अंजनी कुमार सिंह: साहित्यिक संसार का अथक साधक

बृजेश प्रसाद

बृजेश प्रसाद (शोधार्थी)

मास्टर्स – जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
एम.फिल – गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय
पीएचडी- प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी कोलकता
चलभाष: +91 898 114 9833
ईमेल: prasadb045@gmail.com

वैसे तो बनारस और इलाहाबाद (प्रयागराज) साहित्यकारों की नगरी रही है। साहित्य की दुनिया को इन दो शहरों ने समृद्ध और आबाद बनाया है। मुंशी सदासुख लाल, भारतेंदु, बालकृष्ण भट्ट, प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, हरिवंश राय बच्चन आदि बहुत साहित्यकारों ने अपनी लेखनी के माध्यम से पूर्वांचल को इतिहास के पन्नो में और देश-दुनिया में गर्वान्वित किया है।

गंगा-जमुना-सरस्वती के इसी त्रिवेणी के पास प्रतापगढ़ में जन्म हुआ अंजनी कुमार सिंह का, जो एक बड़े विचारक, साहित्यकार और सामाजिक गतिविधियों को पैनी नजर से देखने वाले लेखक व कवि हैं। अंजनी कुमार समाज की भीषण त्रासदी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, बाबू-भैया और शिक्षा जगत में झोल-झाल करने वाले लोगों को अपनी लेखनी का आधार ही नहीं बनाते बल्कि कबीर के जैसे फटकारते भी हैं। मसलन साहित्य के प्रति उनकी सजगता और चेतना उन्हें बड़े-बड़े साहित्यकारों की कोटि में शामिल कर देती है। निस्वार्थ साहित्य को समृद्ध और साहित्य के प्रति प्रेम अंजनी कुमार सिंह को विशिष्ट बनाता है।

अंजनी कुमार सिंह की रचनाएँ लगातार देश-विदेश के पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही है। आकाशवाणी, दूरदर्शन आदि कई टीवी चैनलों पर बोलने के लिए उन्हें आमंत्रित किया जाता रहा है। ‘प्रेमचंद की कहानियों में लोक-संस्कृति’ पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है। सोशल मिडिया पर लगातार उनकी सक्रियता और सामाजिक मुद्दों पर उनकी कलम रूकती हुई दिखाई नहीं देती। जहाँ आज हम अपने जीवन का संचालन नेट और सोशल दुनियां को बना रहे हैं, इस दरम्यान जिस तरह से सोशल मिडिया समाज में चेतना, सजगता और क्रांति के रूप में उभर रहा है, उसमें अंजनी कुमार सिंह की रचनाएँ और सोशल मिडिया पर उनकी सक्रियता बिलकुल सठिक बैठती है। वर्तमान संदर्भों में अंजनी कुमार सिंह बहुत ही गहराई से अध्ययन-मनन कर लिखते रहे हैं।

प्रख्यात मंचीय कवि श्लेष गौतम जी ने अंजनी कुमार सिंह के रचनाकर्म पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि ‘अंजनी भाई उन गिने-चुने लोगों में से हैं, जो साहित्य की श्री सरिता को निस्वार्थ भाव से और पूरे मनयोग से अपनी विभिन्न भूमिकाओं से समृद्धि, सरोकार और वेग प्रदान करते रहे हैं। वह भी बिना हल्ला मचाए, बिना सत्ता का झंडा उठाये। कहने का तात्पर्य यह है कि साहित्य के प्रति उनका जो अनुराग है, वह हो सकता है कि उनकी व्यक्तिगत संतोष की बात हो परन्तु उनके द्वारा किये जा रहे कार्य व लेखन हिंदी साहित्य में रेखांकित होने लायक है।'

