यात्रा-संस्मरण: एलीफेंटा की सनसनाती हवाएँ और महाबलेश्वर की गुनगुनी धूप

विजय कुमार संदेश

प्राध्यापक, पी.जी. हिन्दी विभाग, मार्खम कॉलेज, हजारीबाग, झारखंड,भारत
दूरभाष: +91-943 019 3804
ईमेल: sandesh.vijay@gmail.com


पश्चिमी-भारत में महाराष्ट्र कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। यहाँ विश्व-ख्यात मायानगरी मुंबई तो है ही, साथ ही मुंबई के समानान्तर आर्थिक नगरी पूना भी है। मुंबई की खास विशेषता यह है कि ये कभी सोता नहीं है। चारों पहर, चौबीसों घंटे जागता और दौड़ता रहता है। इसीलिए इसे सपनों का शहर भी कहा गया है। अपने पैशन, फैशन और आधुनिक जीवन-शैली के लिए ख्यात मुंबई दुनिया के शीर्ष वाणिज्यिक केन्द्रों में एक है। मुंबई और पूना के वाणिज्यिक केन्द्रों के अतिरिक्त महाराष्ट्र के आस-पास कई ऐसी खूबसूरत जगहें हैं, जिसके आकर्षण से बंधे लोग इन क्षेत्रों में दौड़े चले आते हैं। इन्हीं में एलिफेंटा और महाबलेश्वर है, जो पर्यटन की दृष्टि से विश्वप्रसिद्ध हैं और जहाँ मुझे एकाधिक बार जाने का अवसर मिला। ठीक से याद नहीं पर शायद वह वर्ष 1988 होगा, जब मैं पहली बार मुंबई गया था। लोगों से सुना था कि जो एक बार मुंबई चला आता है, उसे माता मुंबा देवी का यह आशीर्वाद मिल जाता है कि अपने जीवन काल में उसे मुंबई में माता मुंबा देवी का आशीर्वाद पाने के लिए कम से कम तीन बार और आने का संयोग-सौभाग्य मिलेगा। मेरे साथ तो यह किंवदंती शत प्रतिशत सही है। यह संयोग है कि मुंबई में तीन प्रवास काल के अतिरिक्त जितनी बार मैं मुंबई आया उतनी ही बार एलिफेंटा की गुफाओं तक जाने के लिए समुद्र-लंघन का अवसर भी मिला। सच कहूँ तो जीवन में पहली बार मुंबई के गेटवे ऑफ इंडिया से एलिफेंटा तक 10 किलोमीटर की मेरी समुद्री यात्रा हुई थी तो एलिफेंटा की गुफाओं को देखने का भी सुअवसर मिला था। इसके ठीक सात वर्षों बाद 1995 में फिर यह अवसर आया। तब मेरे साथ मेरी पत्नी इंदु जी और कनिष्ठ पुत्र दिविक दिवेश भी था। उस समय उसकी उम्र दस वर्ष की थी। उसके बाद तो मुंबई आने का सिलसिला कोरोना काल के पहले तक जारी रहा।
एलिफेंटा मुंबई के गेटवे ऑफ इंडिया से मात्र 10 किलोमीटर दूर समुद्र के बीच में पहाड़ी टापू है, जो ऐतिहासिक धरोहरों और पहाड़ी घाटियों के रूप में प्रकृति-प्रेमियों के लिए आकर्षण का केन्द्र है। कभी इस एलिफेंटा टापू को धारापुरी के नाम से जाना जाता था। इसीलिए एलिफेंटा के इस पहाड़ी-द्वीप को स्थानीय लोग धारापुरी की पहाड़ियाँ भी कहते हैं। एलिफेंटा नामकरण के बारे में एक स्थानीय दुकानदार से मैंने पूछा था तो उन्होंने बताया था कि यह नाम पुर्तगालियों के द्वारा दिया गया है, जो यहाँ बने पत्थर निर्मित हाथी के कारण है। आज एलिफेंटा की  गुफाएँ पुरातात्विक धरोहर और समुद्री एडवेंचर के लिए विशेष लोकप्रिय हैं। गेटवे ऑफ इंडिया से एलिफेंटा की गुफाओं तक जाने के लिए हमने एक बड़े से स्टीमर को चुना, जिसमें पचास-साठ लोगों के लिए बैठने