने मुझे बांधे रखा।

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