अंजनी कुमार सिंह उन साहित्यकारों में नहीं है, जो चाटुकारिता की प्रवृत्ति में लबालब भरे हुए हैं। अंजनी कुमार अपने ईमान और सच्चाई पर अडिग रहने वाले कवि हैं। उनके यहाँ सच कहने की शक्ति है और उसी सच्चाई के वे शिकार भी बने। अपने जोशीले अंदाज में बेझिझक होकर सही-गलत बोलने वालों की पोल खोल देने वाले अंजनी कुमार सिंह प्रोफेसर नहीं बन पाए उन्हें कईयों ने सच बोलने से समझौता करने के लिए भी कहा परंतु अपनी सच्चाई पर अडिग रहने वाले अंजनी कुमार आज भी अपनी आधी उम्र पार कर अपनी लेखनी के प्रति निष्ठा और ईमानदारी बनाये हुए हैं। वे लिखते भी हैं-
"ज़मीर बेचकर अमीर होने से अच्छा है, 
ज़मीर को समृद्ध कर फ़क़ीर हो जाना”1

‘हिंदुस्तानी अकेडमी’ प्रयागराज के अध्यक्ष डॉ. उदय प्रताप लिखते भी हैं कि ‘अंजनी कुमार सिंह अंजनी लाला की तरह परम पुरुषार्थी हैं। वे सक्रिय रचनाकार हैं। नौकरी न करते हुए भी नौकरी की लिजलिजी मानसिकता से ऊपर उठकर वह सृजनरत रहते हैं। हिंदी के साथ अवधी में लिखी गई उनकी रचनाएँ साहित्य-प्रेमियों द्वारा खूब सराही गई।’  
अंजनी कुमार के व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों में ही सरल वैशिष्ट्य एवं सुलझे हुए चिंतन का संश्लेषण देखने को मिलता है। प्रयाग उनकी कर्मभूमि है। वे यहाँ से अपना नया जन्म मानते हैं। क्योंकि प्रयाग ने उन्हें रोजी-रोटी और साहित्यकार का स्वरूप एवं राष्ट्रीय स्वर की प्रतिष्ठा प्रदान की। अंजनी कुमार अपनी व्यक्तित्व के बारे में लिखते हैं- "किसी राजनीतिक दल का न तो सिपाही हूँ और न ही निष्ठावान कार्यकर्ता। कलम का सिपाही हूँ, मजदूर का बेटा होने के नाते अपनी पीड़ा व्यक्त करता हूँ।"2
उनके अन्दर का कवि कर्म बहुत ईमानदार है और इसी ईमानदारी के साथ अंजनी कुमार कविताएं लिखते हैं। उनकी रचनाओं में बनावटीपन न के बराबर दिखाई देता है। वे अपनी बातों को अपनी लेखनी में व्यंग्य और सरल-सपाट शब्दों में अभिव्यक्त करते दिखाई देते हैं। उनकी कविता 'बिकाऊ मुल्क' में देश की व्यवस्था का कोरा चिट्ठा प्रस्तुत हुआ है -
"लोकतंत्र का तंत्र बिका है
 लोक रहा चिचियान
 लोकलाज और शील बिका है
 सच्चाई का कंदील बिका है
 पुलिस, कचहरी बिका है
 जज साहब का ईमान बिका है
 मंतरी, संतरी सहित बिके हैं 
गांवन के प्रधान
देखा हमर हिन्दुस्तान।"3

कवि श्लेष गौतम लिखते है ‘साहित्य की दुनिया में हो रहे परिवर्तन या यूँ कहें नए पन को लेकर या प्रयोगों को लेकर जो अभिव्यक्तियाँ हो रही हैं उन पर बहुत ही पैनी दृष्टि रखते हैं कवि अंजनी भाई। वे एक व्यापक दृष्टिकोण के साथ बिना किसी पक्षधरता के विवेचना और विश्लेषण करते हैं। अपनी कविताओं में सार्थक-सर्जनात्मक के साथ बेबाकी से अभिव्यक्ति के खतरे उठाते हुए अपनी बात सच्चाई के साथ रखते हैं।’