की जगह थी। करीब एक घंटे तक समुद्र की लहरों के बीच चपल गति से चलते हुए हम एलिफेंटा के करीब पहुँचे। इस समुद्री सफर में दूर से ही हमें धारापुरी का सुंदर दृश्य दिखाई दे रहा था। स्टीमर से उतर कर लगभग एक किलोमीटर तक पैदल ही टहलते हुए हम एक सौ बीस सीढ़ियाँ लांघ कर गुफा संख्या एक तक पहुँचे। गुफा तक पहुँचने के लिए थकाने वाली ऊँची-ऊँची सीढ़ियाँ थीं। सीढ़ियाँ पार करने के उपरांत जब हम गुफा के नजदीक पहुँचे तो मन को सुकून देने वाली सनसनाती हवाओं के साथ उछाल मारती लहरों की रम्य प्रकृति ठीक हमारे सामने थी। बड़े-बड़े नारियल के पेड़ों से गुजरकर समुद्र की ठंडी हवा हमारे शरीर के पोर-पोर को यों सहला रही थी, जैसे कोई माँ अपने थके-मांदे बच्चों को लोरी सुनाकर सहलाती है। ऊँची-ऊँची सीढ़ियों के चढ़ने से जो थोड़ी-बहुत थकान हुई थी, वह पलभर में ही काफूर हो गयी थी। दिविक अभी छोटा था, उसने तो दौड़कर ही सीढ़ियाँ चढ़ ली थी। गुफा के नजदीक पहुँचते ही सबसे पहले हमें शिव जी के दर्शन हुए। शिव जी की उपस्थिति के कारण ही इसे ग्रेट गुफा कहा जाता है। गुफा का मुख्य हिस्सा पोर्टिकोनुमा है जो तीन ओर से खुला है। सामने बड़ा-सा आँगन है। गुफा भारतीय शैलकृत शिल्प कला की परंपरा का हिस्सा है और वास्तुकला की शानदार उपलब्धि भी है। यों, जिन्हें पैदल चलने में थोड़ी दिक्कत है या जो पैदल नहीं जाना चाहते वैसे लोगों के लिए टाय-ट्रेन की व्यवस्था है। वे टाय-ट्रेन से गुफा की ओर जानेवाली सीढ़ियों तक पहुँच सकते हैं। एलिफेंटा की इन गुफाओं को अजंता और एलोरा की तरह ही बेसाल्ट चट्टानों को काटकर बनाया गया है, जिसे आठवीं-नवीं शताब्दी में चालुक्य और मौर्य वंशीय राजाओं ने कुशल शिल्पियों के द्वारा बनवाया था। इन गुफाओं को अगर शिल्प की दृष्टि से देखा जाये तो आज भी ये शैल-कृत मूर्तिकला और भित्तिचित्र कला के नायाब नमूने हैं। यह एक तरह से अजंता और एलोरा की बनावट के तर्ज पर ही समुद्र के बीच बनाये गये है। पाषाण शिल्पित यह ्रगुफा नगरी ऐतिहासिक-पौराणिक भव्य मूर्तियों और भित्तिचित्रों के लिए प्रसिद्ध है। शैलोत्कीर्ण गुफाओं में हिन्दू और बौद्ध मतों से संबंधित अर्धनारीश्वर शिव, विष्णु, महेश और बुद्ध सहित कई देवी-देवताओं की मूर्तियाँ या भित्तिचित्र बने हुए हैं। इन मूर्तियों में अब कुछ खंडित अवस्था में हैं। फिर भी, उनका आकर्षण कम नहीं हुआ है।
बेसाल्ट चट्टानों को काटकर बनायी गयी मुख्य गुफा को देखकर सभी के चेहरे पर एक चमक थी। सभी इस गुफा की कलात्मकता से अभिभूत थे। मुख्य गुफा अपने 26 स्तम्भों के माध्यम से अपनी ऐतिहासिकता के वैशिष्ट्य को बयां कर रही थी गोया, उसने अनगिनत प्राकृतिक और कृत्रिम प्रहारों को झेलकर भी स्वयं के अस्तित्व को बचाये रखने में अबतक सफल है। मुख्य गुफा के साथ अन्य गुफाएँ भी हैं जिनकी दीवारों पर उत्कीर्ण भित्तिचित्र और मूर्तियाँ अद्भुत हैं। शिल्पियों ने अपनी पूरी क्षमता का उपयोग अपनी कलाकारी के क्रम में किया है। प्रतीति