चन्द्र गुरुङ्ग
1. बाबा का चेहरा 
 
उस चेहरे पर दो आँखें
सूरज और चाँद-सी चमकती हैं
आत्मविश्वास की एक पतंग
उड़ती रहती है
विपत्ति की आँधी से जूझते
खिलते हैं ऑर्किड और बुरांस 
 
उस चेहरे पर हर सुबह
नए दिन का बोझ उठाने
एक सूरज उगता है
जो शाम को दुःख की लकीरों को छिपाए
खुशियों की छोटी-छोटी पोटलियाँ उठाए
आते हैं उजियाला बनाते हुए घर-आँगन 
 
उस चेहरे पर संसार को
पढ़ने वाली आँखें छोटी हैं
आत्मसम्मान उठाए खड़ी नाक दबी-सी है
सुख-दुःख फिसलन खेलती गालें झुर्रीदार हैं
मुस्कुराहट लेफ्ट-टराइट करते होठों पर दरारें पड़ गई हैं
धूप से झुलसा है मंगोल पहचान
 
मुझे अच्छा लगता है
बहुत अच्छा लगता है
जब सब लोग सुनाते हैं -
“तेरा चेहरा, बिल्कुल तुम्हारे बाबा के जैसा है।”
***


2. स्वतंत्र खुशी
 
कभी-कभार
आकाश में उड़ते-उड़ते, थकान से पंख गलता है
आकाश में उड़ते-उड़ते, प्यास से गला सूखता है
आकाश में उड़ते-उड़ते, भूख सताती है
आकाश में उड़ते-उड़ते, बरसात भिगाती है
आकाश में उड़ते-उड़ते, धूप झुलसाती है
 
परंतु वह पक्षी एक स्वतंत्र
खुशी से भरी ज़िंदगी उड़ता है।
***


3. एक शाम
 
बागों के सौन्दर्य को लूटने
किसी आततायी के जैसे घुस आई आँधी को
कान से पकड़कर दिल में रखो
किसी उजाले भरे दिन 
बातें करेगी इस अँधेरे समय से 
 
आँखों के किनारे से गिरते आँसू को
आसानी से गिरने मत दो
आँसुओं से भरी उस जमीन पर उठी धूल
असंतुष्टि में एक - दो कदम चलकर
असहमति में हाथ उठाएगी
 
गालों पे फिसलती उन मुस्कुराहटों का
सुन्दर चित्र दिल के कैनवास में सजाओ दोस्त
समय के आसमान पर किसी रोज
मुस्कुराहट का यह पंछी इच्छाओं के पंख फैलाए
भरेगा स्वतन्त्र उड़ान 
 
जीवन की लय गाते-गाते
मृत घोषित गीतों में नया प्राण भरकर
ध्वस्त स्वप्न महलों को फिर से खड़ा करो
पेड़ों को सुस्ताने दो
जो थके हैं तूफान से जूझते
पहाड़ के ऊपर पहुँचे सूरज को मत रोको 
वो उदय होगा कल फिर नई सुबह 
 
यात्रा करके लौट रहे पैर
थकान मिटाने के लिए घर-आँगन में आए हैं
घोंसलों को आते पंछी फिर छुएँगे नये क्षितिज 
जीवन के थके समय में उजाले को
मन के लैंपपोस्ट में लटकाकर
बात करेंगे इस अन्धेरे से
 
इस शाम अपनी
छोटी-मोटी खुशियों का जोड़-घटाव करो 
हिसाब लगाओ सुख-दुःख का
चाहत की तरंगें उठाए घावों को दरकिनार करके
हिम्मत का एक नया पौधा उग आए 
उमंग की लहर चले
जीवन इसी तरह से जीना है।
***

 
4. गीत गाता है जीवन 
 
भूकंप में टूटे हुए घर की खिड़की पर
आकर बैठता है हरा पहाड़
उजाड़ बाग में उजियारा पोतकर जाती है धूप
जंगल में सुगन्ध फैलाए उड़ती है हवा
कहीं कुछ न हुआ जैसे ऐसे बहती हैं नदियाँ 
झूमते रहते हैं पेड़-पौधे 
 
क्षितिज के चमकीले आइने में
हिमनद से टूटा अपना चेहरा देखता है हिमालय
किसी बीमार बच्चे को खुश करने जैसा 
अन्धेरे में टिमटिमाते हैं तारे
अन्धेरी शाम, थके मजदूर को रास्ता दिखाने
आ पहुँचता है आसमान में चमकीला चाँद 
 
दिल के कोने–कोने में
उड़ते रहते हैं उमंगों के पंछी
सूखे दिलों में बढ़ती रहती हैं चाहतों की कोंपलें
गुब्बारेवाले के चारों ओर बच्चों की भीड़ जैसा
पलकों के आसपास जमा होते हैं उजियारे
 
छाती के अन्दर जोशीली हवा के झोंके आते हैं
आँसुओं की वर्षा में भी समय नया लक्ष्य चलाता है
सूखी पहाड़ियों पर सजता है इन्द्रधनुष
अकेले पहाड़ को आलिंगन में बाँधने
दूर देश से आता है प्रेमी बादल का झुण्ड 
 
समस्याएँ उलझती रहती हैं
यात्राएँ टूटती रहती हैं
पर हरेक सुबह उम्मीद का नया सूरज उगता है
दावानल से जले कुंदे पर बैठे एक पंछी जैसा
गीत गाता रहता है जीवन।

1 comment :

  1. कवि चन्द्र गुरुङ कि बेहद सुन्दर कविता लेखन हैं उनकी हर कविता बहुत पसन्द है जिसे पढ्नेमे सुख मिल्ती हैं । प्रगतिका बहुतबहुत शुभकामनाय ।

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