समाज में गरीबी-भुखमरी बहुत बड़ा मसला है। आजादी के इतने सालों बाद भी देश का एक बहुत बड़ा वर्ग जीवन-यापन के लिए कभी-कभार भोजन पाता है। समाज में जिस तरह से जाति-धर्म और ऊँच-नीच एवं भेदभाव फैला हुआ है, उससे पिछड़े-कुचले लोग भूख और शोषण से सबसे ज्यादा मरते हैं। उनके बाल बच्चे कुपोषण के शिकार हो जाते हैं। साहित्य की दुनियां में गरीबी, भुखमरी पर खूब लिखा गया है। लेकिन जिस तरह अपनी पैनी दृष्टि से अंजनी कुमार ने भूख की पीड़ा को साहित्य से जोड़ते हैं, वह सचमुच पीड़ादायक है -
"पेट में जल रहे अलाव और
उसकी ऊष्मा से तप्त
से मनोदशा का स्थायी भाव
जिसके अनुभव, विभाव, संचारी
सब हो गये व्यभिचारी
शेष है सिर्फ अभाव
जिसके सम्मुख लाचार हैं
सब प्रभाव।”4

‘कमला नेहरू भौतिकी एवं सामाजिक संस्थान’ के विभागाध्यक्ष डॉ. राधेश्याम सिंह जी लिखते हैं कि ‘जीवनानुभवों से तथ्य तैयार कर उसे वैचारिक सांचे में ढालकर अभिव्यंजित करना अंजनी कुमार सिंह के लेखन को प्रामाणिकता प्रदान करता है। जब लेखक शोषितों, वंचितों, असहाय लोगों की गर्म आहों में अपनी जिंदगी को तपाता है तो उसके लेखन में विश्वसनीयता प्रकट होती है। विचारों के पीछे शब्दसत्ता स्तवन करती सी लगती है। अंजनी भाई के लेखन का समीकरण भी यही है।’
आजाद भारत की बागडोर पूंजीवादी ताकतों के हाथों में गई। वहीं दलितों-पिछड़ों और असहाय लोगों ने शारीरिक मेहनत से जीवन बिताने को मजबूर व अभिशप्त हुए। गौरतलब है कि इन्हीं मजदूरों के खून-पसीने और मेहनत से राष्ट्र का निर्माण होता है। लेकिन तथाकथित वर्गों में बंटा हुआ भारतीय समाज जाति-धर्म और अर्थ के आधार पर लगातार असहाय, पीड़ित और मजदूरों का शोषण करता आया है। अंजनी कुमार सिंह की कविताएँ न केवल मजदूरों की पीड़ा को दिखाती है, बल्कि जाति-धर्म के नाम पर समाज में मजदूरों और निचले तबकों को जाति-धर्म का ध्वंस किस हद तक झेलना पड़ता है, इसे भी दिखाती है। 'मकान' कविता में इस दर्द को बखूबी देखा जा सकता है -
"ईंट और गारे से निर्मित
एक आशियाना
जिसकी नींव में दफ़न हैं
कई मन, आशा व अपेक्षाएं
और जो है भवन, महल आदि
बिरादरी का सबसे गरीब तबका
जिसके सम्मान के पायदान में है
पहले कच्चा फिर पक्का।"5

अंजनी कुमार परिवार नियोजन पर भी अपनी कलम चलाई है। अपने जीवनानुभव को वे अपनी कविता 'श्राद्ध' में व्यंग्यात्मक ढंग से परिवार की सच्चाई को बखूबी बयाँ करते हैं। यह कविता सिर्फ कविता नहीं बल्कि वर्तमान समाज की असलियत को दर्शाती है –
"टूटते मन का यातना गृह
जिसमें खांसी को भी हुक्म था
साइलेंट मोड़ पे रहने का
जिन बहुओं के आगमन पे
लगाये थे हमने ठुमके
वही मांगती थी
हमारे परलोक गमन की मन्नते।6