होती है कि उन दिनों शैल-कृत कला का अद्भुत और उत्कृष्ट ज्ञान उनके पास था। इन गुफाओं में पाँच गुफाएँ हिन्दू दर्शन और दो गुफा बौद्ध-दर्शन को समर्पित है। गुफा की दीवारों पर उकेरे गए भित्तिचित्र हिन्दू दर्शन की विभिन्न मुद्राओं-घटनाओं को रेखांकित करते हैं। मूर्तियों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भोलेनाथ शिव जी की वे नौ मूर्तियाँ हैं जिनमें त्रिमूर्ति, अर्धनारीश्वर शिव और पंचमुखी शिव विशिष्ट हैं।
एलिफेंटा समुद्र के बीच एक संकरी घाटी द्वारा अलग की गयी दो पहाड़ी टापुओं का समूह है। इन दोनों टापुओं पर छोटे-छोटे गाँव भी हैं। इन टापुओं में एक को गन हिल और दूसरे को स्तूप हिल के नाम से जाना जाता है। दो टापुओं पर निर्मित एलिफेंटा की ये गुफाएँ महाराष्ट्र राज्य की कुछ बेहतरीन प्रस्तर खंड पर उकेरी गयी अनुपम गुफाओं में से एक मानी जाती हैं। यहाँ का शांत वातावरण और समुद्र से उठती लहरें पहाड़ से टकराकर फेनिल होकर जब लौटती हैं तो जो अद्भुत दृश्य बनता है, उसे देखकर मन विभोर हो जाता है। गुफा शृंखला एक के ठीक बगल से पहाड़ के शिखर पर जाने का रास्ता है। शिखर पर पुर्तगालियों के समय का तोप रखा हुआ है, जो पुर्तगालियों के इस टापू पर उनकी उपस्थिति के इतिहास को दर्शाता है।
एलिफेंटा से लौटते हुए हमें देर हो गयी थी। समुद्र में लहरें तेज थीं। आखिरी स्टीमर था और छोटा था। नाव से थोड़ा ही बड़ा था। समुद्र के पानी को हम हाथ से छू सकते थे और लहरें उछल-उछल कर बार-बार हमें भीगा रही थी। अचानक एक बड़ी लहर ने स्टीमर को थोड़ा उछाल दिया तो दिविक डर गया और स्टीमर के पीछे से आगे चला गया। एक ओर गेटवे ऑफ इंडिया, होटल ताज और मुंबई की गगनचुंबी इमारतें ठीक हमारे सामने थीं तो दूसरी और समुद्र में उछाल मारती हुई अपार जलराशि में सूर्य की नारंगी रश्मियां अपने अपरूप सौंदर्य के साथ बिंबित थीं। पूरे रास्ते हम उसे निहारते आये। ऐसा लग रहा था, जैसे सूरज की झिलमिल किरणें लहरों संग अटखेलियां कर रही हों। रोचक दृश्य था और हम रोमांचित थे। स्टीमर से निकलकर हमने भरपूर नजर ताज और गेटवे को निहारा और आगे बढ़ गए। 
वर्ष 2016। महाबलेश्वर की मेरी पहली यात्रा 2015 में शुरू हुई थी। अकुर्डी में अध्ययनरत मेरा भतीजा अभिषेक और कनिष्ठ पुत्र दिविक दिवेश साथ था। दिन भर हम लगातार महाबलेश्वर घूमते रहे थे। पुनः दूसरी यात्रा 2016 में हुई, जब मुझे प्रोफेसर अनिल जी के साथ खेड़, महाराष्ट्र में एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में जाना था। अनिल जी ने मुंबई के ठाणे रेलवे स्टेशन से ही मुझे रिसीव कर लिया। वे ठाणे स्थित सोनूभाउ बसवंत कॉलेज में कार्यरत हैं। उनके साथ होटल कंट्री रेडिसन, नवी मुंबई आया जहाँ गुजरात से आये प्रोफेसर अजय पटेल और प्रोफेसर प्रदीप जी हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। चाय-पान के बाद प्रोफेसर प्रदीप जी के कार से हम सभी आई॰सी॰एस॰ कॉलेज, खेड़ के लिए निकल