कभी मार्क्स ने कहा था ‘धर्म’ अफीम है। इस धर्म की आड़ में हम भूल जाते हैं, इंसानियत की पाठशाला। वर्तमान समय में जिस तरह से साधु-संत और मंदिर भ्रष्टाचार और दुराचार-ढोंग का जगह बनता जा रहा है। वह सोचनीय है। आशाराम बापू से लेकर निर्मल बाबा, रामरहीम तक और देश के प्रतिष्ठित मंदिरों के चढ़ावा तक सब के सब पर बड़ा व्यापार और गिरोह चल रहा है। अंजनी कुमार वर्तमान परिदृश्य को देख क्षुब्ध हो उठते हैं। अपनी कविता 'देवता का देवत्व' में वे लिखते हैं –
"हे मनुज के देवता! क्यों कर गये कूच
धर्म की पताका लिए ठेकेदारों को बताये बिना
हम तो पहले भी न जाने कितनी बार ठगे गये
तुम्हारे सारे पते गलत साबित हुए सचमुच
आखिर क्यों ? आज तक बताये पते पर नहीं मिले तुम।"7

देश-समाज में लगातार बढ़ते अपराध-हिंसा से कवि मन बहुत आहत होता है। वह ऐसे समाज की कल्पना करता है, जहाँ कोई जाति-धर्म, ऊँच-नीच का भाव न हो, समाज की आधी आबादी अपने को सुरक्षित महसूस करें। लेकिन कवि की इस कल्पना पर आये दिन पानी फिर जाता है। मसलन इस तरह के अत्याचार, बलात्कार, रेप और धर्म की आड़ में दंगा फ़साद देख कवि साहस के साथ लिखता हैं-
"देश के कर्णधार नहाते गंदे नाले की धार
रग्घू आज भी महंगाई, बेकारी से लाचार
कब तक छलोगे, बनोगे रासलीला के श्याम
कब तक चलेगी मुंबइया रामलीला
रोज होती हत्याएं, बलात्कार
चीखती है शिला।"8

‘उदयप्रताप कॉलेज’ के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. राम सुधार सिंह जी लिखते हैं कि ‘जिन शब्दों पर जीवन के अनुभव जितने गहरे होंगे वे कविता के लिए उतने ही सार्थक होंगे। वस्तुतः शब्दों को अर्थ शब्दों को अर्थ देना उतना कविता नहीं है, जितना जीवन के अर्थ को शब्द देना कविता हैं। इसी बात को धूमिल ने कुछ इस तरह से कहा है कि अच्छी कविता किसी कवि के जीवन से पूरा खुराक ग्रहण करती है। अंजनी कुमार सिंह की कविताओं में भी देश और समाज में फैली विसंगतियाँ, राजनीतिक भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, गाँव के  अभाव की जो अभिव्यक्ति है वह सब काल्पनिक न होकर ठोस यथार्थ से संकलित हैं। अंजनी कुमार सिंह की कविताएँ भी समकालीन ज्वलंत मुद्दों कविताएँ हैं।’

कवि अंजनी कुमार को गाँव से अधिक प्रेम होने के कारण वह गाँव की संस्कृति पर बहुत मुग्ध होते अपनी कविताओं में दिखाई देते हैं। वे जब गाँव और शहर को देखते हैं, तो उन्हें गाँव की जीवन्तता ही ज्यादा आकर्षित करती है। शहर की चकाचौंध दुनिया उन्हें निराश सी लगती है। शहरों में दो जून की रोटी खातिर दिनभर की दौड़-भाग कवि को निराश करती है। शहरों की भीड़ सिर्फ एक भीड़ है, जो अपने आप में पूरा अकेला और संवेदनशून्य है। अपनी कविता 'रोटी' में अंजनी कुमार रोटी के माध्यम से शहरी जीवन को चित्रित करते हुए कहते हैं –
“आंटे की लोयी के सुकृति स्वरूप
तवे पर सिंकना, जलना व
रोम-रोम से तपकर चिटकना
और कहना मानव से
तुम भी मेरे लिए गूंथों, तपो, जलो
ग्रीष्म, शीत व बरसात में सहो
दुःख, तकलीफ और अपमान”।9

इस तरह अंजनी कुमार सिंह की कविताओं की पहचान के साथ-साथ समकालीन कविता का मिजाज साफ हुआ प्रतीत होता है। निःसंकोच रूप से कहा जा सकता है कि कवि अंजनी कुमार सिंह की कविताएँ आम आदमी के जीवन और जीवन के भावों की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति है। जिन्हें वे अपनी कविताओं का विषय वस्तु कहीं और से नहीं बल्कि अपने आस-पास के लोक और वर्तमान परिदृश्य से उठाते हैं। अपनी कविता 'नेता' में राजनीतिक व्यवस्था पर प्रहार करते हुए वे लिखते हैं –
“अमन बेच देंगे, चमन बेच देंगे
गरीबों के तन का कफ़न बेच देगे
सूखने न देना कलम की सियाही
जो सूख गई तो ये वतन बेच देंगे।"10

‘हिंदुस्तानी अकादमी’ प्रयागराज के अध्यक्ष उदय प्रताप लिखते हैं कि ‘अंजनी सिंह की कविताएँ समकालीन समय का बोध कराता और दर्द पैदा करता है। उनका व्यंग्य एक सधे रचनाकार का व्यंग्य लगता हैं। समसामयिक परिप्रेक्ष्य में उनका लेखन व्यवस्था के कान खड़े कर देता है।’

वर्तमान समय में देश में बेरोजगारी तेजी से बढ़ती जा रही है। देश का बड़ा युवा तबका डिग्री पाने के बाद भी नौकरी पाने के लिए जूझ रहा है। बहुत से परिवारों में युवा बेरोजगारी से परेशान होकर मौत को गले लगा लेता है। आजादी के इन सत्तर सालों बाद भी लगातार सरकार का विफल होना और डिग्रीधारी युवाओं का पकौड़ा बेचने जैसी स्थिति से कवि आहत होता है और लिखता है -
"पढ़ी लिखि कै पकौड़ा बेंचों
शिक्षा का है यह ज्ञान
कलम फ़ेंकी के गोबर काढो
गोबर में हैं जान
देखा हमर हिंदुस्तान वो भैया
देखा हमर हिंदुस्तान।"11

इस तरह कवि और उसका समाज जिन त्रासद स्थितियों से जूझ रहा है, उसे चित्र की तरह प्रस्तुत करने की कला उनकी लेखनी में दिखाई देती है। अंजनी कुमार सिंह वर्तमान को देख जब भविष्य की कल्पना करते हैं तो बौखला जाते हैं, बेचैन हो जाते हैं। इसलिए कवि अपनी कविताओं में व्यक्ति की जिजीविषा एवं महत्वाकांक्षा की वृद्धि कर जीवन रस की शुष्कता को बचाना चाहता है। मसलन जिस अखंड आत्म विश्वास और ईमानदारी के साथ वे कविताओं की रचना करते हैं। वह काबिले-तारीफ है!
***


संदर्भ सूची –
1. https://www.facebook.com/anjanikumar.singh.1293 
2. https://www.facebook.com/anjanikumar.singh.1293 
3. https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1026987327671516&i
d=100010807754410 
4. साहित्य यात्रा पत्रिका – अंक 21-22 जनवरी-जून 2020पृष्ठ संख्या,150
5. वही 
6. https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1244566639246916&i
d=100010807754410 
7. https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1179413192428928&i
d=100010807754410 
8. https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1047640582272857&i
d=100010807754410 
9.  साहित्य यात्रा पत्रिका – अंक 21-22 जनवरी-जून 2020पृष्ठ संख्या,153
10. https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1006885576348
358&id=100010807754410 
11. https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1026987327671
516&id=100010807754410 
12. लेखक अंजनी कुमार सिंह से कविता संबंधी विचारों पर फोन पर बातचीत 
13. प्रख्यात मंचीय कवि श्लेष गौतम से फोन पर बातचीत

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