पड़े, जहाँ पहुँचते-पहुँचते शाम हो गयी थी। खेड़ पश्चिमी भारत के कोंकण तट का पर्वतीय हिस्सा है, जिसका कुछ हिस्सा महाराष्ट्र में तो शेष गोवा और कर्नाटक का हिस्सा है। तीन संस्कृतियों यथा-मराठी, कन्नड़ और कोंकणी का मिला-जुला रूप खेड़ है। खेड़ से लगभग तीस किलोमीटर दूर दापोली है, जहाँ पेयजल स्वच्छता विभाग के गेस्ट हाउस में हमारा रात्रि विश्राम हुआ था। यह पूरा का पूरा क्षेत्र सह्याद्रि पर्वतमाला से घिरा हुआ है और महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले का दुर्गम क्षेत्र है। झाड़-झाड़ियों के बीच पत्थरों-टीलों पर बसा दापोली और खेड़ अपने हरित रूप और लंबी पर्वत शृंखला के बीच दो अलग-अलग और छोटे-छोटे कस्बानुमा जनपद हैं। मुंबई से गोवा जाने वाली सड़क के किनारी पर बसा खेड़ अपनी प्रकृति-संस्कृति के लिए आज भी विख्यात है। 31.07.2016 आई॰सी॰एस॰ कॉलेज खेड़ की संगोष्ठी समापन के उपरांत दूसरे दिन जब हम प्रो॰ अनिल जी (सोनूभाउ बसवंत कॉलेज), प्रो॰ प्रदीप जी (साठ्ये कॉलेज) और प्रो॰ अजय पटेल जी (गुजरात) के साथ हम वापस मुंबई के लिए चले तो रास्ते में रुक-रुक कर प्रकृति की सुंदरता का दीदार करते हुए ही आगे बढ़े। मार्ग में लंबी दूरी तक पहाड़ियों का दिलकश दृश्य दिखाई देता रहा। हम थोड़ी देर के लिए खेड़ से लगभग पचीस किलोमीटर की दूरी पर उस जगह रुके जहाँ आई॰सी॰एस॰ कॉलेज, खेड़ की हिन्दी प्राध्यापिका प्रोफेसर विद्या शिंदे जी का नवनिर्मित घर है। उनके परिसर में अल्फांसों के कई छोटे-छोटे पौधे लगे हुए थे। प्रो॰ विद्या शिंदे जी के पतिदेव श्री शशिशेखर शिंदे जी ने बताया कि यह पूरा का पूरा क्षेत्र अल्फांसो प्रजाति के आमों के लिए प्रसिद्ध है। प्राकृतिक सौंदर्य से खुला-खिला यह खेड़ अत्यंत रमणीक है। रास्ते में चलते हुए अनिल जी ने अचानक कार्यक्रम बदल दिया और मुंबई की जगह हम चल पड़े महाबलेश्वर की ओर। थोड़ी ही देर में महाबलेश्वर जाते हुए धुआँधार बारिश शुरु हो गयी। इसके बावजूद पहाड़ों से गिरते सैकड़ों बरसाती झरनों और जलस्रोतों की अप्रतिम सुंदरता का लुत्फ लेते हुए हम शाम होते-होते महाबलेश्वर पहुँच गए। रास्ते भर अनिल जी महाबलेश्वर के बारे में बताते रहे और बताया कि यह महाराष्ट्र के सतारा जिले का महत्वपूर्ण हिल स्टेशन है, जहाँ सैलानी जाड़ा, गर्मी, बरसात तीनों मौसम में बड़ी संख्या में पहुँचते हैं। 
महाबलेश्वर पहुँचकर हमने पहले होटल लिया। रात भर बिना रुके बारिश होती रही। सुबह में भी बारिश ने रुकने का नाम नहीं लिया। मौसम का अनुमान करके हम सभी अपनी-अपनी छतरी लेकर निकल पड़े। हवा तेज थी और बारिश की बूँदें भी मारक थीं। छतरी से कोई विशेष सहायता तो नहीं मिली, केवल मनोवैज्ञानिक बचाव हुआ। घूमते हुए प्रदीप जी कई बार फिसल कर गिरे भी, फिर हँसते हुए उठ पड़े। यह हमारे लिए सुखद संयोग था कि दोपहर होते-होते बारिश थोड़ी कम हो गयी थी। उसका वह मारक रूप अब नहीं था जो एक घंटे पहले तक था। आकाश कुछ साफ हुआ तो कुछ देर के लिए ही सही भुवन-भास्कर दिखाई पड़े। इस समय महाबलेश्वर की धरती पर पेड़-पौधे शांत थे। बारिश से धुली हरियाली का सौंदर्य अप्रतिम था। लावण्यमयी प्रकृति का अपरूप और निश्च्छल सौंदर्य हमारी आँखों के सामने था। उस असीम अनुभूतिक सौंदर्य ने जो स्पर्श दिया था, उस सौंदर्य को शब्दों में बांधना अब मेरे लिए संभव नहीं है। प्रकृति नहा-धोकर चिर शांत थी। उस चिर शांति के लिए कुछ कहना मेरे लिए गूंगे के गुड़ जैसा है। बारिश से धुली हरियाली की चादर ओढ़े प्रकृति अपने रम्य सौंदर्य में खड़ी थी। दूर तक पहाड़ों का अनगढ़ उभार, जंगलों का फैलाव और जंगलों के बीच-बीच में दिखते छोटे-छोटे घर इस वादी-घाटी की खूबसूरती बढ़ा रहे थे। रिज पर कहीं-कहीं संकरे रास्ते, ऊँचे-मंझौले और झाड़ीदार पेड़, पेड़ों में लिपटी लताएँ और इन सबके बीच सांय-सांय करती हुई हवा का शोर, दूर कहीं किसी पक्षी का मधुर स्वर हमारी उपस्थिति में मीठे रस घोल रहा था। चलते हुए कभी थका देने वाली चढ़ाई तो कभी झुका देने वाली उतराई, घाटी के एक ओर खड़ी चट्टानें तो दूसरी ओर गहरी खाईयां हमें डरा रही थीं तो हमारे भीतर एक अनुभूत रोमांच भी पैदा कर रही थी। सच कहूँ तो प्रकृति का अद्भुत मिसाल है यह महाबलेश्वर और सह्याद्रि का यह रेंज जिसमें प्रकृति की खूबसूरत रचनाएँ यथा- फूल, फल, लता-द्रुम, नदी-पहाड़, झील आदि मेरे अंतस के करीब बसने वाले प्रकृति-प्रदत्त रचनाएँ हैं। पहाड़ों की विशालता को आत्मसात करने में, नदियों के कल-कल बहते जलस्रोत के अनुरागी स्वर को सुनने में, झरनों के नाद में, महकते-चहकते फूलों को निहारने में यहाँ जिस आनंद की अनुभूति हमें हो रही थी, उसकी कोई तुलना नहीं है। यह हम सबके लिए विशिष्ट और आत्मतीत अनुभव था।
दूसरे दिन मौसम एकदम साफ हो गया था और गुनगुनी धूप के साथ सनसनाती हवाएँ भी साथ-साथ थीं। आद्र्र मौसम के साथ न्यूनतम तापमान में थोड़ी-सी वृद्धि हो गयी थी। दोपहर में रिज पर घूमते हुए थोड़ी गर्मी का भी अहसास हुआ किंतु शाम होते-होते गुलाबी ठंढ ने हमें कँपकँपा दिया। सह्याद्रि में हम जिस रम्य सौंदर्य की कल्पना कर रहे थे उसकी शुरुआत तो खेड़ से ही हो चुकी थी और उसका भरपूर आनंद हम यहाँ महाबलेश्वर के हरे-भरे उद्यानों की अलौकिक सुरभि के गंधपान के साथ कर रहे थे। इस खुशनुमा मौसम ने हमारी रुचि और आनंद के पल को द्विगुणित कर दिया था। सह्याद्रि के इस महाबलेश्वर में शायद इसी आनंद के पल और मौसम का लुत्फ उठाने के लिए पूने और मुंबई से लोग आते रहते हैं। पर्यटक के रूप में हमें यहाँ जो लोग भी मिले उनमें से अधिकांश महाराष्ट्र के ही थे। हाँ, कुछ दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड, बंगाल और दक्षिण भारत के लोग भी थे। पर, उनकी संख्या कम थी। मुंबई, पूने की उमस वाली गर्मी और तपिश से राहत पाने के लिए इस क्षेत्र के लोगों के लिए महाबलेश्वर से मुफीद शायद ही कोई दूसरी जगह है। स्थानीय लोगों ने बताया था कि ऐसा मौसम जब भी आता है, महाबलेश्वर का केवल आकाश ही नहीं धरती भी हरियाली से आच्छादित हो जाती है। यह हमारे लिए संयोग था कि ऐसे खुशनुमा समय में हम यहाँ उपस्थित थे। इस मौसम ने हमें असीम सुख दे रखा था और सुख की अनुभूति में हमारे साथ जंगली फूलों की खुशबू और स्ट्राबेरी की सुगंध का भी साथ मिल गया था। महाबलेश्वर के दर्शनीय स्थलों को यहाँ प्वाइंट कहा जाता है, जैसे- हाथी मस्तक प्वाइंट, वेन्ना झील प्वाइंट, केट्स प्वाइंट आदि। हाथी मस्तक यहाँ का लोकप्रिय विंटेज प्वाइंट है और महाबलेश्वर की पहचान है। इस प्वाइंट की आकृति हाथी के मस्तक और पीठ के समान हैं। पार्किंग स्थल से हमने अनुमान किया कि दूरी मात्र आधे किलोमीटर की ही होगी। महाबलेश्वर के इस प्वाइंट से यहाँ की ऊँचाई देखने का अवसर तो मिला ही, सर्वाधिक स्मरणीय वह प्राकृतिक छटा थी जो दूर तक दिखाई दे रही थी। पत्थरों के बीच से लटकते छोटे-छोटे पौधों पर पुष्पगंध से आकर्षित भौरों का गुँजार हमने देखा, सुना तो मन गदगद हो गया। एक निश्चित जगह और कोण से देखने पर हाथी के सिर और सूँड के बीच का भाग सूई की नोक की तरह दिखता है। इसीलिए हाथी मस्तक को ‘नीडल प्वाइंट’ भी कहा जाता है।
महाबलेश्वर के रिज पर अच्छी आबादी बस गयी है, होटल, रेस्तरां आदि खुल जाने के कारण इसका स्वरूप कस्बाई हो गया है। आज यह प्रकृति-प्रेमियों के लिए स्वप्निल डेस्टिनेशन है। हरे-भरे सघन वन-पहाड़के साथ प्राकृतिक झरने हैं। बारिश के कारण कई मौसमी झरने इन दिनों फूट पड़े थे। इन मौसमी झरनों ने आस-पास की खूबसूरती को कई गुणा बढ़ा दिया था। मेरी दृष्टि में ये डेस्टिनेशन उनके लिए पसंदीदा जगहें हो सकती हैं जो प्रकृति को ठीक अपनी आँखों के सामने देखना चाहते हैं। यहाँ के शांत हरे-भरे प्राकृतिक दृश्य-छवियों ने भारी बारिश और प्रतिकूल मौसम के बावजूद हमें आकर्षित और रोमांचित कर दिया था। अनिल जी कह रहे थे कि मुंबई-पूना की भाग-दौड़ भरी जिंदगी के बीच शांति के कुछ अच्छे पलों के लिए यह हमेशा यादगार बना रहेगा।
तीसरे और वापसी के दिन वेन्ना झील को देखकर हम लौट रहे थे तो कुछ देर के लिए रास्ते में पड़ने वाले मैप्रो गार्डेन में भी हम रुके। इस मैप्रो गार्डेन में अभिषेक और दिविक के साथ पहली बार की यात्रा में हम पहले भी आ चुके थे। यह महाबलेश्वर और उसके आस-पास के लिए प्रसिद्ध पिकनिक स्थल है। साफ पानी का जलाशय और गमलों व जमीन पर खिले फूलों ने मुग्ध कर दिया था। ग्रीन हाउस के स्ट्राबेरी तो अद्भुत थे। यह गार्डेन मैप्रो कम्पनी के द्वारा बनाया गया है। इस गार्डेन की नर्सरी में स्ट्राबेरी लगे हुए थे। गार्डेन के ठीक बगल में उनकी मैप्रो चाॅकलेट की कंपनी थी। हमने कुछ स्ट्राबेरी और चाॅकलेट के पैकेट खरीदे। महाबलेश्वर से लौटते हुए आकाश में दौड़ते छोटे-छोटे मेघ खंड लगता था जैसे हमारी गाड़ी की स्पीड के साथ वे भी दौड़ रहे हैं। वापसी में देर हो गयी थी, सो मुंबई शाम होते-होते पहुँचे।

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